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कौन थे जगत सेठ, जो मुगलों और अंग्रेजों को भी देते थे लोन

पश्चिम बंगाल चुनाव की घोषणा हो चुकी है। इस बीच इतिहास के पन्नों में दर्ज जगत सेठ की कहानी जानना जरूरी है, जिनके बिना एक समय बंगाल में राज करना मुश्किल था। 18वीं सदी में यह परिवार इतना शक्तिशाली था कि मुगल दरबार, बंगाल के नवाब और अंग्रेज व्यापारी भी उनसे कर्ज लेते थे।

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एक समय बंगाल की राजनीति को बदलकर रख देते थे जगत सेठ
Authored by: Digpal Singh
Updated Mar 23, 2026, 10:30 IST
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पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव की घोषणा हो गई है। राज्य में 23 और 29 अप्रैल को दो चरणों में मतदान होगा और फिर 4 मई को चुनाव परिणामों की घोषणा की जाएगी। चुनाव पूर्व ओपिनियन पोल्स भी सामने आए हैं, जिनमें एक बार फिर जनता का भरोसा ममता बनर्जी (दीदी) और उनकी पार्टी ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस पर दिख रहा है। पश्चिम बंगाल चुनाव के दौरान हम इस राज्य को और करीब से जानेंगे। आज इसी कड़ी में जानते हैं जगत सेठ के बारे हैं। जगत सेठ आज के दौर के तमाम बड़े-बड़े अमीरों से भी अमीर थे। जगत सेठ इतने अमीर थे कि वह मुगलों और अंग्रेजों को भी लोन दिया करते थे। चलिए जगत सेठ के बारे में विस्तार से जानते हैं -

कौन थे जगत सेठ

इतिहास बताता है कि जगत सेठ कोई एक व्यक्ति नहीं था, बल्कि यह एक उपाधि (टाइटल) थी। यह उपाधि बंगाल के सबसे समृद्ध परिवार के मुखिया को दी जाती थी। अलग-अलग समय पर अलग-अलग मुगल बादशाहों ने बंगाल के उस व्यापारी या परिवार के मुखिया को यह उपाधि दी, जिसका वित्तीय प्रभाव पूरे साम्राज्य में फैला हुआ था।

जगत सेठ का असली नाम क्या था

मुर्शिदाबाद के ओसवाल जैन व्यापारी परिवार के मुखिया को समय-समय पर जगत सेठ की उपाधि मिली। इस परिवार के सेठ मणिकचंद को सबसे पहले यह उपाधि मिली। मणिकचंद के निधन के बाद उनके भतीजे फतेहचंद को यह उपाधि मिली। फतेहचंद के बाद उनके पोते मेहताब चंद और उनके बाद उनके बेटे सेठ कुशल चंद को जगत सेठ की उपाधि मिली। उनके बाद उनके भतीजे हरक चंद को यह उपाधि मिली, बाद में उनके बेटे इंद्र चंद, और इंद्र चंद के बाद उनके बेटे गोबिंद चंद भी जगत सेठ कहलाए। इस तरह से कह सकते हैं कि जगत सेठ कोई एक व्यक्ति नहीं, बल्कि उस अमीर परिवार के प्रमुख बैंकर के लिए सम्मान में इस्तेमाल होने वाली उपाधि थी। जगत सेठ उपाधि उनकी अपार धन-दौलत और राजनीतिक प्रभाव को दर्शाती थी।

18वीं सदी के सबसे शक्तिशाली व्यापारी

जगत सेठ का प्रभाव उस समय के समाज पर सरकार से भी ज्यादा रहा। मुर्शिदाबाद के इस धनी व्यापारी परिवार को 18वीं सदी में 'भारत का सबसे शक्तिशाली बैंकर' माना जाता था। यह परिवार इतना दौलतमंद और शक्तिशाली था कि तत्कालीन मुगल दरबार से लेकर बंगाल के नवाब और अंग्रेज व्यापारी तक उनसे उधार लेते थे, उनकी आर्थिक शक्ति पर ही निर्भर थे।

एक थप्पड़ ने बदल दिया बंगाल का नवाब

18वीं सदी के मध्य में बंगाल की सत्ता में सिराजुद्दौला का आगमन हुआ। सिराजुद्दौला एक युवा और महत्वकांक्षी नवाब था, लेकिन उसका स्वभाव कठोर और कभी-अभी बहुत ही अप्रत्याशित होता था। उस समय सेठ मेहताब चंद के पास जगत सेठ की उपाधि थी। नवाब सिराजुद्दौला चाहता था कि जगत सेठ तीन करोड़ रुपये देकर सत्ता में उसका स्वागत करें। जगत सेठ मेहताब चंद ने नवाब की यह मांग ठुकरा दी और इस पर नवाब सिराजुद्दौला ने जगत सेठ को थप्पड़ मार दिया। इसके बाद नवाब और जगत सेठ परिवार के रिश्ते लगातार बिगड़ते चले गए। इतिहासकारों के मुताबिक रिश्तों के बीच यही तनाव आगे चलकर एक बड़ी साजिश में बदला।

नवाब सिराजुद्दौला को हटाने में जगत सेठ की भूमिका

कहते हैं कि बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला को हटाने में मीर जाफर ने अंग्रेज गवर्नर जनरल रॉबर्ट क्लाइव के साथ मिलकर जो भूमिका निभाई, उसमें जगत सेठ की भी अहम भूमिका थी। कहते हैं कि जगत सेठ और बंगाल में उस समय के अन्य अमीर व्यापारियों ने नवाब सिराजुद्दौला के खिलाफ अंग्रेजों की साजिश के लिए धन मुहैया कराया था। हालांकि, यह भी सच है कि नवाब के खिलाफ अंग्रेजों की साजिश को फंड करने वाले किसी भी व्यापारी की यह मंशा नहीं थी कि अंग्रेज भारत पर राज करने लगें। बल्कि वह तो अपने राजनीतिक भविष्य के लिए ऐसा कर रहे थे।

आखिर 23 जून 1757 को प्लासी का युद्ध हुआ और इस युद्ध ने भारतीय इतिहास की दिशा बदल दी। मीर जाफर की सेना ने समय आने पर नवाब का साथ नहीं दिया, जिसके कारण नवाब सिराजुद्दौला की हार हुई और अंग्रेजों ने बंगाल की सत्ता हथिया कर मीर जाफर को नवाब बना दिया। इतिहासकारों का मानना है कि बंगाल नें सिराजुद्दौला की हार के पीछे जगत सेठ परिवार की आर्थिक और राजनीतिक भूमिका काफी अहम थी।

जगत सेठ परिवार का बुरा दौर

मीर जाफर के बाद मीर कासिम बंगाल का नवाब बना और उसने जगत सेठ परिवार के कई लोगों की हत्या करवा दी। यहां तक कि उसने 1763 में जगत सेठ मेहताब चंद और उनके चचेरे भाई स्वरूप चंद को भी मरवा दिया। अंग्रेज उनके खजाने और टकसाल को मुर्शीदाबाद से कोलकाता ले गए। इसके बाद मेहताब चंद के बेटे कुशल चंद को जगत सेठ की उपाधि दी गई, उस समय वह महज 18 साल के थे। इसके साथ ही जगत सेठ परिवार की संपत्ति और प्रभाव तेजी से घटने लगा। इस परिवार के आखिरी सदस्य का निधन भी साल 1912 में हो गया।

जगत सेठ की विरासत

जगत सेठ परिवार व्यापारी होने के साथ ही परोपकारी भी था। उन्होंने 18वीं सदी में बंगाल के समाज को आकार देने में अहम भूमिका निभाई थी। आज जगत सेठ के नाम पर मुर्शिदाबाद में 'जगत सेठ का महल', कोलकाता में एक बाजार 'जगत सेठ बाजार' और कई स्कूल, धर्मार्थ संस्थान व अस्पताल भी हैं।

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