पाकिस्तान का किराना हिल्स फिर चर्चा में है। हालांकि पाकिस्तान की ये जगह 80 के दशक में तभी से दुनिया की नजरों में है जब से पाकिस्तान ने इसे अपना परमाणु ठिकाना बनाया है। लेकिन ऑपरेशन सिंदूर के दौरान किराना हिल्स खूब चर्चा में आया था। अब पूर्व चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (CDS) जनरल अनिल चौहान के बयान से दोबारा इस पर चर्चा तेज हो गई है। जनरल चौहान ने इस पूरी घटना पर जो भी खुलासे किए, उस पर सभी का ध्यान गया। उन्होंने स्पष्ट किया कि किराना हिल्स में हलचल की क्या वजह थी और क्या वाकई भारत ने यहां मिसाइल हमला किया था। क्या है पूरा मामला इसे समझते हैं, साथ ही जानते हैं किराना हिल्स कहां है, और पाकिस्तान के लिए इतना खास क्यों है।
कहां है किराना हिल्स?
यह पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में स्थित सरगोधा जिले (Sargodha) के पास लगभग 10 किलोमीटर उत्तर में फैली एक चट्टानी पहाड़ी श्रृंखला है। अपनी भूरी-काली चट्टानों के कारण इसे ब्लैक माउंटेन भी कहा जाता है। यह इलाका पाकिस्तान वायु सेना के 'मुशाफ एयरबेस' (Mushaf Airbase) का हिस्सा है और रक्षा मंत्रालय के अधीन आता है। रणनीतिक रूप से यह भारत-पाक सीमा के बेहद करीब और पाकिस्तान के सबसे प्रमुख एयरबेस सरगोधा एयरबेस के पास स्थित है। 1980 और 1990 के दशक में यह पहाड़ी अचानक दुनिया भर की खुफिया एजेंसियों की नजरों में आ गई थी।
क्या यहां न्यूक्लियर हथियार हैं?
पाकिस्तान ने 1983 से 1995 के दौरान किराना हिल्स की भूमिगत सुरंगों में लगभग 24 'सब-क्रिटिकल' परमाणु परीक्षण किए थे। किराना हिल्स पाकिस्तान के रणनीतिक परमाणु कमांड (Strategic Forces Command) और नेशनल डिफेंस कॉम्प्लेक्स का मुख्य केंद्र माना जाता है। सुरक्षा विशेषज्ञों के मुताबिक, यहां पाकिस्तान के परमाणु हथियार और लॉन्च डिलीवरी सिस्टम (जैसे शाहीन मिसाइलें व एफ-16 विमानों के हथियार) भूमिगत डिपो में रखे गए हैं। सुरक्षा कारणों से पाकिस्तान ने कभी आधिकारिक तौर पर संख्या नहीं बताई है, इसलिए यहां रखे गए हथियारों की सटीक संख्या पता नहीं है। करीब 70 वर्ग किमी के दायरे में फैली इस फैसिलिटी के पूरे इलाके में जबरदस्त सुरक्षा व्यवस्था है। इस इलाके किसी भी तरह खतरे से पूरी तरह से सुरक्षित माना जाता था। किराना हिल्स सड़क, रेल और एयर ट्रांसपोर्ट सीधे तौर पर जुड़ा हुआ है।
परमाणु परीक्षण और हथियारों की तैनाती का सच
दरअसल, भारत से मुकाबले के लिए पाकिस्तान ने कराची या इस्लामाबाद के बजाय किराना हिल्स को देश के परमाणु कार्यक्रम का केंद्र बिंदु बनाया था। 1980 के दशक में पाकिस्तान परमाणु आयोग (PAEC) ने किराना हिल्स की सुरंगों में कई 'कोल्ड न्यूक्लियर टेस्ट' (बिना रेडियोएक्टिव विस्फोट के डेटोनेटर परीक्षण) किए थे। इन पहाड़ियों के भीतर पाकिस्तान ने एक विशाल भूमिगत बंकर और टनल नेटवर्क तैयार किया। पश्चिमी मीडिया और खुफिया रिपोर्ट्स के अनुसार, पाकिस्तान अपने अधिकांश सामरिक परमाणु हथियारों (Tactical Nuclear Weapons) और मिसाइलों को यहीं सुरक्षित स्थिति में रखता है।
जब भारत ने नापी थी किराना हिल्स की धड़कन
1980 के दशक के बाद जब भारत को यह खुफिया जानकारी मिली कि पाकिस्तान किराना हिल्स में परमाणु हथियार बनाने और उनके परीक्षण की अंतिम तैयारी कर रहा है, तब भारतीय सशस्त्र बलों और खुफिया एजेंसी 'रॉ' (RAW) को एक विशेष अभियान के लिए अलर्ट मोड पर रखा गया था। रणनीतिक गलियारों में यह चर्चा हमेशा रही कि भारत और इजराइल मिलकर किराना हिल्स और कहूटा स्थित पाकिस्तानी परमाणु प्रतिष्ठानों पर एक बड़ा हवाई हमला करने की योजना पर काम कर रहे थे, ताकि पाकिस्तान के परमाणु सपने को समय रहते नेस्तनाबूद किया जा सके। हालांकि यह स्ट्राइक सीधे तौर पर नहीं हुई, लेकिन भारत की सख्त सैन्य लामबंदी और कूटनीतिक दबाव के कारण पाकिस्तान को अपने परीक्षणों को टालने और अपनी परमाणु गतिविधियों को पीछे खींचने पर मजबूर होना पड़ा था। आज भी किराना हिल्स पाकिस्तान का सबसे अत्यधिक सुरक्षित और संवेदनशील नो-गो जोन बना हुआ है, जिसकी निगरानी चौबीसों घंटे रडार और मिसाइल डिफेंस सिस्टम द्वारा की जाती है।
ऑपरेशन सिंदूर के दौरान क्या हुआ था?
मई 2025 में भारत द्वारा चलाए गए 'ऑपरेशन सिंदूर' के दौरान यह अटकलें लगाई जाने लगीं कि क्या भारत ने पाकिस्तान के किराना हिल्स स्थित परमाणु ठिकाने पर हमला किया है, क्योंकि पाकिस्तानी मीडिया में किराना हिल्स से धुएं के गुबार की तस्वीरें सामने आई थीं। अब पूर्व चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (CDS) जनरल अनिल चौहान ने इस पूरी घटना पर स्थिति स्पष्ट की है। उन्होंने कहा कि यह कोई जानबूझकर किया गया हमला नहीं था। भारत ने किराना हिल्स या पाकिस्तान के किसी भी न्यूक्लियर इंफ्रास्ट्रक्चर को जानबूझकर निशाना नहीं बनाया था। हमले की रणनीति के तहत भारत ने सरगोधा के आसपास पाकिस्तानी रडार सिस्टम को ढूंढने के लिए कई लॉइटरिंग म्यूनिशन (कम ऊंचाई वाले सुसाइड ड्रोन) भेजे थे। इन ड्रोनों की परिचालन समय-सीमा लगभग 2 घंटे होती है। जब वे निर्धारित समय में रडार का लक्ष्य नहीं ढूंढ पाते, तो वे अपने आप नीचे गिरकर नष्ट हो जाते हैं। रडार न मिलने के कारण एक ऐसा ही भारतीय ड्रोन किराना हिल्स की एक पहाड़ी पर जाकर गिर गया था, जिसके धमाके की वजह से वहां धुआं उठता दिखाई दिया था।