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क्या यूरोप में चल रहा अरब स्प्रिंग जैसा दौर? क्या आपस में जुड़े हुए हैं 9 देशों में हो रहे विरोध प्रदर्शन?

पेरिस की सड़कों पर आगजनी, मिलान (इटली) और तिराना (अल्बानिया) में पुलिस के साथ झड़पें, और मैड्रिड (स्पेन) में आवास संकट के खिलाफ प्रदर्शनों ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। क्या यूरोप में 'अरब स्प्रिंग' जैसा दौर लौट रहा है....

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Photo : AP
फ्रांस-अल्बानिया समेत 9 देशों में विरोध-प्रदर्शनों का दौर
Authored by: अमित कुमार मंडल
Updated Oct 20, 2026, 14:32 IST
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हाल ही में फ्रांस, इटली, स्पेन, पुर्तगाल, बेल्जियम, ऑस्ट्रिया, जर्मनी, ग्रीस और अल्बानिया समेत कम से कम 9 यूरोपीय देशों में अचानक भड़के व्यापक और कई जगहों पर हिंसक प्रदर्शनों ने पूरी दुनिया का ध्यान खींचा है। खास तौर पर फ्रांस और अल्बानिया के हालात बेहद गंभीर हो गए हैं। अल्बानिया में प्रदर्शनकारियों ने सुप्रीम कोर्ट तक फूंक दिया है, वहीं फ्रांस के कई शहरों में आगजनी, लूटपाट जमकर हो रही है। पेरिस की सड़कों पर आगजनी, मिलान (इटली) और तिराना (अल्बानिया) में पुलिस के साथ झड़पें, और मैड्रिड (स्पेन) में आवास संकट के खिलाफ प्रदर्शनों ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। क्या यूरोप में 'अरब स्प्रिंग' जैसा दौर लौट रहा है और क्या ये 9 देशों के विरोध प्रदर्शन आपस में जुड़े हुए हैं? इसे समझते हैं।

1.फ्रांस

महंगाई, शिक्षा संकट और हिंसक दंगे का मुख्य कारण हैं। फ्रांस इस वक्त इस पूरे विरोध प्रदर्शन का केंद्र बना हुआ है। यहां स्कूली शिक्षा के गिरते स्तर, शिक्षकों की कमी और बजट में कटौती के खिलाफ छात्र और युवा सड़कों पर उतरे। इसके साथ ही आसमान छूती महंगाई और आव्रजन नीतियों ने आग में घी का काम किया है। पेरिस, मार्सिले, ल्योन और बोर्डो जैसे शहरों में प्रदर्शन हिंसक हो गए। प्रदर्शनकारियों ने कई जगहों पर आगजनी की और ऐप्पल (Apple), लुई विटन (Louis Vuitton) और हर्मीस (Hermès) जैसे बड़े ब्रांड्स के स्टोर्स में लूटपाट की। सरकार ने स्थिति से निपटने के लिए कर्फ्यू लगाया है और 2,400 से अधिक लोगों की गिरफ्तारी हो चुकी है। फ्रांस जैसे देशों में दक्षिणपंथी नेता (जैसे मरीन ले पेन) इस पूरी स्थिति के लिए अनियंत्रित इमिग्रेशन को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं, जिससे वहां राजनीतिक ध्रुवीकरण और तेज हो रहा है।

2. इटली

इटली में आर्थिक तंगी, बढ़ती जीवन लागत और सरकार की नीतियों के खिलाफ लोगों का गुस्सा फूटा है। मिलान जैसे प्रमुख शहरों में "इटालिया इन पियाजा" (Italia in Piazza) के बैनर तले लोग सड़कों पर उतरे। मिलान में कैथेड्रल के सामने प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच तीखी झड़पें हुईं, जिसमें कई पुलिसकर्मी घायल हुए। प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी को यह चेतावनी देनी पड़ी कि प्रदर्शन करना अधिकार है, लेकिन हमारे शहरों को तोड़ना-फोड़ना नहीं।

3. अल्बानिया

बाकी यूरोपीय देशों से अलग, अल्बानिया के प्रदर्शन सीधे तौर पर राजनीतिक सत्ता परिवर्तन की ओर बढ़ रहे हैं। यहां युवा प्रधानमंत्री एदी रामा (Edi Rama) के 13 साल के शासनकाल के दौरान फैले भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और सरकारी धन के दुरुपयोग के खिलाफ विरोध कर रहे हैं। शुरुआत में यह विरोध एक संवेदनशील द्वीप पर विवादित रिजॉर्ट प्रोजेक्ट के खिलाफ था, जो बाद में व्यापक सरकार विरोधी आंदोलन बन गया। राजधानी तिराना में प्रदर्शनकारियों ने संसद और सरकारी दफ्तरों को निशाना बनाया। पुलिस पर पेट्रोल बम फेंके गए। प्रदर्शनकारी प्रधानमंत्री के इस्तीफे की मांग पर अड़े हैं और हालात लगभग बेकाबू हैं।

4. स्पेन

स्पेन (खासकर मैड्रिड और बार्सिलोना) में मुख्य समस्या आसमान छूते किराए और मकानों की भारी कमी है। कम आय वाले युवाओं और किराएदारों का कहना है कि वे अपने ही शहरों में घर खरीदने या किराए पर लेने में असमर्थ हो चुके हैं। पुएर्ता डेल सोल (Puerta del Sol) जैसे प्रसिद्ध चौराहों पर बड़े पैमाने पर प्रदर्शन हुए, जिसमें कड़े किराए नियंत्रण कानून और किफायती आवास की मांग की गई।

5. पुर्तगाल

स्पेन की तरह पुर्तगाल में भी मुख्य मुद्दे महंगाई, कम वेतन और रहने-खाने के बढ़ते खर्च हैं। राजधानी लिस्बन और अन्य शहरों में कामगारों और युवाओं ने रैलियां निकालीं, जिसमें न्यूनतम मजदूरी बढ़ाने और आवास संकट से राहत देने की मांग की गई।

6. बेल्जियम

बेल्जियम की राजधानी ब्रुसेल्स और लीज (Liège) शहर में प्रदर्शनों की मुख्य वजह स्कूलों की जर्जर स्थिति और शिक्षा पर बढ़ता खर्च रहा। प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच तीखी झड़पें हुईं। हालात इतने बिगड़े कि पुलिस को आंसू गैस और वाटर कैनन का इस्तेमाल करना पड़ा। आंतरिक मंत्री को खुद यह कहना पड़ा कि ब्रुसेल्स में जो हो रहा है, वह अब सामान्य प्रदर्शन नहीं बल्कि शुद्ध हिंसा है।

7. ऑस्ट्रिया

ऑस्ट्रियाई राष्ट्रीय विश्वविद्यालय संघ द्वारा अगले तीन सालों के बजट में 1 अरब यूरो (1 Billion Euros) की भारी-भरकम कटौती के ऐलान के बाद छात्र भड़क उठे। छात्र संगठनों ने कक्षाओं का बहिष्कार और सड़कों पर विरोध प्रदर्शन की तैयारी शुरू कर दी है।

8. जर्मनी

जर्मनी में अन्य देशों की तुलना में विरोध का स्वरूप थोड़ा अलग है। यहां के छात्र और युवा देश की सरकार द्वारा लाई जा रही नई सैन्य-सेवा योजनाओं का पुरजोर विरोध कर रहे हैं। युवाओं में डर है कि सरकार उन्हें अनिवार्य रूप से सेना में झोंक सकती है। इसके विरोध में म्यूनिख समेत कई जगहों पर छात्रों ने फ्रांस के प्रदर्शनकारियों के समर्थन में भी प्रदर्शन किए।

9. ग्रीस

आर्थिक संकट के जख्मों से पूरी तरह उबर न पाने वाले ग्रीस में भी युवा वर्ग महंगे मकानों और महंगाई की मार से त्रस्त है। एथेंस और अन्य शहरों में छात्रों और कामगारों ने रैलियां निकालकर सरकार से राहत पैकेज और आर्थिक सुधारों की मांग की है।

1. क्या यूरोप में 'अरब स्प्रिंग' जैसा दौर चल रहा है?

सीधे तौर पर इसे 'अरब स्प्रिंग' कहना जल्दबाजी होगी, हालांकि असंतोष का स्तर और सड़कों पर उमड़ती भीड़ उस दौर की याद जरूर दिला रही है। अरब स्प्रिंग (2011) मध्य पूर्व और उत्तरी अफ्रीका में निरंकुश तानाशाहों, तानाशाही शासन और दशकों पुरानी सत्ता को उखाड़ फेंकने के लिए एक जन-विद्रोह था। वहां चुनावी या लोकतांत्रिक सुधारों की कोई गुंजाइश नहीं थी। इसके विपरीत, वर्तमान में विरोध प्रदर्शन झेल रहे यूरोपीय देश मजबूत लोकतांत्रिक व्यवस्थाएं हैं। यहां की जनता के पास सरकार बदलने, अपनी बात रखने और संस्थागत तरीकों से बदलाव लाने के विकल्प मौजूद हैं। इसलिए, इसे 'अरब स्प्रिंग' की बजाय 'समकालीन लोकतांत्रिक असंतोष और आर्थिक उबाल' कहना ज्यादा सटीक होगा। हालांकि, जानकारों का मानना है कि अगर सरकारों ने समय रहते महंगाई और युवाओं के भविष्य पर ध्यान नहीं दिया, तो यह विस्फोटक रूप ले सकता है।

क्या 9 देशों में हो रहे ये प्रदर्शन आपस में जुड़े हुए हैं?

ये विरोध प्रदर्शन किसी एक केंद्रीय संगठन या पूर्व-नियोजित अंतरराष्ट्रीय साजिश के तहत आपस में जुड़े हुए नहीं हैं। इन सभी देशों में विरोध-प्रदर्शनों के मूल कारण और स्थानीय मुद्दे अलग-अलग हैं। हालांकि, इन अलग-अलग देशों की घटनाओं के बीच 'समान शिकायतों' का एक साझा धागा जरूर जुड़ा हुआ है। फ्रांस और ऑस्ट्रिया में शिक्षा बजट में कटौती और जीवनयापन के बढ़ते खर्च ने लोगों को सड़कों पर ला दिया है। वहीं स्पेन, पुर्तगाल और ग्रीस में आसमान छूती महंगाई और मकानों/किरायों के संकट (Housing Crisis) के खिलाफ युवा और आम लोग प्रदर्शन कर रहे हैं।

इन प्रदर्शनों से किस तरह की चिंताएं पैदा हो रही हैं?

इन प्रदर्शनों की सबसे बड़ी समस्या यह है कि शांतिपूर्ण प्रदर्शनों के अंत में कुछ असामाजिक तत्व और उपद्रवी घुसपैठ कर जाते हैं, जो दुकानों में लूटपाट, आगजनी और सरकारी संपत्तियों को नुकसान पहुंचाते हैं। भले ही यूरोप के 9 देशों के ये आंदोलन एक-दूसरे से सीधे जुड़े न हों, लेकिन वे इस बात का संकेत जरूर देते हैं कि पूरा यूरोप एक जैसे आर्थिक और सामाजिक दबाव से गुजर रहा है। सीमाएं भले अलग हों, लेकिन स्पेन के किराए के संकट से लेकर फ्रांस की शिक्षा और महंगाई की आग तक, यूरोपीय युवा एक ही सुर में अपनी सरकारों को यह बता रहे हैं कि वर्तमान व्यवस्था में उन्हें अपना भविष्य सुरक्षित नजर नहीं आ रहा है।

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