पेपर लीक के आरोपों के बाद राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा-स्नातक 2026 (NEET) का रद्द होना संस्थागत विफलता की ओर इशारा करता है। परीक्षा में शामिल होने वाले 22 लाख से अधिक छात्रों को अब तैयारी, अनिश्चितता और मानसिक तनाव के एक और लंबे दौर का सामना करना पड़ सकता है। राजस्थान पुलिस की जांच से पता चलता है कि परीक्षा के प्रश्नपत्र के कुछ अंश कई राज्यों में सक्रिय संगठित नेटवर्क के जरिए हफ्तों पहले ही लीक कर दिए गए थे। इसमें लाखों की कमाई की गई और होनहार छात्रों का भविष्य दांव पर लग गया है।
पेपर लीक, फर्जीवाड़े, मूल्यांकन में अनियमितताएं
NEET पर बार-बार पेपर लीक, फर्जीवाड़े, मूल्यांकन में अनियमितताएं और परीक्षा सुरक्षा में विफलता के आरोप लगते रहे हैं, ऐसे आरोपों के कारण दो साल पहले ही कुछ आवेदकों की दोबारा परीक्षा आयोजित की गई थी। इसके बाद केंद्र ने एक उच्च स्तरीय सुधार समिति का गठन किया था, जिसने कंप्यूटर आधारित परीक्षा, एन्क्रिप्टेड पेपर डिलीवरी सिस्टम, हाइब्रिड परीक्षा मॉडल और मजबूत जवाबदेही तंत्र की सिफारिश की थी। हैरानी की बात है कि ये सिफारिशें अभी तक लागू नहीं हुई हैं।
NTA के पुनर्गठन की मांग
राष्ट्रीय परीक्षण एजेंसी (NTA) के पुनर्गठन या प्रतिस्थापन की मांग करते हुए सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की गई है। यह एजेंसी बायोमेट्रिक सत्यापन, एआई आधारित निगरानी और जीपीएस ट्रैकिंग के संबंध में दिए गए आश्वासनों के बावजूद संगठित कदाचार के खिलाफ अपर्याप्त साबित हुई है। इससे भी बुरी बात यह है कि संदेह का बोझ अब भी छात्रों पर ही पड़ रहा है। संस्थागत जवाबदेही कमजोर होने के बावजूद, उम्मीदवारों को ड्रेस कोड और परीक्षा केंद्रों पर की जाने वाली गहन जांच का सामना करना पड़ता है, जो अपमानजनक है। इतना सबकुछ करने के बाद पेपर लीक जैसी घटनाएं और फिर परीक्षा का रद्द होना छात्रों के आत्मविश्वास को चोट पहुंचा रहा है।
NEET परीक्षा में फर्जीवाड़ा-विवाद-बहस
पिछले कुछ वर्षों में, NEET परीक्षा में फर्जीवाड़े, प्रश्न पत्र लीक, त्रुटियां और सुधार संबंधी गड़बड़ियां देखने को मिली हैं। इसकी प्रणालियों और प्रक्रियाओं पर राज्य विधानसभाओं, संसद, अदालतों और मीडिया में बहसें हुई हैं। फिर भी कुछ खास बदलाव नहीं आया है। CBSE सहित कई एजेंसियों को समय-समय पर परीक्षा का प्रभार सौंपा गया है। लेकिन CLAT, CUET या JEE के विपरीत, NEET- जिसमें किसी भी प्रवेश परीक्षा की तुलना में सबसे अधिक छात्र संख्या है, लगातार विवादों में घिरी रही है।
चिकित्सा शिक्षा प्रणाली पर पड़ रहा असर
परीक्षा रद्द होने के परिणाम केवल परीक्षा की तारीख स्थगित होने तक ही सीमित नहीं हैं। कोचिंग केंद्रों ने जुलाई या अगस्त में होने वाली पुनर्परीक्षा से पहले क्रैश कोर्स को री-शेड्यूल करना शुरू कर दिया है। इस रुकावट का असर चिकित्सा शिक्षा प्रणाली पर भी पड़ा है। राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग के नियमों के अनुसार, शैक्षणिक वर्ष 1 अगस्त से शुरू होना चाहिए, जिसमें मुख्य पाठ्यक्रम शुरू होने से पहले एक महीने का फाउंडेशन कोर्स शामिल है। परीक्षाओं, परिणामों और प्रवेश में देरी के कारण कॉलेजों को शैक्षणिक कैलेंडर को छोटा करना पड़ता है।
अस्पताल और छात्र भुगत रहे खामियाजा
अस्पतालों को भी इसका खामियाजा भुगतना पड़ता है। अंतिम वर्ष के मेडिकल छात्र एक वर्ष के लिए प्रशिक्षु के रूप में काम करते हैं, जो सरकारी अस्पतालों में वर्कफोर्स की एक अहम कड़ी बनाते हैं। जब बैच देर से शुरू होते हैं, तो निवर्तमान और आने वाले प्रशिक्षुओं के बीच अंतराल आ जाता है। अगला बैच पिछले बैच के जाने के लगभग चार महीने बाद आता है। इससे सेवा प्रभावित होती है। हर गुजरते वर्ष के साथ करियर पर इसका असर बढ़ता जाता है। जो छात्र देर से शुरू करते हैं, वे देर से खत्म करते हैं। और अक्सर स्नातकोत्तर परीक्षा की अंतिम तारीख चूक जाते हैं, जिससे उन्हें स्नातकोत्तर की तैयारी शुरू करने से पहले एक साल का लंबा इंतजार करना पड़ता है। यानी छात्रों की परेशानी का कोई अंत ही नहीं है।