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Explained: आखिर कहां बिगड़ गई बात, 'शांति वार्ता' होते-होते कैसे शुरू हो गई ईरान-इजराइल में जंग?

जब पूरी दुनिया की नजरें शांति की आस में पश्चिम एशिया पर टिकी थीं। उधर ट्रंप शांति वार्ता का दावा कर रहे थे कि रविवार को हालात बिगड़ गए। जानिए कैसे ईरान और इजराइल के बीच शांति समझौता साइन होने से ठीक पहले अचानक युद्ध दोबारा भड़क उठा और क्यों नेतन्याहू ट्रंप के सख्त निर्देशों को अनसुना कर रहे हैं।

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Photo : Times Now Digital
नेतन्याहू की जिद, हिजबुल्ला का अड़ियल रुख और ट्रंप का पावर गेम
Authored by: Nishant Tiwari
Updated Jun 8, 2026, 19:11 IST
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Times Now Navbharat Explainer: पिछले कुछ दिनों से पूरी दुनिया इस उम्मीद में थी कि शायद पश्चिम एशिया से अब युद्ध की खौफनाक खबरें आना बंद हो जाएंगी। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप बार-बार दावा कर रहे थे कि वे एक ऐसी डील के करीब हैं, जो पिछले 100 दिनों से जारी इस भीषण युद्ध को हमेशा के लिए शांत कर देगी। खुद ट्रंप ने फॉक्स न्यूज से कहा था, "हम समझौते के बेहद करीब हैं। मुझे लग रहा था कि सोमवार, मंगलवार या बुधवार तक डील साइन हो जाएगी।" लेकिन, इतिहास गवाह है कि खाड़ी देशों की भू-राजनीति में शांति की बातें जितनी करीब दिखती हैं, उतनी ही तेजी से वे रेत की तरह हाथ से फिसल भी जाती हैं। और पिछले 24 घंटों से ये बात फिर साबित होते दिख भी रही है। खाड़ी में फिर आसमान मिसाइलों और हवाई हमलों की आग से दहल उठा। 28 फरवरी 2026 को शुरू हुई इस जंग को अप्रैल में एक नाजुक युद्धविराम मिला था, जो बीते 24 से 48 घंटों में पूरी तरह तार-तार हो गया। पश्चिम एशिया के इस महायुद्ध में केवल इजराइल और ईरान के हथियार ही नहीं टकरा रहे हैं, बल्कि पर्दे के पीछे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और इजराइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के बीच भी एक भयंकर 'पावर गेम' चल रहा है। आखिर शांति की दहलीज पर खड़ा यह पूरा क्षेत्र अचानक दोबारा बारूद के ढेर पर कैसे बैठ गया? कहां बिगड़ गई बात? आइए सिलसिलेवार ढंग से इस पूरे घटनाक्रम को बारीकी से समझते हैं।

कैसे हुई शुरुआत

इस ताजा और भीषण सैन्य टकराव की शुरुआत रविवार को हुई। अमेरिका की मेजबानी में वाशिंगटन के भीतर लेबनान और इजराइल की सरकारों के बीच युद्धविराम को आगे बढ़ाने के लिए चौथे दौर की बातचीत चल रही थी। इस बातचीत के बीच इजराइल और लेबनान ने एक सुरक्षा क्षेत्र बनाने पर सहमति जताई थी, जहां ईरान समर्थित चरमपंथी संगठन हिजबुल्ला के लड़ाकों का प्रवेश प्रतिबंधित होना था। लेकिन, 4 जून को हिजबुल्ला के प्रमुख नईम कासिम ने इस समझौते को पूरी तरह खारिज कर दिया। कासिम ने दोटूक कहा कि दक्षिणी लेबनान से लड़ाकों को हटाने की मांग 'आत्मसमर्पण' जैसी है और जब तक इजराइली सेना पूरी तरह पीछे नहीं हटती, वे हमले बंद नहीं करेंगे। इसके बाद हिजबुल्ला ने उत्तरी इजराइल पर गोलाबारी कर दी।

जवाब में इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और रक्षा मंत्री इजराइल काट्ज के आदेश पर इजराइली वायुसेना ने रविवार को लेबनान की राजधानी बेरूत के दक्षिणी उपनगरों (दहियाह जिले) में हिजबुल्ला के ठिकानों पर भीषण हवाई हमले किए। बेरूत पर हुआ यह हमला ही वह चिंगारी बना जिसने ईरान को सीधे युद्ध में कूदने पर मजबूर कर दिया। ईरान ने अपनी चेतावनी को हकीकत में बदलते हुए रविवार देर रात और सोमवार की सुबह इजराइल पर ताबड़तोड़ लगभग 30 बैलिस्टिक मिसाइलें दाग दीं। अप्रैल के युद्धविराम के बाद यह पहला मौका था जब ईरान ने सीधे इजराइल की मुख्य जमीन को निशाना बनाया। इस हमले के बाद सोमवार को युद्ध के ठीक 100वें दिन दोनों देशों ने आधिकारिक तौर पर एक-दूसरे पर सीधे हमले किए।

बीच में आए डोनाल्ड ट्रंप: "आपने मिसाइलें दाग दीं, बस बहुत हुआ"

यह अचानक भड़का तनाव अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के लिए किसी बड़े झटके से कम नहीं था, क्योंकि वे ईरान के साथ एक ऐतिहासिक और व्यापक परमाणु सौदा अंतिम चरण में पहुंचा चुके थे। ट्रंप लगातार इजरायली पीएम बेंजामिन नेतन्याहू पर सैन्य संयम बरतने का दबाव बना रहे थे।

हालात बिगड़ते देख ट्रंप ने तुरंत हालात संभालने की कोशिश भी की। एक्सिओस की रिपोर्ट के अनुसार, ईरानी मिसाइलें गिरते ही ट्रंप ने सीधे नेतन्याहू को फोन घुमाया और उनसे पलटवार न करने की सख्त हिदायत दी। ट्रंप ने राजनीतिक दबाव कम करने के लिए सार्वजनिक रूप से यहां तक कह दिया, "ईरान के हमलों से किसी को कोई नुकसान नहीं हुआ। उम्मीद है कि इजराइल अब पलटवार नहीं करेगा।" बीते दिनों ट्रंप ने फाइनेंशियल टाइम्स को दिए इंटरव्यू में अपना दबदबा दिखाते हुए कहा कि इस मध्यस्थता में "फैसले वे खुद ले रहे हैं"। उन्होंने चेतावनी दी, "अगर बिबी (नेतन्याहू) ने पलटवार किया, तो हालात वैसे ही होते जाएंगे जैसे पिछले 3,000 सालों से हैं। उनके पास अमेरिकी समझौते को मानने के अलावा कोई विकल्प नहीं होगा।"

पर्दे के पीछे का खेल: 'नो न्यू वॉर्स' का नारा और ट्रंप की अपनी मजबूरी

इस पूरे विवाद में एक दिलचस्प पहलू ट्रंप की अपनी घरेलू राजनीति भी है। NBC के 'मीट द प्रेस' कार्यक्रम में जब एंकर ने ट्रंप को घेरा कि ईरान के साथ इस साल युद्ध शुरू करके उन्होंने अपने चुनाव प्रचार के मुख्य नारे "कोई नया युद्ध नहीं" को धोखा दिया है, तो ट्रंप भड़क गए। ट्रंप ने अपना बचाव करते हुए कहा, "मैंने कभी यह गारंटी नहीं दी थी कि कोई नया युद्ध नहीं होगा। अगर ऐसा होता तो मैं दुनिया की सबसे शक्तिशाली सेना क्यों बनाता? मुझे अंतहीन युद्ध पसंद नहीं हैं, लेकिन हम इस युद्ध में केवल तीन महीने से शामिल हैं। ईरान को परमाणु हथियार बनाने से रोकना दुनिया और हमारे देश के हित में है।" असल में, होर्मुज जलडमरूमध्य के बंद होने से ईंधन की बढ़ती कीमतें और वैश्विक व्यापार में आ रही रुकावटें अमेरिका में होने वाले आगामी मध्यावधि चुनावों में रिपब्लिकन पार्टी की संभावनाओं को नुकसान पहुंचा सकती हैं। यही वजह है कि ट्रंप किसी भी कीमत पर लेबर डे (7 सितंबर) से बहुत पहले इस समस्या को सुलझाना चाहते हैं।

नेतन्याहू क्यों फंसा रहे पेच?

इस पूरे विवाद में एक और सबसे बड़ा और पेचीदा पहलू यह है कि इजराइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू आखिर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की बातों को अनसुना क्यों कर रहे हैं? हाल ही में न्यूयार्क पोस्ट के पॉडकास्ट में ट्रंप ने खुद इस बात की पुष्टि की कि सोमवार को फोन पर हुई बेहद तीखी बातचीत के दौरान उन्होंने नेतन्याहू को 'पागल' तक कह दिया था। अमेरिकी मीडिया एक्सिओस के मुताबिक, ट्रंप ने गुस्से में यहां तक कहा था, "तुम्हारी वजह से आज पूरी दुनिया इजराइल से नफरत कर रही है।" इसके बावजूद, नेतन्याहू लगातार लेबनान में हिजबुल्ला पर हमले जारी रखे हुए हैं और ट्रंप के मना करने के बाद भी सैन्य दबाव कम नहीं कर रहे हैं। आखिर ऐसा क्यों है कि कभी ट्रंप के सबसे करीबी रहे नेतन्याहू आज उनकी बात मानने को तैयार नहीं हैं?

रणनीतिक और वैचारिक मतभेद

डोनाल्ड ट्रंप और बेंजामिन नेतन्याहू के बीच टकराव की सबसे बुनियादी वजह दोनों की युद्ध को लेकर एकदम जुदा सोच है। ट्रंप एक 'बिजनेस माइंडसेट' और 'डील मेकर' की तरह काम कर रहे हैं। वे ईरान पर सख्त आर्थिक नाकाबंदी बनाए रखकर उसे बातचीत की मेज पर लाने के लिए बेताब हैं। ट्रंप का मुख्य लक्ष्य अमेरिका में होने वाले मध्यावधि चुनावों से पहले एक ऐतिहासिक परमाणु समझौता हासिल करना है, ताकि वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें काबू में आ सकें। इसके ठीक उलट, नेतन्याहू का मानना है कि किसी भी कागजी समझौते से इजराइल पर मंडरा रहा ईरान का खतरा स्थायी रूप से खत्म नहीं होने वाला। वे इस संकट को एक सुनहरे सैन्य अवसर के रूप में देख रहे हैं, जिसका फायदा उठाकर वे ईरान के परमाणु कार्यक्रम और उसके पूरे प्रॉक्सी नेटवर्क (हिजबुल्ला और हूती) को हमेशा के लिए पंगु या पूरी तरह तबाह कर देना चाहते हैं। यही वजह है कि नेतन्याहू ने साफ कर दिया है कि जब तक जमीनी स्तर पर हिजबुल्ला का खतरा खत्म नहीं होता, इजराइल बेरूत और दक्षिणी लेबनान पर बमबारी नहीं रोकेगा।

नेतन्याहू पर 'कमजोर' न दिखने का भारी दबाव

वैचारिक मतभेदों के अलावा, नेतन्याहू इजराइल की घरेलू राजनीति के चक्रव्यूह में भी बुरी तरह फंसे हुए हैं, जहां हालिया जनमत संग्रह उनकी गिरती लोकप्रियता और सत्ता खोने के डर को साफ दिखा रहे हैं। इजराइल के प्रमुख अखबार 'माआरिव' के विश्लेषकों से लेकर विपक्षी नेताओं तक, सब नेतन्याहू पर यह आरोप लगाकर चौतरफा हमला कर रहे हैं कि वे ट्रंप के सामने बेहद 'कमजोर' साबित हुए हैं, जिन्होंने सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए इजराइल पर दबाव बनाकर जबरन ऐसे सीजफायर थोपे जो देश के हितों के खिलाफ थे। इसके साथ ही, नेतन्याहू की गठबंधन सरकार में शामिल धुर-दक्षिणपंथी सहयोगियों (जैसे बेन ग्विर और स्मोट्रिच) का यह सख्त रुख है कि ईरान की हर मिसाइल का जवाब बेरूत को दहला कर दिया जाना चाहिए। ऐसे में, यदि नेतन्याहू ट्रंप की 'कागजी शांति वार्ता' को मानकर शांत बैठ जाते हैं, तो इजराइल में उनका राजनीतिक अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाएगा। अपनी संप्रभुता, आत्मसम्मान और प्रधानमंत्री की कुर्सी को बचाने के लिए नेतन्याहू के पास अमेरिका के सामने झुकने से इनकार करने और युद्ध को जारी रखने के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं बचा है।

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