Taslima Nasreen: बांग्लादेशी मूल की प्रसिद्ध और विवादित लेखिका तसलीमा नसरीन एक बार फिर चर्चा के केंद्र में हैं। भारत में समान नागरिक संहिता (UCC) का समर्थन करने से लेकर बांग्लादेश में हाल ही में हुए हिंसक छात्र आंदोलनों और राजनीतिक तख्तापलट पर अपने तीखे बयानों को लेकर वह लगातार सुर्खियों में बनी हुई हैं। चाहे कट्टरपंथियों पर हमला बोलना हो या महिलाओं के अधिकारों की पैरोकारी करना, तसलीमा नसरीन हमेशा से अपने बेबाक और निर्भीक विचारों के लिए जानी जाती रही हैं। आइए समझते हैं कि वह कौन हैं, उनसे जुड़े प्रमुख विवाद क्या हैं और वे हाल के दिनों में क्यों चर्चा में हैं।
कौन हैं तसलीमा नसरीन? जानिए पूरी कहानी
25 अगस्त 1962 को तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) के मयमनसिंह में जन्मीं तसलीमा नसरीन पेशे से एक डॉक्टर थीं। उन्होंने 1980 के दशक में एक डॉक्टर के रूप में काम करते हुए लिखना शुरू किया था। तसलीमा ने गद्य, कविता, और निबंधों के जरिए समाज में व्याप्त धार्मिक कट्टरपंथ, पितृसत्ता और महिलाओं पर होने वाले अत्याचारों के खिलाफ लिखना शुरू किया। वे खुद को स्पष्ट रूप से नास्तिक मानती हैं और धर्मनिरपेक्षता व मानवाधिकारों की कट्टर समर्थक रही हैं। तसलीमा नसरीन का जीवन कई बड़े विवादों और निर्वासन से भरा रहा है।
'लज्जा' उपन्यास और फतवा (1993)
1993 में प्रकाशित उनका चर्चित उपन्यास 'लज्जा' (Lajja) उनके जीवन का सबसे बड़ा मोड़ साबित हुआ। इस किताब में उन्होंने 1992 में भारत में बाबरी मस्जिद ढांचा ढहाए जाने के बाद बांग्लादेश में अल्पसंख्यक हिंदुओं पर हुए अत्याचारों और दंगों का यथार्थवादी चित्रण किया था। इसके बाद बांग्लादेश के कट्टरपंथी इस्लामी संगठनों ने उनके खिलाफ मोर्चा खोल दिया, उनके खिलाफ फतवे जारी किए गए और उनके सिर पर इनाम रख दिया गया। तसलीमा की किताब से बांग्लादेश में हलचल मच गई। सड़कों पर लाखों कट्टरपंथियों ने विरोध प्रदर्शन किया। तसलीमा को कई महीनों तक छिपकर रहना पड़ा और 1994 में आखिरकार उन्हें बांग्लादेश छोड़कर हमेशा के लिए निर्वासन में जाना पड़ा। वह बांग्लादेश छोड़कर भारत आ गईं।
भारत में 'सर कलम करने' का फतवा (2007): जब तसलीमा नसरीन बांग्लादेश से निकलकर भारत (कोलकाता) में रहने लगीं, तब यहां भी उनके खिलाफ फतवा जारी किया गया। उत्तर प्रदेश के ऑल इंडिया इत्तेहाद काउंसिल के अध्यक्ष तौकीर रजा खान ने फतवा जारी किया जो इन अपने कारनामों के कारण दिनों जेल में बंद है।
क्या था फतवा: तौकीर रजा खान ने खुलेआम ऐलान किया कि जो भी तसलीमा नसरीन का सर कलम करेगा, उसे ₹5 लाख का इनाम दिया जाएगा। उसने शर्त रखी कि यह फतवा तभी वापस होगा जब तसलीमा अपनी सभी किताबें जला दें, सार्वभौमिक रूप से माफी मांगें और भारत छोड़ दें।
कोलकाता में विरोध (2007): ऑल इंडिया माइनॉरिटी फोरम जैसे संगठनों के विरोध और कोलकाता में हुए हिंसक प्रदर्शनों के बाद पश्चिम बंगाल सरकार ने उन्हें कोलकाता छोड़ने पर मजबूर कर दिया, जिसके बाद वे दिल्ली आईं और फिर कुछ समय के लिए विदेश जाना पड़ा।जान से मारने की धमकियों और सरकारी मुकदमों के चलते 1994 में उन्हें अपना गृहराज्य बांग्लादेश छोड़ना पड़ा। तब से लेकर आज तक वे निर्वासन में जी रही हैं और कभी अपने वतन वापस नहीं लौट सकीं।
स्वीडिश नागरिकता और भारत में शरण
बांग्लादेश से निकलने के बाद उन्होंने कई यूरोपीय देशों में समय बिताया और उन्हें स्वीडन की नागरिकता मिल गई। हालांकि, दक्षिण एशियाई संस्कृति से लगाव के कारण उन्होंने भारत में रहने की इच्छा जताई। वे 2004 से लगातार भारत में रेसिडेंस परमिट (आवास अनुमति) पर रह रही हैं और नई दिल्ली को अपना घर मानती हैं। 2007 में कोलकाता में उनके खिलाफ हुए हिंसक विरोध प्रदर्शनों के बाद उन्हें पश्चिम बंगाल भी छोड़ना पड़ा था, जिसके बाद से वे मुख्य रूप से दिल्ली में रह रही हैं।
हाल ही में क्यों सुर्खियों में हैं तसलीमा नसरीन?
तसलीमा नसरीन अपने हालिया बयानों और टिप्पणियों के कारण एक बार फिर चर्चा में आई हैं।
बांग्लादेशी छात्र आंदोलन और शेख हसीना का तख्तापलट
बांग्लादेश में छात्रों द्वारा किए गए हिंसक विरोध प्रदर्शनों और पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के देश छोड़ने पर तसलीमा नसरीन ने तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने चिंता जताई कि छात्र आंदोलन की आड़ में कट्टरपंथी ताकतें और जमात-ए-इस्लामी जैसे संगठन बांग्लादेश को एक इस्लामी राष्ट्र बनाने की दिशा में धकेल रहे हैं। उन्होंने बांग्लादेश में हिंदुओं और अन्य अल्पसंख्यकों पर हो रहे हमलों की कड़ी निंदा की और वहां की अंतरिम सरकार पर सवाल उठाए।
समान नागरिक संहिता (UCC) का खुलकर समर्थन
भारत में समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code) लागू करने की बहस पर तसलीमा ने हमेशा खुलकर अपनी राय रखी है। उनका मानना है कि पर्सनल लॉ अक्सर महिलाओं के अधिकारों का हनन करते हैं। उनके अनुसार, एक धर्मनिरपेक्ष देश में सभी नागरिकों विशेषकर महिलाओं के लिए विवाह, तलाक, गोद लेने और संपत्ति में अधिकार को लेकर एक समान कानून होना चाहिए। तस्लीमा नसरीन ने रविवार को भारत में समान नागरिक संहिता लागू करने की वकालत करते हुए कहा कि भेदभाव, विशेषकर महिलाओं के खिलाफ भेदभाव को खत्म करने के लिए ऐसा कानून आवश्यक है। उन्होंने पड़ोसी देशों बांग्लादेश और पाकिस्तान में भी इसी तरह के कानून की वकालत की।
कोलकाता में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए, 19 साल बाद लौटीं नसरीन ने कहा, मैं पिछले 40 वर्षों से यूसीसी के लिए संघर्ष कर रही हूं। किसी भी सभ्य देश में इसकी बहुत जरूरत है। बांग्लादेश में हिंदू महिलाओं के पास कोई अधिकार नहीं हैं। वे अपने पिता की संपत्ति की उत्तराधिकारी नहीं बन सकतीं। उन्हें तलाक का अधिकार भी नहीं है। अगर हिंदू महिलाओं को स्वतंत्रता और समान अधिकार प्राप्त करने हैं, तो समान नागरिक संहिता आवश्यक है। धार्मिक कानूनों के कारण बांग्लादेश में हिंदुओं पर अत्याचार हो रहे हैं। मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार के तहत हिंदुओं पर और भी अधिक अत्याचार किए गए। कई मदरसों और मस्जिदों में हिंदू विरोधी भावनाएं भड़काने वाली शिक्षाएं दी जाती हैं। बांग्लादेश, पाकिस्तान और भारत को यूसीसी की आवश्यकता है। सभी के लिए समान कानून होने चाहिए।
सम्मान और पहचान
तसलीमा नसरीन को अभिव्यक्त की स्वतंत्रता और मानवाधिकारों के लिए लड़ने के लिए वैश्विक स्तर पर कई बड़े पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है:
सखारोव पुरस्कार (Sakharov Prize): यूरोपीय संसद द्वारा विचारों की स्वतंत्रता के लिए दिया जाने वाला प्रतिष्ठित सम्मान।
कुर्त तुचोलस्की पुरस्कार (Kurt Tucholsky Prize) (स्वीडन)।
सिमोन द बेवोइर पुरस्कार (Simone de Beauvoir Prize) (फ्रांस)।
वतन से दूर, लेकिन आवाज रही बुलंद
कुल मिलाकर तसलीमा नसरीन एक ऐसी शख्सियत हैं जिन्हें न तो बांग्लादेश के कट्टरपंथी स्वीकार कर सके और न ही पारंपरिक राजनीति उन्हें पचा पाई। अपने वतन से दूर रहने के बावजूद, वे दक्षिण एशिया में अभिव्यक्ति की आजादी, स्त्री अधिकारों और धार्मिक सहिष्णुता के मामलों पर बिना किसी डर के अपनी बात रखना जारी रखे हुए हैं। भारत को उन्होंने अपना दूसरा घर माना है। 19 साल बाद कोलकाता लौटना उनके लिए एक विशेष क्षण था। कोलकाता को भी वह बांग्लादेश की तरह ही दिल में बसाए हुए हैं। यहां की आबोहवा, संस्कृति, रहन-सहन और संस्कृति उन्हें कोलकाता की याद दिलाती है। वह कई मौकों पर कोलकाता को अपने दिल के करीब बता चुकी हैं। कट्टरपंथियों के हंगामे के कारण ही उन्हें वाम सरकार के दौरान कोलकाता छोड़ना पड़ा था। लेकिन उन्होंने धर्मनिपपेक्षता और महिला न्याय को लेकर अपनी आवाज हमेशा बुलंद रखी थी और आज भी उनका यह अंदाज बरकरार है।