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पुणे निगम चुनाव : अटक गई चाचा-भतीजे की गाड़ी, पावर से कोसों दूर पवार

पुणे नगर निगम के लिए हुए चुनाव के आज यानी शुक्रवार 16 जनवरी को परिणाम घोषित किए गए। जो परिणाम सामने आए हैं, उन्होंने एक बात तो साफ कर दी है कि पवार चाचा-भतीजे यानी शरद पवार और अजित पवार में अब कोई पावर नहीं बची है। ढाई साल पहले पार्टी टूटने के बावजूद पुणे में दोनों ने साथ में चुनाव लड़ा और अब तक का सबसे खराब प्रदर्शन करते हुए 20 सीटों पर सिमट गए।

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पार्टी टूटने के बाद गठबंधन किया और पुणे निगम चुनाव में मिली करारी हार

महाराष्ट्र में स्थानीय निकाय चुनाव हुए और आज यानी शुक्रवार 16 जनवरी को उनका परिणाम भी घोषित कर दिया गया। यह चुनाव कई मायनों में अद्भुत रहे। क्योंकि इस चुनाव में कुछ ऐसे समीकरण दिखे, जिनके बारे में लोगों ने सोचना भी बंद कर दिया था। जैसे उद्धव ठाकरे की शिवसेना (UBT) और राज ठाकरे की महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (MNS) के बीच गठबंधन। इसी तरह का एक गठबंधन अजित पवार की NCP और शरद पवार की NCP(SC) के बीच भी देखने को मिला, जो सिर्फ पुणे नगर निगम के लिए हुआ था। आज बात पुणे नगर निगम चुनाव की ही करेंगे, क्योंकि NCP को दो-फाड़ हुए अभी ज्यादा समय भी नहीं बीता था कि दोनों धड़ों ने गठबंधन करने का फैसला कर लिया। इससे भी बड़े आश्चर्य की बात यह कि यह गठबंधन सिर्फ पुणे नगर निगम के लिए हुआ, अन्य नगर-निगमों में दोनों ने एक-दूसरे के खिलाफ जमकर ताल ठोंकी। सबसे बड़े आश्चर्य की बात यह कि भाजपा और शिवसेना के साथ महायुति में होते हुए अजित पवार ने विपक्षी महाविकास अघाड़ी की सदस्य चाचा शरद पवार की NCP(SC) से गठबंधन किया। आखिर ऐसा क्यों हुआ और इस चुनाव से किसे क्या हासिल हुआ? चलिए जानते हैं -

कुछ तो मजबूरियां होंगी कि जुलाई 2023 में पार्टी तोड़कर अलग होने वाले अजित पवार ने चाचा शरद पवार की पार्टी के साथ गठबंधन कर लिया। जबकि अदावत तो इतनी बड़ी थी कि अजित पवार ने चाचा शरद पवार से उस पार्टी और पार्टी के चुनाव चिह्न को हड़प लिया, जिसे उन्होंने अपने खून-पसीने से सींचा था। कानून लड़ाई के बाद अजित पवार के गुट को ही असली NCP माना गया था और शरद पवार को अपनी पार्टी का नाम NCP(SC) रखना पड़ा। शरद पवार को चुनाव चिह्न भी नया बनाना पड़ा था। ऐसे में प्रश्न है कि आखिर अजित पवार के सामने ऐसी कौन सी मजबूरी थी कि अलग होने के लगभग ढाई साल बाद ही उन्होंने चाचा की पार्टी से गठबंधन कर लिया। वह भी महायुति सरकार में उपमुख्यमंत्री रहते हुए। यही प्रश्न शरद पवार की मजबूरी को लेकर भी हैं।

चाचा-भतीजा एक ही हैं!

ऊ शाब जी, जो चाचा है ना... वही भतीजा है और जो भतीजा है, वही चाचा है... गोविंदा की एक फिल्म का यह डायलॉग पुणे नगर निगम चुनाव पर फिट बैठता है। भले ही महाराष्ट्र के अन्य निगमों में अजित पवार और शरद पवार की पार्टियां अलग-अलग चुनाव लड़ी हों, लेकिन पुणे में दोनों चाचा-भतीजा एक हो गए। दोनों ने जनता से संभवत: यही कहा कि ऊ शाब जी, जो चाचा है, वही भतीजा है... चाचा-भतीजा एक तो हो गए, लेकिन क्या जनता को उन पर भरोसा हुआ? ये प्रश्न जरूरी है, क्योंकि जो परिणाम सामने आए हैं, वह कुछ और ही कहानी बयान कर रहे हैं। पुणे में न तो चाचा का करिश्मा चला और न ही भतीजे के उप मुख्यमंत्री पद का रुतबा काम आया।

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जिस समय यह रिपोर्ट लिखी गई उस समय तक पुणे नगर निगम की कुल 165 में से 134 सीटों का परिणाम आ चुका था, जिसमें से 110 पर भाजपा को जीत मिल चुकी थी। एकनाथ शिंदे की शिवसेना को 1 सीटों पर और कांग्रेस व शिवसेना (UBT) को 9 सीटों पर जीत मिली थी। लेकिन सबसे चौंकाने वाले और धक्का देने वाले परिणाम चाचा-भतीजे के गठबंधन के लिए सामने आए। दोनों NCP को मिलाकर पुणे में सिर्फ 14 सीटों पर जीत मिली।

किसे क्या मिला?

अजित पवार और चाचा शरद पवार भले ही पुराने सारे गिले-शिकवे भुलाकर पुणे नगर निगम चुनाव के लिए साथ आए हों। लेकिन इस चुनाव से दोनों को ही कुछ भी हासिल नहीं हुआ। 2023 में NCP विभाजन से पहले 2017 में हुए नगर निगम चुनाव में NCP को पुणे में 39 सीटों पर जीत मिली थी, जबकि उससे पहले कि 2012 के चुनाव में 51 सीटें हासिल हुई थीं। लेकिन अलग होने के बाद जब चाचा-भतीजा सामने आए तो NCP 14 सीटों पर सिमट गई।

पुणे चुनाव से भतीजे की उम्मीदें!

पुणे में अजित पवार और शरद पवार के साथ आना कोई इत्तेफाक नहीं था, बल्कि एक सोची-समझी रणनीति मानी जा सकती है। महाराष्ट्र कि महायुति सरकार में अजित पवार भले ही उप मुख्यमंत्री हैं, लेकिन मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और दूसरे उप मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे (शिवसेना) के आगे वह ज्यादा प्रभावशाली नहीं दिखते। ऐसे में अजित पवार की मंशा रही होगी कि पुणे में चाचा शरद पवार के साथ बड़ी जीत दर्ज करके महायुति में अपनी स्थिति मजबूत कर लेंगे। यही नहीं भविष्य में महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव से पहले एक ज्यादा सीटों का दावा कर सकें या महाविकास अघाड़ी में अपने लिए जगह तलाश लें। याद रहे कि पहले भी संयुक्त NCP में रहते हुए अजित पवार भाजपा को समर्थन देकर रात के अंधेरे में उप मुख्यमंत्री पद की शपथ ले चुके हैं। इसके लिए उन्होंने चाचा शरद पवार को अंधेरे में रखा। हालांकि, बाद में शरद पवार ने समर्थन वापस लिया और फिर महाविकास अघाड़ी सरकार बनी, जिसमें अजित पवार को उप मुख्यमंत्री बनाया गया।

पुणे चुनाव से चाचा की उम्मीदें!

उधर शरद पवार को भी पुणे चुनाव से कुछ हासिल नहीं हुआ। अगर पुणे में दोनों एनसीपी का गठबंधन कुछ कमाल कर दिखाता तो महाविकास अघाड़ी में शरद पवार और उनकी बेटी सुप्रिया सुले का कद काफी बढ़ जाता। शरद पवार अक्सर भाजपा की तारीफ करते दिखते हैं और भाजपा भी उन पर हमला करने से बचती रही है। ऐसे में शरद पवार और उनकी पार्टी के लिए महायुति में भी जगह बन सकती थी, दोनों NCP फिर से एक हो सकती थीं, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। यह सिर्फ कयास नहीं हैं, क्योंकि पूर्व में सोनिया गांधी के विदेशी मूल का मुद्दा उठाकर ही उन्होंने अपनी NCP बनाई थी। ऐसे में भाजपा से गठबंधन सिर्फ खयाली पुलाव नहीं, पुणे जीतने पर हकीकत भी हो सकता था... जो फिलहाल नहीं हो पाया।

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