Treaty of Versailles: करीब 38 दिन चक चला ईरान-अमेरिका युद्ध आखिरकार खत्म हो गया। पेरिस के ऐतिहासिक वर्साय (Versailles) में इस समझौते पर डोनाल्ड ट्रंप ने हस्ताक्षर किए। विश्व इतिहास के प्रतीकात्मक स्थल वर्साय में ट्रंप ने ईरान समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए। वर्साय, फ्रांस अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ऐतिहासिक पैलेस ऑफ वर्साय में ईरान के साथ हुए समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए। यह स्थान आधुनिक इतिहास की कई महत्वपूर्ण कूटनीतिक घटनाओं का साक्षी रहा है। इस हस्ताक्षर का विशेष प्रतीकात्मक महत्व है, क्योंकि 1919 में प्रथम विश्व युद्ध को औपचारिक रूप से समाप्त करने वाली वर्साय संधि (Treaty of Versailles) पर भी इसी स्थल पर विश्व नेताओं ने हस्ताक्षर किए थे। वर्साय का यह महल लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय वार्ताओं, शांति प्रयासों और ऐतिहासिक समझौतों की महत्वपूर्ण पृष्ठभूमि रहा है।
पिछली कई सदियों में वर्साय में कई ऐसी ऐतिहासिक संधियों पर हस्ताक्षर हुए हैं जिनसे युद्ध या क्षेत्रीय विवाद समाप्त हुए है। इनमें सबसे चर्चित संधि 1919 में हुई थी जिसने प्रथम विश्व युद्ध आधिकारिक रूप से समाप्त किया था। कुछ इतिहासकारों का मानना है कि इस संधि के तहत जर्मनी पर थोपी गई कठोर शर्तों ने द्वितीय विश्व युद्ध की जमीन तैयार की थी। आइए जानते हैं क्या है वर्यास का इतिहास और यहां हुए ऐतिहासिक युद्ध समझौते।
क्या थी वर्साय की संधि? (Treaty of Versailles)
वर्साय की संधि पहले विश्व युद्ध के अंत का प्रतीक एक शांति समझौता था। इस संधि पर 28 जून 1919 को हस्ताक्षर किए गए थे। संधि में क्या शामिल होना चाहिए, इस पर चर्चा जनवरी 1919 में शुरू हुई थी। जून में पहले विश्व युद्ध के बाद शांति स्थापित करने के लिए 32 देशों के प्रतिनिधि पेरिस के पास स्थित वर्साय महल में एकत्रित हुए। उन्हें ऐसी शांति की उम्मीद थी कि वह 'सभी युद्धों का अंत' कर देगी। फैसला लेते समय किसी भी जर्मन को सम्मेलन में आमंत्रित नहीं किया गया था, लेकिन उनसे संधि पर सहमत होने और हस्ताक्षर करने की अपेक्षा की गई थी। बाद में इसी कारण कुछ जर्मनों को संधि से असंतोष हुआ क्योंकि उन्हें लगा कि फैसले उनके बारे में लिए गए थे, न कि उनके साथ।
'बिग थ्री' के थे अलग-अलग विचार
वर्साय सम्मेलन में डेविड लॉयड जॉर्ज, जॉर्जेस क्लेमेंसो और वुडरो विल्सन का वर्चस्व था, ये ब्रिटेन, फ्रांस और अमेरिका के नेता थे जिन्हें अक्सर 'बिग थ्री' के नाम से जाना जाता था। इन तीनों नेताओं के उद्देश्य एक-दूसरे से अलग थे। फ्रांसीसी राष्ट्रपति जॉर्ज क्लेमेंसो जर्मनी को कड़ी सजा देना चाहते थे। वे जर्मनी को इतना कमजोर करना चाहते थे कि वह भविष्य में फ्रांस के लिए कोई खतरा न बन सके। दोनों देशों के बीच संघर्ष का लंबा इतिहास रहा था और उनकी सीमाएं एक-दूसरे से लगती थीं। ब्रिटिश प्रधानमंत्री डेविड लॉयड जॉर्ज जर्मनी को बहुत कड़ी सजा देने से हिचकिचा रहे थे, लेकिन वे जानते थे कि ब्रिटिश जनता चाहती है कि जर्मनी को युद्ध का हर्जाना देना पड़े। अमेरिकी राष्ट्रपति वुडरो विल्सन दीर्घकालिक शांति पर केंद्रित थे। वे एक मजबूत जर्मनी को यूरोप के पुनर्निर्माण में महत्वपूर्ण मानते थे। वे सम्मेलन में 14 बिंदुओं के साथ पहुंचे, जिनमें उनके विचार शामिल थे, जिनके बारे में उनका मानना था कि वे भविष्य में युद्ध को टालेंगे और एक समृद्ध यूरोप का निर्माण करेंगे।
वर्साय की संधि की शर्तें क्या थीं?
- वर्साय की संधि की शर्तों के तहत जर्मनी को कड़ी सजा दी गई थी। मुख्य बिंदु इस प्रकार थे:
- जर्मनी को युद्ध की पूरी जिम्मेदारी स्वीकार करनी पड़ी। इसे 'युद्ध दोष खंड' के नाम से जाना जाता है।
- जर्मनी को युद्ध से हुए नुकसान के लिए पूरा हर्जाना देना पड़ा। बाद में इसकी गणना 6.6 अरब पाउंड की गई।
- 1871 के युद्ध में जर्मनी द्वारा फ्रांस से छीना गया अलसैस-लोरेन क्षेत्र फ्रांस को वापस कर दिया गया।
- जर्मनी को केवल 100,000 सैनिक रखने की अनुमति थी, टैंक और वायु सेना रखने की कोई अनुमति नहीं थी। उनकी नौसेना में केवल 6 युद्धपोत हो सकते थे।
- फ्रांस की सीमा से लगे जर्मनी के राइनलैंड क्षेत्र को विसैन्यीकृत कर दिया गया।
- एन्स्क्लस (Anschluss) पर प्रतिबंध लगा दिया गया।
- वुड्रो विल्सन के राष्ट्र संघ के विचार को स्वीकार कर लिया गया। इसका उद्देश्य उन गलतियों से बचना था जिनके कारण प्रथम विश्व युद्ध हुआ था, हालांकि इसे काफी हद तक असफल माना गया।
वर्साय की संधि पर जर्मनी की क्या प्रतिक्रिया थी?
प्रथम विश्व युद्ध में आत्मसमर्पण का जर्मनी के कुछ लोगों ने विरोध किया, जिनका मानना था कि उन्हें युद्ध जारी रखना चाहिए था। कई जर्मन लोगों को उम्मीद थी कि वर्साय की संधि वुडरो विल्सन के 14 बिंदुओं पर आधारित होगी, जो पुनर्निर्माण और पुनर्प्राप्ति पर केंद्रित थे। वे संधि में शामिल सजा के प्रावधान से भयभीत थे। उन्होंने नवगठित वीमर (Weimar) सरकार को आत्मसमर्पण के लिए ‘नवंबर के अपराधी’कहा और कहा कि संधि की शर्तों द्वारा जर्मन सेना की पीठ में छुरा घोंपा गया है। वे इस बात से नाराज थे कि उनकी नई सरकार ने संधि पर हस्ताक्षर कर दिए, जबकि वास्तविकता में उनके पास कोई और विकल्प नहीं था। फ्रेडरिक एबर्ट ने शर्तों को असंभव और असहनीय बताया, लेकिन उनकी सरकार को संधि स्वीकार करनी पड़ी। एबर्ट ने अपनी सेना से पूछा कि क्या वे मित्र देशों के आक्रमण का सामना कर पाएंगे, लेकिन उन्हें बताया गया कि यह संभव नहीं होगा।