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'खून और पानी साथ नहीं बहेंगे', Operation Sindoor के बाद भारत की नई रेड लाइन क्या है? जिससे तड़प रहा पाकिस्तान

Operation Sindoor: ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारत ने साफ कर दिया है कि अब आतंकवाद के खिलाफ जवाब केवल सैन्य कार्रवाई तक सीमित नहीं रहेगा। सिंधू जल समझौता पर रोक इसका सबसे बड़ा उदाहरण है।

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पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत की नई रेडलाइन
Compiled by: Shishupal Kumar
Updated May 7, 2026, 12:42 IST

Operation Sindoor: ऑपरेशन सिंदूर का एक साल पूरा हो चुका है, पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत ने पाकिस्तान (Pakistan) के अंदर जो तबाही बचाई थी, उसकी निशानियां आज भी वहां मौजूद हैं, लेकिन एक निशानी ऐसी है, जिसने काफी शांत तरीके से पाकिस्तान को चोट पहुंचाई है, इसका दर्द पाकिस्तान जब तब दुनिया के सामने दिखाता भी रहा है, लेकिन भारत अडिग है कि खून और पानी एक साथ नहीं बह सकते। पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत ने सिंधू जल संधि को सस्पेंड कर दिया, जो आज भी बरकरार है। पाकिस्तान इस संधि को बहाल करवाने के लिए दुनिया से गुहार लगा रहा, लेकिन भारत की सख्ती के सामने कोई उसकी नहीं सुन रहा है। आइए समझने हैं ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारत की नई रेड लाइन से क्या-क्या बदला, कैसे पाकिस्तान, प्यासा रहने के लिए मजबूर हुआ है?

किस गलती को भारत ने पहलगाम हमले के बाद किया ठीक?

साल 1960 में भारत और पाकिस्तान के बीच विश्व बैंक की मध्यस्थता में सिंधु जल संधि पर हस्ताक्षर हुए थे। उस समय भारत के प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू और पाकिस्तान के राष्ट्रपति आयूब खान थे। इस संधि के तहत सिंधु नदी प्रणाली की छह नदियों का बंटवारा किया गया। रावी, ब्यास और सतलुज नदियों का नियंत्रण भारत को मिला, जबकि सिंधु, झेलम और चिनाब जैसी पश्चिमी नदियों का अधिकांश पानी पाकिस्तान को दिया गया। ANI की रिपोर्ट के अनुसार विशेषज्ञों के मुताबिक, इस समझौते के कारण भारत ने अपने हिस्से के करीब 80 प्रतिशत पानी के उपयोग का अधिकार छोड़ दिया। भारत को पश्चिमी नदियों पर सीमित कृषि, घरेलू और गैर-उपभोग उपयोग की अनुमति मिली, लेकिन बड़े स्तर पर जल भंडारण या परियोजनाओं पर पाकिस्तान आपत्ति दर्ज करा सकता था। यही वजह है कि भारत में लंबे समय से यह बहस चलती रही कि यह संधि पाकिस्तान के पक्ष में अधिक झुकी हुई है। भारत ने जब इस समझौते को सस्पेंड किया तो यह कहा जाने लगा कि भारत अपनी ऐतिहासिक भूल को सुधार रहा है।

लद्दाख में जांस्कर और सिंधु नदियों का संगम (फोटो- Canva)

लद्दाख में जांस्कर और सिंधु नदियों का संगम (फोटो- Canva)

ऑपरेशन सिंदूर और भारत की नई रेडलाइन

पहलागम आतंकी हमले के बाद भारत ने जिस तरह की प्रतिक्रिया दी, उसे “नई सुरक्षा नीति” के रूप में देखा गया। भारत ने नियंत्रण रेखा पार किए बिना आतंकवादी ढांचे को निशाना बनाया और साथ ही कूटनीतिक एवं आर्थिक दबाव बढ़ाने की रणनीति अपनाई। इसी दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था—"भारत ने अब फैसला कर लिया है कि खून और पानी एक साथ नहीं बहेंगे। जनता को यह एहसास हो गया है कि सिंधु जल संधि अन्यायपूर्ण थी। सिंधु नदी प्रणाली का पानी दुश्मन देशों की भूमि की सिंचाई करता था जबकि हमारे किसान पीड़ित होते थे। हमारे किसानों के हित में और राष्ट्र के हित में, सिंधु जल संधि हमें स्वीकार्य नहीं है।” यह बयान केवल राजनीतिक संदेश नहीं था, बल्कि भारत की नई नीति का संकेत माना गया। सरकार का तर्क है कि जब पाकिस्तान लगातार सीमा पार आतंकवाद को समर्थन देता है, तब सहयोग की पुरानी व्यवस्था जारी रखना तर्कसंगत नहीं है।

पानी रोकने के फैसले को कैसे देखते हैं विशेषज्ञ?

पूर्व राजनयिक दिलीप सिन्हा ने ANI से एक टेलीफोनिक बातचीत में बताया कि इस संधि के कारण भारत को लंबे समय तक नुकसान उठाना पड़ा। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान का रवैया हमेशा बाधा डालने वाला और बेहद नकारात्मक रहा, जिसके चलते भारत को अपनी कई परियोजनाओं में देरी करनी पड़ी और लगातार नई चुनौतियों का सामना करना पड़ा। उन्होंने कहा, “संधि के दौरान हमारा अनुभव यही रहा कि पाकिस्तान लगातार अड़चनें पैदा करता रहा। कई मामलों में संधि के तहत बने तंत्र ने भारत के पक्ष को सही ठहराया, लेकिन इसके बावजूद पाकिस्तान ने बाधा डालने की नीति नहीं छोड़ी। इससे भारत के लिए संधि के तहत मिलने वाले सीमित लाभों का उपयोग करना भी मुश्किल हो गया।”

पूर्व राजनयिक के अनुसार, सिंधु जल संधि इस उम्मीद में हुई थी कि दोनों देश सहयोग के जरिए साझा संसाधनों का आपसी लाभ के लिए उपयोग करेंगे। सिंधु नदी प्रणाली में सिंधु, झेलम, चिनाब, रावी, ब्यास और सतलुज नदियां शामिल हैं। इसका अधिकांश हिस्सा भारत और पाकिस्तान में फैला है, जबकि कुछ भाग चीन और अफगानिस्तान में भी पड़ता है। 1960 में हुई संधि के तहत रावी, ब्यास और सतलुज जैसी पूर्वी नदियों का लगभग 33 मिलियन एकड़ फीट पानी भारत को मिला, जबकि सिंधु, झेलम और चिनाब जैसी पश्चिमी नदियों का लगभग 135 मिलियन एकड़ फीट पानी पाकिस्तान को आवंटित किया गया। भारत को इन पश्चिमी नदियों पर सीमित कृषि और घरेलू उपयोग की अनुमति दी गई। इसके बावजूद पाकिस्तान लगातार भारतीय परियोजनाओं पर आपत्तियां उठाता रहा है। दिलीप सिन्हा ने कहा कि पाकिस्तान ने भारत द्वारा बनाए गए सहयोग तंत्रों का भी दुरुपयोग किया।

उन्होंने कहा, “पाकिस्तान ने कभी सहयोग की वास्तविक इच्छा नहीं दिखाई। उसने हर अवसर का इस्तेमाल भारत के खिलाफ आतंकवाद को बढ़ावा देने के लिए किया। चाहे नियंत्रण रेखा पार व्यापार हो, बस सेवा हो या लोगों की आवाजाही—इन सभी व्यवस्थाओं का इस्तेमाल आतंकवाद फैलाने में किया गया। इसलिए भारत को आतंकवाद और सहयोग के बीच स्पष्ट संबंध स्थापित करना पड़ा।”

पूर्व जम्मू-कश्मीर डीजीपी शेष पॉल वैद ने ANI से कहा कहा कि पानी भविष्य की सबसे बड़ी रणनीतिक शक्ति बनने जा रहा है। उन्होंने कहा, “पानी ही सब कुछ है। भविष्य के युद्ध पानी पर होंगे। देश के आर्थिक और कृषि विकास के लिए पानी सबसे अहम संसाधन है।” उन्होंने सिंधु जल संधि को “एकतरफा समझौता” बताते हुए कहा कि यह भारत के साथ न्यायपूर्ण नहीं था। कई आलोचक इसे रेडक्लिफ लाइन के बाद भारत का “दूसरा विभाजन” भी बताते हैं।

पाकिस्तान की गुहार

पाकिस्तान में पानी की कमी होने लगी है, यही कारण है कि पाकिस्तान कभी गिदड़भभकी देता है तो कभी दुनिया के सामने गुहार लगाता है। इसी क्रम में बगलिहार बांध एक बार फिर चर्चा में है। चिनाब नदी पर बने इस बांध को लेकर पाकिस्तान पहले भी आपत्ति उठा चुका है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, ऑपरेशन सिंदूर के बाद से इस बांध के गेट लंबे समय तक बंद रखे गए। पाकिस्तान ने हेग स्थित स्थायी मध्यस्थता न्यायालय में भारत की कई परियोजनाओं—किरु, क्वार, बगलीहार और दुलहस्ती—को चुनौती दी है। उसका आरोप है कि भारत संधि के नियमों से अधिक जल भंडारण कर रहा है। लेकिन भारत का कहना है कि संधि स्थगित होने के बाद वह इन दायित्वों से बंधा नहीं है।

चेनाब नदी पर स्थित एक विद्युत परियोजना (फाइल फोटो- ANI)

चेनाब नदी पर स्थित एक विद्युत परियोजना (फाइल फोटो- ANI)

क्या भारत संधि पूरी तरह खत्म कर सकता है?

अंतरराष्ट्रीय कानून के जानकारों के अनुसार, सिंधु जल संधि को पूरी तरह समाप्त करना आसान नहीं होगा, क्योंकि यह विश्व बैंक की मध्यस्थता में हुआ अंतरराष्ट्रीय समझौता है। हालांकि भारत यह तर्क दे रहा है कि जब पाकिस्तान लगातार आतंकवाद को समर्थन दे रहा है, तब परिस्थितियां बदल चुकी हैं और भारत को अपने राष्ट्रीय हितों के अनुसार फैसले लेने का अधिकार है। दिलीप सिन्हा ने आगे कहा कि अब फैसला पाकिस्तान के हाथ में है। उन्होंने कहा कि भारत को अपने जल संसाधनों का अधिकतम उपयोग अपने नागरिकों के हित में करना चाहिए। उन्होंने कहा, “मेरी व्यक्तिगत राय है कि इस संधि को पूरी तरह समाप्त कर देना चाहिए। अंतरराष्ट्रीय कानून में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है जो हमें इस समझौते के लिए बाध्य करे। जब पाकिस्तान हमारे खिलाफ शत्रुतापूर्ण रवैया जारी रखे हुए है और आतंकवाद को बढ़ावा दे रहा है, तो भारत को अपने राष्ट्रीय हितों के खिलाफ जाकर कोई समझौता नहीं करना चाहिए।”

पानी न मिलने से बेहाल हुआ पाकिस्तान

पाकिस्तान की कृषि और जल आपूर्ति का बड़ा हिस्सा सिंधु नदी प्रणाली पर निर्भर है। खासकर पंजाब और सिंध प्रांत की खेती इन नदियों के पानी से चलती है। इसलिए भारत द्वारा संधि को स्थगित रखना पाकिस्तान के लिए रणनीतिक दबाव का कारण बन सकता है। हालांकि भारत ने अभी पानी पूरी तरह रोकने जैसा कोई कदम नहीं उठाया है, लेकिन उसने यह स्पष्ट कर दिया है कि अब वह अपने जल संसाधनों का अधिकतम उपयोग करेगा।विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर भारत पश्चिमी नदियों पर अधिक जलविद्युत परियोजनाएं, बांध और सिंचाई ढांचे विकसित करता है, तो पाकिस्तान पर दीर्घकालिक दबाव बढ़ सकता है।

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