नेपाल में हाल ही में आई विनाशकारी बाढ़ और भूस्खलन ने पूरे हिमालयी क्षेत्र में खतरे की घंटी बजा दी है। अचानक करोड़ों लीटर पानी और मलबे का पहाड़ी घाटियों में बह निकलना केवल नेपाल तक सीमित चेतावनी नहीं है, बल्कि भारत के लिए भी एक बड़ा अलार्म है। वैज्ञानिकों के अनुसार, बढ़ते तापमान, बारिश के अनियंत्रित पैटर्न और बेतरतीब मानवीय निर्माण ने हिमालय की बर्फ को अस्थिर कर दिया है। उत्तराखंड के अलकनंदा बेसिन में 219 हैंगिंग ग्लेशियर की मौजूदगी इस चिंता को और गंभीर बनाती है। इन ग्लेशियरों के टूटने से केवल हिमस्खलन का खतरा नहीं है, बल्कि ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) जैसी घटनाएं भी हो सकती हैं। इसका प्रभाव पहाड़ों से होते हुए मैदानी इलाकों तक पहुंच सकता है।
अलकनंदा बेसिन में 219 हैंगिंग ग्लेशियर
अप्रैल 2026 में नेचर (Nature) पत्रिका में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार, उत्तराखंड के गढ़वाल हिमालय स्थित अलकनंदा बेसिन में 219 हैंगिंग ग्लेशियर (Hanging Glaciers) की पहचान की गई है। ये ग्लेशियर लगभग 71.7 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले हैं। इनमें लगभग 2.39 क्यूबिक किलोमीटर बर्फ होने का अनुमान है। इसमें से लगभग 0.74 क्यूबिक किलोमीटर हिस्सा बेहद संवेदनशील 'हैंगिंग आइस मास' का है।
हैंगिंग ग्लेशियर क्या होते हैं?
हैंगिंग ग्लेशियर खड़ी ढलानों पर टिके बर्फ के विशाल हिस्से होते हैं। बढ़ते तापमान और मौसम में बदलाव की वजह से इनकी संरचना और स्थिरता प्रभावित हो सकती है। इनका संतुलन बिगड़ने से ये अचानक भारी हिमस्खलन (Avalanche) के रूप में नीचे गिर सकते हैं। अध्ययन के अनुसार, अलकनंदा बेसिन के ऊपरी हिस्से में ही लगभग एक-तिहाई अस्थिर बर्फ केंद्रित है। अगर यह हिस्सा टूटता है, तो अलकनंदा नदी के रास्ते यह सैलाब भारी तबाही ला सकता है। अध्ययन में आशंका जताई गई है कि बद्रीनाथ-माणा क्षेत्र में हैंगिंग ग्लेशियर टूटने से बर्फ और मलबे का बहाव 50 मीटर (लगभग 15 मंजिला इमारत) से भी अधिक ऊंचा उठ सकता है। यह स्थिति आबादी, सड़क, पुल और दूसरे महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे के लिए बेहद खतरनाक हो सकती है।
GLOF किसे कहते हैं?
जब बर्फ और चट्टानों का विशाल हिस्सा टूटकर नदी या झीलों में गिरता है, यह GLOF (Glacial Lake Outburst Flood) यानी ग्लेशियल झील फटने का कारण बनता है। पानी के साथ लाखों टन गाद और बोल्डर मिलकर मलबे का ऐसा सैलाब (Debris Flow) बनाते हैं जो रास्ते में आने वाले हर पुल, टनल, सड़क और गांव को पूरी तरह बर्बाद कर देता है।
नेपाल जैसी तबाही का असर भारत तक कैसे पहुंचेगा?
पर्यावरणविद विमलेंदु झा ने टाइम्स नाउ नवभारत से बातचीत में बताया कि यदि कोई बड़ा हिमस्खलन या झील फटने (GLOF) की घटना होती है, तो इस तरह की आपदा का असर दो स्तर पर देखा जाना चाहिए - प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष प्रभाव। उनके मुताबिक इसका तात्कालिक प्रभाव उत्तराखंड की घाटियों, ऋषिकेश, हरिद्वार से होते हुए सीधे उत्तर प्रदेश के मैदानी इलाकों तक पहुंच सकता है।
उन्होंने कहा कि आपदा की प्रकृति और उसकी तीव्रता पर निर्भर करता है कि खतरा किस स्तर तक पहुंचेगा। उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि अगर टिहरी जैसे विशाल बांधों और अन्य जलविद्युत परियोजनाओं पर दबाव बढ़ता है तो इस स्थिति में बाढ़ का असर दिल्ली और एनसीआर तक भी पहुंच सकता है। यानी पहाड़ों में होने वाली एक घटना को सिर्फ पहाड़ी इलाके की आपदा मानना सही नहीं होगा।
50 करोड़ लोगों पर पड़ सकता है अप्रत्यक्ष असर
विमलेंदु झा के मुताबिक, इसका एक बड़ा और लंबी अवधि वाला असर पानी की उपलब्धता और जल सुरक्षा पर पड़ सकता है। अलकनंदा आगे चलकर गंगा नदी का हिस्सा बनती है। गंगा और यमुना बेसिन पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से करीब 50 करोड़ से अधिक आबादी निर्भर हैं। ऐसे में हिमालय में जलवायु परिवर्तन के कारण होने वाला कोई बड़ा बदलाव केवल उत्तराखंड या उत्तर प्रदेश तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरे क्षेत्र की जल सुरक्षा को प्रभावित कर सकता है। उन्होंने कहा कि ग्लेशियरों में बदलाव का असर आने वाले समय में पानी की उपलब्धता, नदी के प्रवाह और उससे जुड़े करोड़ों लोगों के जीवन पर पड़ सकता है।
क्या GLOF का खतरा रोका जा सकता है?
विमलेंदु झा का कहना है कि जो ग्लेशियल लेक बन चुकी हैं, उनके प्राकृतिक खतरे को तुरंत खत्म करना काफी मुश्किल है। लेकिन भविष्य में ऐसी परिस्थितियों के बढ़ने की रफ्तार को कम किया जा सकता है। उनके मुताबिक इसके लिए सबसे पहले ग्लोबल वार्मिंग और ग्लोबल हीटिंग को धीमा करना जरूरी है। साथ ही पहाड़ों में बांध और सड़क निर्माण जैसी गतिविधियों की वैज्ञानिक समीक्षा भी आवश्यक है। दूसरा महत्वपूर्ण कदम है—बेहद संवेदनशील इलाकों में मानव बस्तियों की योजना में बदलाव। झा ने धराली और नेपाल की घटनाओं का उदाहरण देते हुए कहा कि कई बार पूरा गांव बाढ़ और मलबे की चपेट में आ जाता है। ऐसे में नदी के रास्ते, बाढ़ क्षेत्र और बेहद संवेदनशील इलाकों में मौजूद बस्तियों को सुरक्षित स्थानों पर स्थानांतरित करने पर विचार करना बेहद जरूरी है।
‘खतरा कम किया जा सकता है, लेकिन पूरी तरह खत्म नहीं’
विशेषज्ञ के मुताबिक, ग्लेशियर या GLOF के खतरे को तत्काल रूप से पूरी तरह खत्म करना संभव नहीं है, लेकिन भविष्य में होने वाले नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है। इसके लिए आपदा से पहले चेतावनी देने वाली व्यवस्था, ग्लेशियर और ग्लेशियल झीलों की लगातार निगरानी, सैटेलाइट मैपिंग और संवेदनशील इलाकों में मजबूत आपदा तैयारी योजना जरूरी है। उन्होंने कहा कि नदी के आसपास बसे इलाकों की योजना बनाते समय यह देखना होगा कि कौन से मानव बसेरे सबसे ज्यादा खतरे में हैं।
हैंगिंग ग्लेशियर कब टूट सकते हैं?
यह सवाल भी अहम है कि आखिर ये हैंगिंग ग्लेशियर कब टूट सकते हैं? विमलेंदु झा के मुताबिक, वैज्ञानिक किसी ग्लेशियर के टूटने के सटीक समय की भविष्यवाणी नहीं कर सकते। लेकिन वर्तमान डेटा स्पष्ट करता है कि खतरा इस समय 'रेड लेवल' (अत्यधिक संवेदनशील) पर है। विशेषज्ञ के अनुसार, ग्लेशियल झीलों में खतरा केवल पानी की मात्रा से तय नहीं होता। झील को रोकने वाली प्राकृतिक दीवारें (Moraine Dams) भी बेहद महत्वपूर्ण होती हैं। जब तापमान बढ़ता है और बर्फ पिघलती है, तो ये दीवारें आंतरिक रूप से कमजोर हो जाती हैं। यह दीवारें मुख्य रूप से बर्फ और ढीली चट्टानों (Loose Rocks) से बनी होती हैं। तापमान बढ़ने के साथ जब बर्फ तेजी से पिघलती है तो यह प्राकृतिक दीवार कमजोर हो सकती है। ऐसे में पानी का दबाव और कमजोर होती दीवार मिलकर अचानक झील टूटने का कारण बन सकते हैं। विशेषज्ञों का स्पष्ट मानना है कि जो ग्लेशियल झीलें बन चुकी हैं और जो जलवायु परिवर्तन के अपरिवर्तनीय (Irreversible) प्रभाव हैं, उन्हें रातों-रात खत्म नहीं किया जा सकता। लेकिन नुकसान को न्यूनतम करने के लिए ठोस रणनीति अपनाई जा सकती है।
चमोली से ब्लाटेन तक एक बड़ा सबक
2021 का चमोली हादसा भारत को पहले ही बड़ी चेतावनी दे चुका है। बर्फ और चट्टान का विशाल हिस्सा ऋषिगंगा घाटी में गिरा था। इस आपदा में जलविद्युत परियोजनाएं और पुल तबाह हुए थे। इस आपदा में 200 से ज्यादा लोगों की जान गई। वहीं स्विट्जरलैंड के ब्लाटेन में बर्फ-चट्टान के बड़े हिमस्खलन के दौरान समय रहते खतरे के संकेतों को समझकर लोगों को रेस्क्यू कर लिया गया था। वहां जनहानि बेहद कम रही। यही अंतर बताता है कि मॉनिटरिंग, समय पर चेतावनी और तेज रेस्क्यू सिस्टम कितने महत्वपूर्ण हैं।
अब ‘आपदा के बाद’ नहीं, ‘आपदा से पहले’ तैयारी जरूरी
हिमालय में बदलते मौसम के बीच विशेषज्ञों का संदेश साफ है-हर आपदा की भविष्यवाणी संभव नहीं है, लेकिन उसके नुकसान को कम किया जा सकता है। इसके लिए हाई-रिजॉल्यूशन सैटेलाइट निगरानी, ग्लेशियरों की नियमित मैपिंग, सेंसर आधारित चेतावनी प्रणाली, संवेदनशील बस्तियों की पहचान और सुरक्षित निकासी मार्ग तैयार करने होंगे।
नेपाल की तबाही और अलकनंदा बेसिन के 219 हैंगिंग ग्लेशियर भारत के लिए एक गंभीर चेतावनी हैं। हिमालय में खतरा केवल ग्लेशियर टूटने का नहीं है, बल्कि उससे पैदा होने वाली पूरी ‘कास्केडिंग डिजास्टर’ यानी एक के बाद एक आने वाली आपदाओं का है। इसलिए अब सवाल यह नहीं कि अगली बड़ी आपदा कब आएगी, बल्कि यह है कि उससे पहले हम कितने तैयार हैं।