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कहां है लिपुलेख दर्रा? चीन के साथ कारोबार पर नेपाल ने उठाई आपत्ति तो भारत ने दिया करारा जवाब

लिपुलेख एक पर्वतीय दर्रा है जो कि उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले में स्थित है। इसकी भौगोलिक स्थिति अहम है क्योंकि यहां भारत, तिब्बत और नेपाल की सीमाएं मिलती हैं। यह भारत और तिब्बत को आपस में जोड़ता है और इस दर्रे से भारत एवं चीन के बीच सीमा व्यापार होता आया है। यहां से मानसरोवर यात्रा भी गुजरती रही है। लिपुलेख समुद्र तल से करीब 17,000 फीट की ऊंचाई पर स्थित है।

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Photo : PTI
लिपुलेख दर्रे से सीमा व्यापार करने पर सहमत हुए हैं भारत और चीन। तस्वीर-PTI
Written by: Alok Rao
Updated Aug 21, 2025, 21:03 IST
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Where is Lipulekh Pass? लिपुलेख दर्रा एक बार फिर सुर्खियों में आ गया है। दरअसल, भारत और चीन ने इस दर्रे से सीमा व्यापार फिर से शुरू करने पर सहमत हुए हैं। भारत की यात्रा पर आए चीन के विदेश मंत्री वांग यी के साथ व्यापक वार्ता के बाद मंगलवार को जारी संयुक्त घोषणापत्र में कहा गया कि दोनों देश तीन व्यापार बिंदुओं - लिपुलेख दर्रा, शिपकी ला दर्रा और नाथू ला दर्रा के माध्यम से सीमा व्यापार दोबारा शुरू करेंगे। इस बयान के अगले दिन यानी बुधवार को नेपाल ने इस पर यह कहते हुए आपत्ति जताई कि लिपुलेख उसका इलाका है और यह नेपाली मानचित्र में दर्ज एवं उसके संविधान में शामिल है। नेपाल के इस विरोध पर भारत सरकार ने बिना देरी किए प्रतिक्रिया दी। अपने जवाब में विदेश मंत्रालय ने कहा कि ऐसे दावे न तो उचित हैं और न ही ऐतिहासिक तथ्यों एवं साक्ष्यों पर आधारित। क्षेत्रीय दावों का कोई भी एकतरफा कृत्रिम विस्तार भारत को अस्वीकार्य है। बता दें कि साल 2020 में पूर्वी लद्दाख के गलवान में भारत और चीन के बीच हुई झड़प के बाद सीमा व्यापार बंद हो गया था लेकिन पिछले साल दिसंबर में दोनों देशों ने इसी सीमा मार्ग से कैलाश मानसरोवर यात्रा शुरू करने पर सहमति जताई।

कहां पर है लिपुलेख दर्रा?

लिपुलेख एक पर्वतीय दर्रा है जो कि उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले में स्थित है। इसकी भौगोलिक स्थिति अहम है क्योंकि यहां भारत, तिब्बत और नेपाल की सीमाएं मिलती हैं। यह भारत और तिब्बत को आपस में जोड़ता है। 1950 के दशक से ही इस दर्रे से भारत एवं चीन के बीच सीमा व्यापार होता आया है। यहां से मानसरोवर यात्रा भी गुजरती रही है। लिपुलेख समुद्र तल से करीब 17,000 फीट की ऊंचाई पर स्थित है। यहां हल्द्वानी से अल्मोड़ा फिर पिथौरागढ़ होते हुए कालापानी और लिपुलेख पहुंचा जा सकता है। यहां से सबसे नजदीक एयरपोर्ट पंतनगर और रेलवे स्टेशन काठगोदाम एवं हल्द्वानी हैं। लिपलेख से हिमालय के रमणीय दृश्य दिखते हैं। यह स्थान प्रकृति प्रेमियों और ट्रेकर्स को काफी रोमांचित करती है।

क्यों अहम है लिपुलेख दर्रा?

लिपुलेख दर्रे का रणनीतिक, व्यापारिक एवं धार्मिक महत्व है। पवित्र मानसरोवर यात्रा के लिए लिपुलेख दर्रे का इस्तेमाल होता आया है। लिपुलेख दर्रा भारत को तिब्बत से सीधे जोड़ता है। यह इलाका सामरिक लिहाज से भी अहम है। क्योंकि इससे होकर तिब्बत और चीन तक जल्दी पहुंचा जा सकता है। 2020 में, भारत ने कैलाश मानसरोवर तक 80 किलोमीटर लंबी सड़क भी बिछाई, जिससे यात्रा का समय घटकर केवल दो से तीन दिन का रह गया। हिमालयी क्षेत्र में आसान संपर्क के लिए चीन लिपुलेख दर्रे का उपयोग करना चाहता है। 2015 में, चीन ने अपनी भारत-विरोधी रणनीति के तहत इस मुद्दे पर नेपाल का भी समर्थन किया था। अब सीमा व्यापार के लिए दोनों देश इस दर्रे का इस्तेमाल करना चाहते हैं।

सुगौली संधि के आधार पर दावा करता है नेपाल

भारत और नेपाल करीब 1,800 किलोमीटर लंबी सीमा साझा करते हैं। भारतीय सीमा पर स्थित लिपुलेख, लिम्पियाधुरा और कालापानी पर नेपाल अपना दावा करता है। ये तीनों ही स्थल भारत, नेपाल और चीन के तिराहे के पास स्थित हैं। इन इलाकों पर अभी भारत का नियंत्रण है। नेपाल साल 1816 में हुई सुगौली संधि के आधार पर इन इलाकों पर दावा करता है। इस संधि में काली नदी को भारत और नेपाल के बीच की सीमा रेखा के रूप में निर्धारित किया गया था। काली नदी की दो सहायक नदियां लिपुलेख और लिम्पियाधुरा से निकलती हैं। काठमांडू का कहना है कि सीमा लिम्पियाधुरा से निकलने वाली नदी से शुरू होती है, जबकि नई दिल्ली का कहना है कि सीमा लिपुलेख से निकलने वाली धारा से शुरू होती है।

2020 में नेपाल ने नया राजनीतिक नक्शा जारी किया

पिछले साल नेपाल ने एक नया नोट जारी किया, जिस पर कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुरा वाला नक्शा छपा था। भारत ने इस नक्शे को खारिज करते हुए इसे 'एकतरफा कदम' बताया और कहा कि इससे जमीनी हकीकत नहीं बदली जा सकती। यह पहली बार नहीं था जब काठमांडू ने इन क्षेत्रों को अपने भूभाग में दर्शाया। 18 जून 2020 को नेपाल ने अपना नया राजनीतिक नक्शा जारी किया, जिसमें इन तीन रणनीतिक इलाकों को शामिल किया गया। उसी साल नेपाल ने भारत द्वारा लिपुलेख दर्रे तक 80 किलोमीटर लंबी नई सड़क के उद्घाटन का भी विरोध किया। यह मार्ग नई दिल्ली और कैलाश-मानसरोवर के बीच का सबसे छोटा रास्ता है।

लिपुलेख दर्रे से व्यापार करने पर नेपाल ने क्या कहा

भारत और चीन द्वारा लिपुलेख के माध्यम से सीमा व्यापार फिर से शुरू करने पर सहमति जताने के एक दिन बाद नेपाल ने बुधवार को कहा कि यह क्षेत्र उसका अविभाज्य हिस्सा है और इसे उसके आधिकारिक मानचित्र में भी शामिल किया गया है। नेपाली विदेश मंत्रालय ने कहा, ‘नेपाल सरकार का स्पष्ट मत है कि महाकाली नदी के पूर्व में स्थित लिंपियाधुरा, लिपुलेख और कालापानी नेपाल के अविभाज्य अंग हैं। इन्हें आधिकारिक तौर पर नेपाली मानचित्र में भी दर्ज किया गया है और संविधान में भी शामिल किया गया है।’ नेपाल सरकार के बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए भारत के विदेश मंत्रालय ने कहा कि ऐसे दावे ‘न तो उचित हैं और न ही ऐतिहासिक तथ्यों तथा साक्ष्यों पर आधारित हैं।’भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा, ‘लिपुलेख दर्रे के ज़रिए भारत और चीन के बीच सीमा व्यापार 1954 में शुरू हुआ था और दशकों तक जारी रहा है। हाल के वर्षों में कोरोना और अन्य घटनाओं के कारण यह व्यापार बाधित हुआ था। अब दोनों पक्ष इसे फिर से शुरू करने पर सहमत हुए हैं।’

नेपाल की आपत्ति पर भारत सरकार का जवाब

भारत ने लिपलेख दर्रे के माध्यम से सीमा व्यापार फिर से शुरू करने के उसके और चीन के फैसले पर नेपाल की आपत्ति को बुधवार को स्पष्ट रूप से खारिज करते हुए कहा कि इस क्षेत्र पर काठमांडू का दावा उचित नहीं है। नेपाल के विदेश मंत्रालय ने लिपुलेख दर्रे के माध्यम से सीमा व्यापार फिर से शुरू करने के इस कदम पर बुधवार को आपत्ति जताते हुए कहा था कि यह क्षेत्र नेपाल का अविभाज्य हिस्सा है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने नेपाल के इस क्षेत्र पर दावों को खारिज कर दिया। उन्होंने कहा, ‘हमने लिपुलेख दर्रे के माध्यम से भारत और चीन के बीच सीमा व्यापार को फिर से शुरू करने से संबंधित नेपाल के विदेश मंत्रालय की टिप्पणियों पर गौर किया है।’ जायसवाल ने कहा, ‘इस संबंध में हमारी स्थिति सुसंगत और स्पष्ट रही है। लिपुलेख दर्रे के जरिए भारत और चीन के बीच सीमा व्यापार 1954 में शुरू हुआ था और दशकों तक जारी रहा है।’ उन्होंने कहा कि हाल के वर्षों में कोविड-19 और अन्य घटनाओं के कारण यह व्यापार बाधित हुआ था। अब दोनों पक्ष इसे फिर से शुरू करने पर सहमत हुए हैं।

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