टीएमसी के 3 राज्यसभा सांसदों ने दिया इस्तीफा
बंगाल में लागू है महाराष्ट्र मॉडल: रिजू दत्ता
TMC Crisis: भारतीय राजनीति की गाथा में बगावत का एक और नया और ऐतिहासिक अध्याय लिखा जा रहा है। इस बार बारी तृणमूल कांग्रेस (TMC) की है। जिस ममता बनर्जी ने कभी कांग्रेस से बगावत करके अपनी खुद की पार्टी 'टीएमसी' को खड़ा किया था, आज उसी टीएमसी में खुद ममता बनर्जी के खिलाफ बगावत के सबसे तीखे सुर उठ रहे हैं।
पश्चिम बंगाल की सत्ता पर लगातार 15 साल तक एकछत्र राज करने वाली ममता दीदी इस समय अपने राजनीतिक जीवन के सबसे बुरे दौर से गुजर रही हैं। हालिया विधानसभा चुनाव में हार के बाद 4 मई को जैसे ही ममता बनर्जी के हाथ से मुख्यमंत्री की कुर्सी छिनी, उसके बाद से धीरे-धीरे उन्होंने अपनों का ही भरोसा खोना शुरू कर दिया। पार्टी में विद्रोह की शुरुआत पहले विधायकों से हुई फिर राज्यसभा सांसदों ने बगावत का बिगुल फूंका और अब लोकसभा सांसदों ने भी ममता दीदी से दूरी बनाने का आधिकारिक एलान कर दिया है।
टीएमसी में पड़ी फूट। PTI
समझें टीएमसी का पूरा 'नंबर गेम'
टीएमसी के भीतर बगावत का आंकड़ा इतना बड़ा है कि पार्टी पूरी तरह दो-फाड़ हो चुकी है। पिछले विधानसभा चुनाव में टीएमसी ने महज 80 सीटों पर जीत दर्ज की थी। लेकिन अब 58 विधायकों ने अलग गुट बना लिया है, जिसके बाद ममता बनर्जी के खेमे में सिर्फ 22 विधायक ही बचे हैं। लोकसभा में टीएमसी के कुल 28 सांसद थे, जिनमें से 19 सांसदों ने खुलकर बगावत कर दी है। इसके बाद ममता बनर्जी के पास लोकसभा में अब महज 9 सांसद ही रह गए हैं। राज्यसभा में पार्टी के 13 सांसद थे। इनमें से 3 सांसदों के इस्तीफे के बाद अब ममता बनर्जी के पास राज्यसभा में 10 सांसद ही बचे हैं। बता दें कि 8 जून को सुखेंदु शेखर राय ने राज्यसभा सदस्यता और पार्टी छोड़ी थी, जबकि 10 जून को सुष्मिता देव ने भी पार्टी से इस्तीफा दे दिया था।
बगावत की 5 बड़ी वजहें
सवाल है कि आखिर सत्ता गंवाने के बाद अचानक ऐसा क्या हुआ कि पार्टी में इतनी बड़ी कलह की स्थिति पैदा हो गई? राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, इसके पीछे ये 5 मुख्य कारण हैं।1. फर्जी हस्ताक्षर मामला
यह विवाद तब शुरू हुआ जब विधानसभा चुनाव में हार के बाद ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली मूल टीएमसी ने वरिष्ठ विधायक शोभनदेव चट्टोपाध्याय को विधानसभा में 'नेता प्रतिपक्ष' (LoP) बनाने का प्रस्ताव भेजा। लेकिन इस पत्र में कई विधायकों के हस्ताक्षर फर्जी पाए गए, जिसकी सीआईडी (CID) जांच भी चल रही है। इसी हंगामे के बीच 58 बागी विधायकों ने पूर्व सांसद ऋतब्रत बनर्जी (Ritabrata Banerjee) के नेतृत्व में विद्रोह कर दिया और विधानसभा अध्यक्ष से अलग विधायी दल के रूप में मान्यता मांग ली। चूंकि बागी विधायकों की संख्या दलबदल विरोधी कानून के तहत आवश्यक दो-तिहाई के आंकड़े को पार कर गई थी, इसलिए स्पीकर ने ऋतब्रत बनर्जी को आधिकारिक रूप से 'नेता प्रतिपक्ष' मान लिया। ममता बनर्जी के गुट ने इस फैसले को असंवैधानिक बताते हुए कलकत्ता हाईकोर्ट में चुनौती दी है।
2. शीर्ष लीडरशिप से भारी नाराजगी
हाल ही में संपन्न हुए विधानसभा चुनाव में पार्टी महज 80 सीटों पर सिमट गई और खुद ममता बनर्जी को भी चुनाव में हार का सामना करना पड़ा। इस करारी हार के बाद पार्टी के नेतृत्व और चुनावी रणनीति पर गंभीर सवाल उठने लगे। टीएमसी में विधायकों की नाराजगी उस समय खुलकर सामने आ गई, जब पार्टी की एक महत्वपूर्ण बैठक से 80 में से 61 विधायक गायब रहे। इसके बाद इनमें से 60 विधायकों ने बागी नेता ऋतब्रत बनर्जी को अपना खुला समर्थन दे दिया।
3.जमीनी कार्यकर्ताओं को दरकिनार कर देना
पार्टी और राज्यसभा से इस्तीफा देने के बाद वरिष्ठ नेता सुखेंदु शेखर राय ने आलाकमान पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि जिन निष्ठावान कार्यकर्ताओं ने अपना खून-पसीना बहाकर इस पार्टी को खड़ा किया था, नए दौर की राजनीति में उन्हें पूरी तरह से दरकिनार कर दिया गया, जिससे जमीनी स्तर पर भारी असंतोष फैला।
4.भतीजे अभिषेक बनर्जी की 'दादागिरी'
ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी को पार्टी का उत्तराधिकारी माना जा रहा था, लेकिन कई बागी नेताओं ने उन्हें 'अहंकारी' करार दिया है। अभिषेक बनर्जी पर आरोप है कि उन्होंने पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को छोड़कर बाहरी कॉरपोरेट एजेंसी आई-पैक (I-PAC) को जरूरत से ज्यादा महत्व दिया, जिससे कई कद्दावर नेता खुद को अपमानित महसूस कर रहे थे।
अभिषेक बनर्जी पर बागी नेताओं ने लगाए कई आरोप। TMC x handle
वरिष्ठ नेता कल्याण बनर्जी ने तो खुलकर अभिषेक की खिलाफत करते हुए कहा, "मैंने राजनीति के इस पेशे में 45 साल बिताए हैं। अभिषेक बनर्जी मुझे अपमानित नहीं कर सकते, मैं उनसे सीनियर हूं। अगर दीदी (ममता बनर्जी) उन पर ही निर्भर रहना चाहती हैं, तो रहें। मुझे छोड़ दें। हां, अगर वे अभिषेक से अलग होना चाहती हैं, तो मैं आज भी दीदी के साथ हूं।" (बता दें कि कल्याण बनर्जी अभी भी टीएमसी के साथ बने हुए हैं)।"
5. राजनीतिक भविष्य की चिंता
हार के बाद जमीनी स्तर पर माहौल इतना खराब है कि अभिषेक बनर्जी, कल्याण बनर्जी और मदन मित्रा जैसे कद्दावर नेताओं पर सार्वजनिक रूप से उग्र भीड़ द्वारा हमले किए गए और उन पर अंडे व पत्थर फेंके गए। ऐसे में बागी विधायकों और सांसदों में 'सेल्फ-प्रिजर्वेशन' (खुद को बचाने की भावना) काम कर रही है। उन्हें डर है कि अगर वे टीएमसी के साथ रहे, तो उन्हें जनता के इस भारी आक्रोश का शिकार होना पड़ेगा, जिससे उनका राजनीतिक भविष्य खत्म हो सकता है।
जो सांसद बागी हुए हैं, उन्हें पता है कि 2029 के अगले लोकसभा चुनाव में उन्हें फिर से जनता के बीच जाना है। चुनावी नतीजों से साफ है कि उनके क्षेत्रों में टीएमसी का जनाधार खिसक चुका है। इन सांसदों को लगा कि ममता दीदी का व्यक्तिगत प्रभाव कमजोर होने के बाद वे अपने दम पर चुनाव नहीं जीत पाएंगे, इसलिए उन्होंने अलग रास्ता चुन लिया।
लोकसभा अध्यक्ष को पत्र भेजने वाले 19 बागी सांसदों की लिस्ट
बागी सांसदों ने अलग गुट बनाने की मांग को लेकर 18 मई को ही लोकसभा अध्यक्ष के कार्यालय को अपने हस्ताक्षरित नामों की आधिकारिक सूची सौंप दी थी। इस लिस्ट में कई नाम बेहद चौंकाने वाले हैं, खासकर सायोनी घोष का नाम, जिन्हें कभी खुद अभिषेक बनर्जी ने यूथ विंग का चीफ बनाया था।
बागी सांसदों के नाम
काकोली घोष दस्तीदार
शताब्दी रॉय
बापी हलदर
डॉ. शर्मिला सरकार
प्रसून बंद्योपाध्याय
जगदीश बर्मा बसुनिया
असित कुमार मल
अरूप चक्रवर्ती
रचना बनर्जी
सायोनी घोष
खलीलुर्रहमान
अबू ताहिर खान
यूसुफ पठान
मिताली बैग
माला रॉय
कालीपद सोरेन
दीपक अधिकारी (देव)
जून मालिया
पार्थ भौमिक
इस बगावती चिट्ठी पर दिग्गज अभिनेता और सांसद शत्रुघ्न सिन्हा के हस्ताक्षर नहीं हैं। उन्होंने ममता बनर्जी के प्रति वफादारी जताते हुए कहा है, "मैं टीएमसी छोड़कर नहीं जाऊंगा। ममता बनर्जी ने मुश्किल घड़ी में मेरा साथ दिया था, इसलिए इस दुख की घड़ी में मैं उनके साथ मजबूती से खड़ा रहूंगा।" उनके अलावा कीर्ति आजाद भी अभी ममता दीदी के साथ हैं।
कल्याण बनर्जी और कीर्ति आजाद की फाइल फोटो। ANI
इंडी गठबंधन को बचाने की कवायद
पार्टी के भीतर मची इस भयंकर फूट के बीच ममता और अभिषेक बनर्जी दिल्ली में शरण ले रहे हैं। बगावत के इस दौर के बीच बुधवार को अभिषेक बनर्जी ने दिल्ली में कांग्रेस नेता राहुल गांधी से मुलाकात की। सूत्रों के अनुसार, दोनों नेताओं के बीच विपक्षी गठबंधन की एकजुटता और भविष्य की साझा रणनीति पर चर्चा हुई।इससे ठीक एक दिन पहले मंगलवार को ममता बनर्जी ने खुद 10 जनपथ जाकर सोनिया गांधी से करीब एक घंटे तक मुलाकात की थी, जिसे विपक्षी एकता के लिहाज से बेहद अहम माना जा रहा है। वहीं, 8 जून को लगभग दो साल बाद आयोजित हुई INDIA गठबंधन की मुख्य बैठक में भी ममता और अभिषेक शामिल हुए थे, जिसमें 25 विपक्षी दलों ने हिस्सा लिया था।
ममता बनर्जी ने की सोनिया गांधी से मुलाकात। ANI
"बंगाल में लागू है महाराष्ट्र मॉडल"
टीएमसी के निलंबित नेता रिजू दत्ता ने राज्य की राजनीति को लेकर एक बहुत बड़ा और सनसनीखेज दावा किया है। रिजू दत्ता का कहना है कि इस समय बंगाल में पूरी तरह "शिवसेना-महाराष्ट्र मॉडल" लागू हो चुका है, जैसा साल 2022 में महाराष्ट्र में देखने को मिला था।
रिजू दत्ता ने दावा किया कि हमारे पास दो-तिहाई से ज्यादा का बहुमत है और लगभग 50 से अधिक विधायक पूरी तरह एकजुट होकर हमारे साथ हैं। चूंकि हम ही असली तृणमूल कांग्रेस हैं, इसलिए विधानसभा में विपक्ष के नेता ऋतब्रत बनर्जी होंगे, न कि शोभनदेव चट्टोपाध्याय। चूंकि बहुमत हमारे पास है, इसलिए पार्टी का नाम, संगठन और चुनाव चिह्न (सिंबल) भी हमें ही मिलना चाहिए।
रिजू दत्ता के इस दावे से साफ है कि आने वाले दिनों में पश्चिम बंगाल के भीतर होने वाली राजनीतिक लड़ाई सिर्फ विधायकों और सांसदों की संख्या तक सीमित नहीं रहेगी; बल्कि यह लड़ाई 'असली टीएमसी' कौन है, पार्टी का चुनाव चिह्न किसके पास रहेगा और ममता बनर्जी की राजनीतिक विरासत पर किसका हक होगा, इस पर जाकर टिकेगी।
