बेहद खास है ISRO-NASA का NISAR सैटेलाइट, 747 KM से पृथ्वी को करेगा स्कैन, आपदाओं को पहले ही लेगा भांप
- Written by: आलोक कुमार राव
- Updated Jul 30, 2025, 07:43 PM IST
NISAR L-बैंड और S-बैंड दो रडार फ्रीक्वेंसी पर काम करेगा। L-बैंड ऊंचे पेड़ों जैसी लंबी वनस्पतियों को मापने के लिए आदर्श है, जबकि S-बैंड झाड़ियों और छोटे पौधों जैसी छोटी वनस्पतियों की अधिक सटीक रीडिंग प्राप्त करने में सक्षम है। NASA के जेट प्रोपल्शन लेबोरेटरी और भारत के ISRO ने इस मिशन का कार्यभार साझा किया।
प्राकृतिक आपदाओं को पहले मिल पाएगी जानकारी। तस्वीर-इसरो
What is NISAR Project: भारतीय अंतरिक्ष एजेंसी इसरो और अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा निसार पोजेक्ट के जरिए अपने सहयोग को एक नई ऊंचाई पर ले गए हैं। दोनों अंतरिक्ष एजेंसियों द्वारा संयुक्त रूप से विकसित यह रडार उपग्रह अपने विकास एवं लक्ष्यों को लेकर अनूठा है। इस सैटेलाइट में लगा रडार इतना शक्तिशाली है कि धरती पर होने वाले हर तरह के बदलावों को यह अपने कैमरे में कैद कर लेगा। चाहे पृथ्वी पर जमी बर्फ के पिघलने की बात हो या जमीन-पहाड़ी के दरकने की, धरती के हिस्से में कोई भी बदलाव इसकी नजरों से छूट नहीं पाएगा। पृथ्वी की धरातल पर होने वाले छोटे से छोटे बदलावों को अपने कैमरे में कैदकर यह तत्काल इसकी सूचना अपने केंद्र को देगा। इससे मानव जनित और प्राकृतिक आपदाओं दोनों को रोकने एवं उन्हें टालने में मदद मिलेगी।
पूरा नाम 'नासा-इसरो सिंथेटिक अपरचर रडार'
निसार का पूरा नाम 'नासा-इसरो सिंथेटिक अपरचर रडार' है। पिकअप ट्रक साइज के आकार वाले इस उपग्रह को बुधवार शाम पांज बजकर 40 मिनट पर सतीश धवन स्पेस सेंटर से इस रॉकेट से रवाना किया जाएगा। इसरो का जियोसिंक्रोनस सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल (GSLV) F-16 रॉकेट उपग्रह को लेकर अंतरिक्ष में जाएगा। निसार प्रोजेक्ट को अंतरिक्ष एवं तकनीक क्षेत्र में भारत और अमेरिका के प्रगाढ़ संबंधों और पीएम मोदी एवं अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच बेहतर केमेस्ट्री से भी जोड़कर देखा गया है। रिपोर्टों के मुताबिक इस प्रोजेक्ट के बारे में नासा अर्थ साइंस डिविजन के डाइरेक्टर करेन सेंट जर्मैन का कहना है कि 'हमारे ग्रह की सतह लगातार एवं वास्तविक बदलावों से गुजर रही है।'
लंबवत एक सेंटीमीटर के बदलाव को भी पकड़ लेगा
उन्होंने कहा कि 'धरती पर कई तरह के बदलाव हो रहे हैं। कुछ बदलाव बहुत धीमे तो कुछ तेजी के साथ हो रहे हैं। कुछ बदलाव बड़े पैमाने पर और कुछ छोटे स्तर पर हो रहे हैं।' इस रडार के सक्रिय हो जाने के बाद धरती के लंबवत सतह में बेहद छोटा यानी एक सेंटीमीटर का सूक्ष्म बदलाव भी यदि होता है तो यह वैज्ञानिकों की पकड़ में आ जाएगा। बदलाव की यह पहचान भूकंप, भूस्खलन, ज्वालामुखी विस्फोट से लेकर पुराने बांध एवं पुलों जैसी प्राकृतिक और मानव निर्मित दोनों तरह की आपदाओं को टालने में बड़ी भूमिका निभाएगी।

इसरो-नासा का संयुक्त कार्यक्रम है निसार। तस्वीर-इसरो ट्विटर
'अब तक का यह हमारा सबसे जटिल रडार'
जर्मैन ने आगे कहा कि धरती की सतह में होने वाले उभार, हलचल, उसके क्षरण, पर्वतीय ग्लेशियरों और ग्रीनलैंड एवं अंटार्किट में बर्फ पिघलने की घटनाओं को हम इस रडार के माध्यम से देख सकेंगे। यहां तक कि जंगल में आग लगने का भी हमें पता चल जाएगा। वैज्ञानिक ने NISAR के बारे में कहा कि 'यह हमारे द्वारा बनाया गया अब तक का सबसे जटिल रडार है।'
हर 12 दिन पर धरातल को करेगा स्कैन
12 मीटर डिश की आकार वाला इसका रडार अंतरिक्ष में खुलेगा और 747 किलोमीटर की ऊंचाई से प्रत्येक 12 दिन पर पृथ्वी के लगभग पूरे धरातल एवं बर्फ वाले हिस्से को दो बार स्कैन करेगा। घूमते हुए उपग्रह पृथ्वी की सतह पर माइक्रोवेव्स छोड़ेगा और सतह से उठने वाली तरंगो को प्राप्त करेगा। इस उपग्रह के जरिए धरातल की ज्यादा विस्तृत एवं उच्च क्षमता वाले तस्वीरें उपलब्ध हो पाएंगी। निसार की तरह का परिणाम पाने के लिए पारंपरिक रडार में 12 मील चौड़ा डिश लगाना होगा जो कि व्यावहारिक नहीं है।
दो रडार फ्रीक्वेंसी पर काम करेगा NISAR
रिपोर्टों के मुताबिक निसार L-बैंड और S-बैंड दो रडार फ्रीक्वेंसी पर काम करेगा। L-बैंड ऊंचे पेड़ों जैसी लंबी वनस्पतियों को मापने के लिए आदर्श है, जबकि S-बैंड झाड़ियों और छोटे पौधों जैसी छोटी वनस्पतियों की अधिक सटीक रीडिंग प्राप्त करने में सक्षम है। NASA के जेट प्रोपल्शन लेबोरेटरी और भारत के ISRO ने इस मिशन का कार्यभार साझा किया। दोनों ने दुनिया के विपरीत हिस्सों में सैटेलाइट के अलग-अलग हिस्से बनाए और फिर उन्हें भारत के बेंगलुरु स्थित ISRO के सैटेलाइट इंटीग्रेशन एंड टेस्टिंग इस्टैब्लिशमेंट में जोड़ा और परीक्षण किया। इस मिशन में NASA का योगदान लगभग 1.2 बिलियन डॉलर और ISRO का खर्च करीब 90 मिलियन डॉलर का है।
स्पेस की दुनिया में इसरो बना रहा कीर्तिमान
भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम हाल के वर्षों में काफी आगे बढ़ चुका चुका है। 2014 में मंगल की कक्षा में प्रोब भेज और 2023 में चंद्रमा पर रोबोट और रोवर की सफल लैंडिंग कराकर इसरो ने स्पेस तकनीक की अपनी योग्यता साबित कर दी है। भारतीय वायुसेना के ग्रुप कैप्टन शुभांशु शुक्ला हाल ही में अंतरिक्ष की यात्रा करने वाले दूसरे और अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (ISS) की यात्रा करने वाले पहले भारतीय बने। भारत के स्वदेशी मानव अंतरिक्ष मिशन ‘गगनयान’ की दिशा में यह अहम कदम है। भारत का 'गगनयान' मिशन 2027 में रवाना होगा।