Times Now Navbharat
live-tv
Premium

UP राज्यसभा चुनाव : सपा को क्यों है तीसरी सीट पर जीत की उम्मीद? 8वीं सीट पर BJP क्यों दे रही जोर

भाजपा के पास लगभग 255-256 विधायक हैं। अपना दल (एस) के 13, रालोद के 9, सुभासपा के 6 और निषाद पार्टी के 5 विधायकों को जोड़ने पर NDA का आंकड़ा करीब 288-289 बैठता है। विपक्षी खेमे में सपा के 101 और कांग्रेस के 2 विधायक हैं, यानी कुल 103। NDA को सात सीटों के लिए 7 × 37 यानी 259 वोट चाहिए।

Image
यूपी में इसी महीने राज्यसभा की 10 सीटों पर चुनाव होने हैं। तस्वीर-AI
Written by: आलोक कुमार राव
Updated Oct 2, 2026, 13:50 IST
Follow on Google News

UP Rajyasabha Election 2026: उत्तर प्रदेश की 10 राज्यसभा सीटों के लिए 16 अक्टूबर को मतदान है। कागज पर तस्वीर साफ है। भाजपा के सात और सपा के दो उम्मीदवार आराम से जीत रहे हैं। असली लड़ाई दसवीं सीट की है। यह चुनाव विधानसभा चुनाव से कुछ महीने पहले दोनों खेमों की एकजुटता का इम्तिहान भी है। यूपी विधानसभा की स्वीकृत संख्या 403 है, पर छह सीटें खाली होने से प्रभावी संख्या 397 है। राज्यसभा चुनाव में एक सीट जीतने के लिए न्यूनतम वोट का सूत्र है। कुल वोट ÷ सीटें + 1)) + 1। यानी 397 ÷ 11 का पूर्णांक 36 और उसमें एक जोड़ने पर कोटा 37 आता है। दस सीटों के लिए कुल 370 प्रथम वरीयता वोट चाहिए।

रिपोर्ट्स के मुताबिक भाजपा के पास लगभग 255-256 विधायक हैं। अपना दल (एस) के 13, रालोद के 9, सुभासपा के 6 और निषाद पार्टी के 5 विधायकों को जोड़ने पर NDA का आंकड़ा करीब 288-289 बैठता है। विपक्षी खेमे में सपा के 101 और कांग्रेस के 2 विधायक हैं, यानी कुल 103। NDA को सात सीटों के लिए 7 × 37 यानी 259 वोट चाहिए। 289 में से 259 घटाने पर करीब 30 वोट बचते हैं। आठवीं सीट के लिए लगभग 7 वोट कम पड़ते हैं। सपा+कांग्रेस: दो सीटों के लिए 74 वोट लगते हैं। 103 में से 29 वोट बचते हैं। तीसरी सीट के लिए लगभग 8-9 वोट कम हैं। मीडिया रिपोर्ट्स में सपा के लिए 9 वोटों की कमी बताई गई है। बाकी करीब पांच विधायक छोटे दलों या निर्दलीयों के हैं। यानी दोनों खेमे बाहरी समर्थन या सेंधमारी के बिना अपनी अतिरिक्त सीट नहीं निकाल सकते।

किसके पास ज्यादा विकल्प?

कमी का आकार देखें तो भाजपा की स्थिति बेहतर है। उसे सात के आसपास अतिरिक्त वोट चाहिए और उसके पास पांच-छह निर्दलीय या छोटे दलों के विधायकों से शुरुआत करने का रास्ता खुला है। सपा को आठ-नौ वोट चाहिए, जबकि बाहर का पूल बहुत छोटा है। उसके लिए तीसरी सीट का मतलब लगभग तय रूप से भाजपा या सहयोगी खेमे में सेंध लगाना है। दिलचस्प बात यह है कि रिपोर्ट्स के अनुसार सपा तीन उम्मीदवार उतारने की तैयारी में है, जबकि संख्या दो की ही है। इसका एक राजनीतिक मकसद साफ है। भाजपा को आठवां उम्मीदवार उतारने से रोकना नहीं, बल्कि उसे अपने विधायकों को संभालने में व्यस्त रखना, और अपने कार्यकर्ताओं को लड़ाकू संदेश देना।

cm yogi

cm yogi

2024 की याद: जब आठवीं सीट ने खेल बदला

यह लड़ाई नई नहीं है। 2024 में भी भाजपा ने आठवें उम्मीदवार संजय सेठ को उतारा था और सपा के कई विधायकों की क्रॉस वोटिंग से वे जीत गए, जबकि सपा का तीसरा उम्मीदवार हार गया। उस चुनाव से पहले भी सपा विधायक अखिलेश यादव के डिनर से गायब रहे थे, और राजा भैया की पार्टी ने भाजपा को समर्थन दिया था। इसीलिए इस बार पूरा ध्यान इस पर है कि सपा अपना कुनबा कितना बांधकर रख पाती है। 2024 का सबक यह है कि राज्यसभा चुनाव में बगावत अक्सर तब होती है जब विधायकों को लगता है कि पार्टी में उनका भविष्य अनिश्चित है या सत्ता पक्ष के साथ बेहतर संभावना है।

क्रॉस वोटिंग क्यों होती है?

राज्यसभा चुनाव में पार्टी के विधायकों को अपना मतपत्र पार्टी के अधिकृत एजेंट को दिखाना होता है। यानी खुली वोटिंग है। फिर भी क्रॉस वोटिंग होती है, क्योंकि आमतौर पर इसका नतीजा दल-बदल कानून के तहत सदस्यता जाना नहीं होता। पार्टी ज्यादा से ज्यादा निष्कासन जैसी कार्रवाई कर सकती है। जो विधायक पहले से टिकट कटने की आशंका में हों या दूसरे दल में जाने का मन बना चुके हों, उनके लिए कीमत कम है। विधानसभा चुनाव में अब कुछ ही महीने बचे हैं। इसलिए बहुत से विधायक अभी से अपने अगले ठिकाने का हिसाब लगा रहे होंगे। यही वजह है कि इस बार का दबाव 2024 से ज्यादा तीखा हो सकता है।

भाजपा के उम्मीदवारों की सूची का संदेश

रिपोर्ट्स के अनुसार भाजपा की कोर कमेटी में लगभग 20 नामों पर चर्चा हुई और आठ नाम तय किए गए। इनमें स्मृति ईरानी, हरदीप सिंह पुरी, हरीश द्विवेदी, रेखा वर्मा, राजवीर सिंह, प्रियंका रावत और कौशल किशोर के नाम बताए जा रहे हैं। ये अभी मीडिया रिपोर्ट्स हैं, आधिकारिक घोषणा नामांकन के साथ ही पक्की होगी। अगर यह सूची सही निकलती है तो इसमें जातीय संतुलन साफ़ दिखता है: ब्राह्मण, पिछड़े, दलित और महिला चेहरे एक साथ। यह राज्यसभा की सीटों के बहाने 2027 की सामाजिक इंजीनियरिंग का पूर्वाभ्यास है। स्मृति ईरानी की वापसी की चर्चा अलग से राष्ट्रीय राजनीति में भाजपा के इरादों का संकेत देती है।

akhilesh yadav

akhilesh yadav

सपा के लिए जोखिम और अवसर

सपा के सामने दोहरी चुनौती है। पहली, अपने 101 विधायकों को पूरी तरह एकजुट रखना, क्योंकि जो सात-आठ वोट कम हैं उनकी भरपाई उसे बाहर से करनी है और एक भी विधायक टूटा तो दूसरी सीट भी ख़तरे में पड़ सकती है। दूसरी, कांग्रेस के दो विधायकों और बाकी छोटे समूहों से तालमेल। अवसर यह है कि अगर सपा तीसरी सीट पर भाजपा-खेमे में कोई सेंध लगा लेती है तो यह 2027 से पहले बड़ा मनोवैज्ञानिक लाभ होगा। पर इसकी संभावना कमज़ोर दिखती है। असल में बेहतर रणनीति शायद यही होगी कि सपा तीसरे उम्मीदवार को संख्याबल के साथ उतारे या सीधे दो पर ही टिके, ताकि अपनी एकजुटता का प्रदर्शन करे। यह चुनाव सात सीटों का नहीं बल्कि एक सीट का है, और वह एक सीट सिर्फ संसद की कुर्सी नहीं बल्कि यूपी की सियासी नब्ज का पैमाना है। भाजपा के पास गणित और संसाधन दोनों ज्यादा हैं, जबकि सपा के लिए यह अपने घर को बचाने की परीक्षा है। 16 अक्टूबर का नतीजा बताएगा कि 2027 के महामुकाबले से पहले किसका संगठन ज्यादा कसा हुआ है।

End of Article