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राहुल गांधी समेत 11 विपक्षी नेताओं की CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ SC में याचिका, अब क्या होगा? समझें पूरा कानूनी मामला

राहुल गांधी समेत 11 विपक्षी नेताओं ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की है। इस एक्सप्लेनर में समझिए कि याचिका के बाद आगे क्या हो सकता है, क्या सुप्रीम कोर्ट SIR पर रोक लगा सकता है और मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाने की संवैधानिक प्रक्रिया क्या है।

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CEC पर विपक्ष की कानूनी जंग, जानें क्या सुप्रीम कोर्ट ज्ञानेश कुमार को पद से हटा सकता है। AI IMAGE
Authored by: पीयूष कुमार
Updated Oct 12, 2026, 19:21 IST
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चुनाव आयोग में कथित गड़बड़ियों और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार (CEC Gyanesh Kumar) के इस्तीफे की मांग की आवाज सड़कों से निकलर सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुकी है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी समेत 11 विपक्षी नेताओं ने मुख्य चुनाव आयुक्त से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर दी है।

विपक्ष की ओर से दायर याचिका में राहुल गांधी, मल्लिकार्जुन खरगे, सौगत रॉय, अखिलेश यादव, तेजस्वी यादव, संजय राउत, एम. ए. बेबी, डी. राजा, महुआ माझी, सुप्रिया सुले और ई. टी. मोहम्मद बशीर याचिकाकर्ता हैं। इस याचिका में राहुल गांधी मुख्य याचिकाकर्ता हैं। गौरतलब है कि विपक्षी नेताओं ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ कानूनी लड़ाई शुरू कर दी है। अब विपक्ष के सवाल अदालत के सामने रखे जा रहे हैं।

ऐसे में सबसे बड़ा सवाल है कि क्या सुप्रीम कोर्ट ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने का आदेश दे सकता है? क्या SIR पर रोक लग सकती है? क्या चुनाव आयोग को दोबारा मतदाता सूची की जांच करनी पड़ सकती है? और याचिका दाखिल होने के बाद आगे की कानूनी प्रक्रिया क्या होगी? इन सवालों के जवाब समझने के लिए संविधान, सुप्रीम कोर्ट की शक्तियों और मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाने की प्रक्रिया को अलग-अलग समझना जरूरी है।

विपक्षी नेताओं ने ज्ञानेश कुमार को हटाने की मांग को लेकर कोर्ट में दायर की याचिका। PTI

विपक्षी नेताओं ने ज्ञानेश कुमार को हटाने की मांग को लेकर कोर्ट में दायर की याचिका। PTI

याचिका दाखिल होने के बाद क्या होता है?

सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल होने का मतलब यह नहीं है कि अदालत ने उसे स्वीकार कर लिया है या याचिकाकर्ताओं की मांगों पर सहमति जता दी है। याचिका दाखिल होने के बाद कई कानूनी चरण हो सकते हैं।

पहला चरण: रजिस्ट्री की जांच

अदालत की रजिस्ट्री याचिका और जरूरी दस्तावेजों की जांच करती है। यदि कोई तकनीकी कमी होती है, तो उसे दूर करने के लिए कहा जा सकता है।

दूसरा चरण: सुनवाई के लिए सूचीबद्ध होना

याचिका सूचीबद्ध होने पर अदालत तय कर सकती है कि इस पर सुनवाई की जाए या नहीं। साथ ही, यह भी तय हो सकता है कि इसे पहले से लंबित SIR से जुड़े मामलों के साथ सुना जाए या नहीं।

तीसरा चरण: चुनाव आयोग से जवाब

यदि अदालत को प्रथम दृष्टया विचार करने योग्य सवाल नजर आते हैं, तो वह चुनाव आयोग और संबंधित पक्षों को नोटिस जारी कर जवाब मांग सकती है। हालांकि, नोटिस जारी होने का मतलब यह नहीं है कि अदालत ने आरोपों को सही मान लिया है।

चौथा चरण: अंतरिम राहत या अंतिम फैसला

अदालत मामले की सुनवाई के दौरान अंतरिम निर्देश दे सकती है या सभी दलीलें सुनने के बाद अंतिम आदेश पारित कर सकती है। राहत याचिका में की गई मांगों, कानूनी आधार और उपलब्ध साक्ष्यों पर निर्भर करेगी। इस मामले में एक महत्वपूर्ण बात यह है कि 13 अक्टूबर को SIR से जुड़े कुछ मामले पहले से सुनवाई के लिए निर्धारित होने की रिपोर्ट है।

मुख्य न्यायाधीश ने भी विपक्षी नेताओं को बताया था कि संबंधित मुद्दों पर अदालत में न्यायिक प्रक्रिया के जरिए ही आगे बढ़ना उचित होगा। ऐसे में नई याचिका को पहले से लंबित मामलों के साथ सुने जाने की संभावना पर नजर रहेगी। हालांकि, इस संबंध में अंतिम निर्णय अदालत ही करेगी।

जानें मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की क्या है प्रक्रिया। AI IMAGE

जानें मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की क्या है प्रक्रिया। AI IMAGE

क्या सुप्रीम कोर्ट एसआईआर पर रोक लगा सकता है?

हां, उचित कानूनी आधार होने पर अदालत अंतरिम राहत देने पर विचार कर सकती है। हालांकि, रोक अपने आप नहीं लगती। संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन के लिए सुप्रीम कोर्ट में रिट याचिका दाखिल की जा सकती है। अदालत आवश्यक परिस्थितियों में निर्देश या आदेश जारी कर सकती है।

क्या हो सकते हैं कानूनी रास्ते?

यदि याचिका में SIR पर रोक लगाने की मांग की गई है और अदालत को इसके लिए पर्याप्त कानूनी आधार मिलता है, तो वह अंतरिम राहत देने पर विचार कर सकती है। इसके अलावा, अदालत मतदाता सूची के पुनरीक्षण की प्रक्रिया, नाम हटाने के आधार और शिकायतों के निपटारे पर चुनाव आयोग से स्पष्टीकरण मांग सकती है।

यदि अदालत को प्रक्रिया में कोई कानूनी या प्रक्रियागत कमी मिलती है, तो वह कानून के अनुरूप कार्रवाई करने के निर्देश दे सकती है। वहीं, यदि याचिका में पर्याप्त कानूनी आधार नहीं मिलता, तो अदालत राहत देने से इनकार भी कर सकती है।

क्या सुप्रीम कोर्ट ज्ञानेश कुमार को पद से हटा सकता है?

मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाने की प्रक्रिया संविधान के अनुच्छेद 324(5) में दी गई है। इसके अनुसार, मुख्य चुनाव आयुक्त को उसी तरीके और उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है, जिन पर सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश को हटाया जाता है। इसका मतलब है कि मुख्य चुनाव आयुक्त से इस्तीफा मांगना और उन्हें कानूनी रूप से पद से हटाना दो अलग-अलग बातें हैं।

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की फाइल फोटो। PTI

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की फाइल फोटो। PTI

मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की संवैधानिक प्रक्रिया

संसद के किसी भी सदन में निर्धारित आधारों पर पद से हटाने का प्रस्ताव पेश किया जा सकता है। लोकसभा में कम-से-कम 100 और राज्यसभा में कम-से-कम 50 सांसदों के हस्ताक्षर प्रस्ताव पेश करने के लिए जरूरी होते हैं। प्रस्ताव स्वीकार किए जाने पर निर्धारित प्रक्रिया के तहत आरोपों की जांच होती है।

दोनों सदनों में प्रस्ताव को कुल सदस्य संख्या के बहुमत और उपस्थित होकर मतदान करने वाले सदस्यों के कम-से-कम दो-तिहाई बहुमत से पारित करना जरूरी है। संवैधानिक प्रक्रिया पूरी होने पर राष्ट्रपति पद से हटाने का आदेश जारी करते हैं। यह प्रक्रिया संविधान के अनुच्छेद 124(4) और 324(5) के प्रावधानों के अनुरूप है।

तो क्या सुप्रीम कोर्ट सीधे ज्ञानेश कुमार को हटा सकता है?

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने के लिए संविधान में विशेष प्रक्रिया तय है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट चुनाव आयोग की कार्रवाई की न्यायिक समीक्षा कर सकता है और कानून के अनुरूप निर्देश दे सकता है। किसी विशेष याचिका में अदालत क्या आदेश दे सकती है, यह उसके विषय, मांगों और कानूनी आधार पर निर्भर करेगा।

क्या चुनाव आयुक्तों को कानूनी कार्रवाई से छूट मिली हुई है?

मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों के कामकाज से जुड़ा एक और कानूनी सवाल उनकी सुरक्षा और जवाबदेही का है। वर्ष 2023 के कानून की धारा 16 में चुनाव आयुक्तों को उनके आधिकारिक कर्तव्यों के निर्वहन के दौरान किए गए या किए जाने के लिए बताए गए किसी कार्य के संबंध में कुछ कानूनी संरक्षण दिया गया है।

हालांकि, इस प्रावधान का दायरा और इसकी संवैधानिक वैधता अलग कानूनी सवाल हैं। कानूनी संरक्षण का अर्थ यह नहीं है कि चुनाव आयोग की हर कार्रवाई को न्यायिक समीक्षा से बाहर रखा गया है। किसी विशिष्ट मामले में इस संरक्षण का क्या प्रभाव होगा, यह संबंधित कानून और मामले के तथ्यों पर निर्भर करेगा।

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर उठ रहे आवाज अब सड़क से निकलकर सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुका है। अब अदालत के सामने मुख्य सवाल होंगे कि याचिका में कौन-सी कानूनी दलीलें रखी गई हैं।

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