रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन हाल ही में विवादित कुरील द्वीप समूह के सबसे बड़े द्वीप इतुरुप पर पहुंचे। 2010 के बाद यह पहला मौका है जब रूस का कोई राष्ट्राध्यक्ष इस क्षेत्र में कदम रख रहा है। पुतिन का यह दौरा सिर्फ एक औपचारिक निरिक्षण नहीं था, बल्कि इसने द्वितीय विश्व युद्ध के उस अनसुलझे पन्नों को फिर से खोल दिया है, जिसकी वजह से रूस और जापान के बीच आज तक शांति संधि पर हस्ताक्षर नहीं हो सके हैं।
जानिए पुतिन क्यों पहुंचे विवादित इतुरुप द्वीप
जापान की प्रधानमंत्री सानाए ताकाइची ने पुतिन के इस दौरे की सख्त शब्दों में निंदा करते हुए इसे "जापानी लोगों की भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाला और पूरी तरह से अस्वीकार्य" बताया है। वहीं दूसरी ओर, रूस ने इसे अपना संप्रभु अधिकार करार देते हुए टोक्यो की आपत्तियों को खारिज कर दिया।
पुतिन के इस दौरे में क्या-क्या हुआ?
इतुरुप द्वीप पहुंचने से पहले राष्ट्रपति पुतिन ने सखालिन द्वीप के पास रूसी पैसिफिक फ्लीट के बड़े नौसैनिक अभ्यासों का जायजा लिया। उन्होंने नौसेना के फ्लैगशिप क्रूजर वेरयाग पर सवार होकर लाइव-फायर मिसाइल अभ्यास देखा और सीमा सुरक्षा को लेकर एक गुप्त बैठक की। इसके बाद वे सीधे इतुरुप द्वीप पहुंचे, जहां उन्होंने यासनी सीफूड प्रोसेसिंग प्लांट का दौरा किया और रेनियम और दुर्लभ खनिजों के विकास का जायजा लिया। साथ ही वहां काम कर रहे मजदूरों और स्थानीय नागरिकों से मुलाकात की।
द्वितीय विश्व युद्ध से क्या है कुरील द्वीप का कनेक्शन?
इस विवाद की जड़ें 1945 के द्वितीय विश्व युद्ध से जुड़ी हैं। फरवरी 1945 के याल्टा सम्मेलन में युद्ध के अंतिम दिनों में अमेरिका, ब्रिटेन और सोवियत संघ के नेताओं के बीच एक गुप्त समझौता हुआ। इसके तहत सोवियत संघ (रूस) को जापान के खिलाफ युद्ध में शामिल होने के बदले कुरील द्वीप समूह और दक्षिणी सखालिन वापस देने का वादा किया गया।
अगस्त-सितंबर 1945 में 15 अगस्त 1945 को जापान के सरेंडर का ऐलान करने के बावजूद, सोवियत सेना ने 18 अगस्त से 3 सितंबर के बीच इन चारों द्वीपों (इतुरुप, कुनाशिर, शिकोतान, हबोमाई) पर सैन्य कब्जा कर लिया। 1948 तक वहां रह रहे लगभग 17,000 जापानी नागरिकों को खदेड़ दिया गया।
1951 में जापान ने सैन फ्रांसिस्को शांति संधि में कुरील द्वीपों पर अपना दावा छोड़ दिया, लेकिन सोवियत संघ ने इस पर हस्ताक्षर ही नहीं किए। जापान का तर्क है कि ये चारों दक्षिणी द्वीप (उन्हें जापान में 'उत्तरी क्षेत्र' कहा जाता है) कभी भी ऐतिहासिक कुरील का हिस्सा नहीं थे, इसलिए वे संधि के दायरे से बाहर हैं।
1956 में सोवियत संघ ने दो छोटे द्वीप (शिकोतान और हबोमाई) लौटाने की बात कही थी, लेकिन शीत युद्ध और अमेरिका-जापान रक्षा संधि के कारण यह बातचीत ठप हो गई।
इतुरुप में सखालिन क्षेत्र के गवर्नर वालेरी लिमारेंको से बातचीत करते पुतिन (चित्र साभार: AP)
इन द्वीपों का 170 साल पुराना इतिहास
कुरील द्वीप समूह का इतिहास करीब 170 वर्षों से रूस और जापान के बीच हुए समझौतों और संघर्षों से जुड़ा रहा है। प्रशांत महासागर और ओखोत्स्क सागर के बीच स्थित 56 ज्वालामुखीय द्वीपों वाले इस क्षेत्र की सीमा पहली बार 1855 की शिमोदा संधि में निर्धारित हुई, जिसके तहत इतुरुप द्वीप जापान के अधिकार में आया। इसके बाद 1875 की सेंट पीटर्सबर्ग संधि में जापान ने सखालिन द्वीप रूस को सौंप दिया और बदले में पूरे कुरील द्वीप समूह पर उसका नियंत्रण स्थापित हो गया। 1905 में रूस-जापान युद्ध में जीत के बाद जापान ने दक्षिणी सखालिन पर भी कब्जा कर लिया। हालांकि द्वितीय विश्व युद्ध के अंत में 1945 में सोवियत संघ ने कुरील द्वीप समूह के चार दक्षिणी द्वीपों पर सैन्य नियंत्रण स्थापित कर लिया और वहां के जापानी निवासियों को बेदखल कर दिया। इसी घटनाक्रम ने दोनों देशों के बीच क्षेत्रीय विवाद की नींव रखी, जो आज भी पूरी तरह सुलझ नहीं पाया है।
चारों विवादित द्वीपों की पहचान
इतुरुप (Etorofu): 3,185 वर्ग किमी में फैला सबसे बड़ा द्वीप। यहां एयरपोर्ट, नौसैनिक सुविधाएं और दुर्लभ धातु रेनियम (Rhenium) के विशाल भंडार मौजूद हैं।
कुनाशिर (Kunashiri): जापान के होक्काइडो से महज 15-20 किमी दूर। यहां द्वीपों का प्रशासनिक केंद्र 'युज्नो-कुरिल्स्क' स्थित है।
शिकोतान (Shikotan): 250 वर्ग किमी में फैला द्वीप, जो अपने प्राकृतिक बंदरगाहों और सीफूड प्रोसेसिंग के लिए जाना जाता है।
हबोमाई (Habomai): छोटे-छोटे निर्जन टापुओं का समूह, जहां रूसी बॉर्डर गार्ड्स और रडार स्टेशन तैनात हैं।
मॉस्को क्यों नहीं छोड़ना चाहता कुरील द्वीप?
रूस के लिए ये द्वीप केवल जमीन के टुकड़े नहीं हैं, बल्कि यह उसकी राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा मामला है। रूस की परमाणु बैलिस्टिक मिसाइल सबमरीन (SSBNs) इसी समुद्र में गश्त करती हैं। कुरील द्वीप एक प्राकृतिक ढाल की तरह काम करते हैं जो विदेशी पनडुब्बियों को अंदर आने से रोकते हैं। सर्दियों में जब पूरा ओखोत्स्क सागर जम जाता है, तब इतुरुप और कुनाशिर के बीच के गहरे समुद्री जलमार्ग (जैसे एकातेरिना स्ट्रेट) साल भर बर्फ-मुक्त रहते हैं। इससे रूसी युद्धपोत प्रशांत महासागर में आसानी से प्रवेश कर सकते हैं। रूस ने यहां Bastion-P और Bal एंटी-शिप मिसाइलें तथा S-300V4 एयर डिफेंस सिस्टम तैनात कर रखे हैं। इतुरुप के कुद्रियावी ज्वालामुखी पर जेट इंजन बनाने में इस्तेमाल होने वाली बेहद दुर्लभ धातु 'रेनियम' पाई जाती है। इसके अलावा, यह इलाका दुनिया के सबसे समृद्ध मछली पकड़ने के क्षेत्रों में से एक है।
यूक्रेन युद्ध और नई भू-राजनीतिक गोलबंदी
2022 में रूस द्वारा यूक्रेन पर आक्रमण करने के बाद जापान ने पश्चिमी देशों का साथ देते हुए रूस पर कड़े प्रतिबंध लगाए। जवाब में रूस ने जापान को "गैर-मित्र देश" घोषित कर दिया और शांति संधि वार्ता को अनिश्चित काल के लिए रद्द कर दिया।
हाल के घटनाक्रम में एक और बड़ा मोड़ देखने को मिला है पुतिन के दौरे से ठीक एक दिन पहले उत्तर कोरिया ने जापान सागर में बैलिस्टिक मिसाइल का परीक्षण किया। टोक्यो में रूसी और चीनी राजदूतों ने एक संयुक्त बयान जारी कर द्वितीय विश्व युद्ध के परिणामों को बदलने के प्रयासों का विरोध किया। सवाल उठता है कि इससे संदेश क्या जाता है? तो इसे ऐसे समझिए कि व्लादिमीर पुतिन का इतुरुप दौरा यह संदेश देता है कि रूस कुरील द्वीपों पर अपनी संप्रभुता से कोई समझौता नहीं करेगा। अमेरिका-जापान गठबंधन के डर और प्रशांत महासागर में बढ़ती सैन्य होड़ के बीच, यह 80 साल पुराना विवाद एक बार फिर एशिया-प्रशांत क्षेत्र का सबसे नया फ्लैशपॉइंट बन चुका है।
