4 सितंबर 2026 की सुबह जब देश के ज्यादातर लोग सो रहे थे, तब श्रीहरिकोटा से भारत की अंतरिक्ष ताकत ने एक बार फिर लंबी छलांग लगाई। सुबह 2:55 बजे जीएसएलवी-एफ17 (GSLV-F17) ने उड़ान भरी और करीब 19 मिनट बाद ईओएस-05 (EOS-05) को उसकी निर्धारित सब-जियोसिंक्रोनस ट्रांसफर ऑर्बिट में सफलतापूर्वक पहुंचा दिया। इसके बाद इसरो ने मिशन को सफल बताया।
यह उस रॉकेट की वापसी थी, जिसे कभी इसरो के भीतर प्यार और चिंता दोनों के साथ 'नॉटी ब्वॉय' (Naughty Boy) कहा जाता था। इससे भी बड़ी बात यह है कि यह सफलता ऐसे समय आई है, जब तकनीकी खामियों की वजह से इसरो को हाल के कुछ मिशनों में परेशानियों का सामना करना पड़ा है। आइए समझते हैं कि आखिर जीएसएलवी को 'नॉटी ब्वॉय' क्यों कहा गया? वहीं, ईओएस-05 उपग्रह क्या करने वाला है? दूसरी ओर, इस एक मिशन की सफलता भारत के लिए इतनी महत्वपूर्ण क्यों मानी जा रही है?
जीएसएलवी-एफ17 ने आखिर किया क्या?
जीएसएलवी-एफ17 भारत के भू-समकालिक सैटेलाइट प्रक्षेपण यान की एक महत्वपूर्ण उड़ान है। इसे मुख्य रूप से भारी उपग्रहों को धरती से बहुत ऊंची कक्षाओं तक पहुंचाने के लिए विकसित किया गया है। इस मिशन में जीएसएलवी-एफ17 अपने साथ करीब 2,376 किलोग्राम वजनी ईओएस-05 सैटेलाइट लेकर गया।
रॉकेट ने सैटेलाइट को निर्धारित कक्षा में सफलतापूर्वक स्थापित किया। इसके बाद सैटेलाइट अपने इंजन की मदद से अपनी अंतिम कक्षा यानी भू-स्थिर कक्षा की ओर बढ़ेगा। आसान भाषा में समझें तो जीएसएलवी-एफ17 का काम सिर्फ सैटेलाइट को अंतरिक्ष में ले जाना नहीं था, बल्कि उसे इतनी ऊंची कक्षा तक पहुंचाना था, जहां से वह धरती के बड़े हिस्से पर लगातार नजर रख सके।
एसएलवी-एफ17 अपने साथ करीब 2,376 किलोग्राम वजनी ईओएस-05 सैटेलाइट लेकर गया।
जीएसएलवी क्या है?
जीएसएलवी यानी भू-समकालिक सैटेलाइट प्रक्षेपण यान भारत का भारी उपग्रह प्रक्षेपण रॉकेट है। इसे भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन ने विकसित किया है। जीएसएलवी की लंबाई करीब 51.7 मीटर और प्रक्षेपण के समय इसका वजन लगभग 420.5 टन होता है। इस रॉकेट में तीन मुख्य चरण होते हैं। पहले चरण में ठोस ईंधन वाले मुख्य इंजन के साथ चार तरल ईंधन वाले सहायक रॉकेट लगाए जाते हैं।
दूसरे चरण में तरल ईंधन से चलने वाला इंजन होता है। तीसरे और सबसे महत्वपूर्ण चरण में भारत में विकसित क्रायोजेनिक यानी अत्यंत कम तापमान पर काम करने वाला ऊपरी चरण होता है।
यही क्रायोजेनिक चरण जीएसएलवी की सबसे बड़ी तकनीकी ताकतों में से एक है।
क्रायोजेनिक इंजन इतना खास क्यों है?
रॉकेट को जितने भारी सैटेलाइट को अंतरिक्ष में ले जाना होता है, उतनी ही ज्यादा ताकत और दक्षता की जरूरत होती है। यहां क्रायोजेनिक इंजन बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है।
इस इंजन में तरल हाइड्रोजन और तरल ऑक्सीजन का इस्तेमाल होता है। तरल हाइड्रोजन का तापमान करीब माइनस 253 डिग्री सेल्सियस, जबकि तरल ऑक्सीजन का तापमान करीब माइनस 183 डिग्री सेल्सियस होता है।
इतने कम तापमान पर ईंधन को संभालना, उसे इंजन तक पहुंचाना और फिर उससे लगातार शक्तिशाली धक्का पैदा करना बेहद जटिल तकनीकी काम है। लेकिन इसका फायदा भी बहुत बड़ा है। क्रायोजेनिक इंजन कम वजन में ज्यादा ऊर्जा और ज्यादा दक्षता देता है। यही वजह है कि भारी उपग्रहों को बहुत ऊंची कक्षाओं में पहुंचाने के लिए ऐसी तकनीक बेहद उपयोगी मानी जाती है।
ईओएस-05 सैटेलाइट की तस्वीर।
भारत को यह तकनीक खुद क्यों विकसित करनी पड़ी?
भारत को भारी कॉमनिकेशन सैटेलाइट को अंतरिक्ष में भेजने के लिए लंबे समय से क्रायोजेनिक तकनीक की जरूरत थी। 1990 के दशक में भारत ने रूस से यह तकनीक हासिल करने की कोशिश की थी। लेकिन अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक दबाव और तकनीक हस्तांतरण पर लगी पाबंदियों के कारण भारत को पूरी तकनीक नहीं मिल सकी। इसके बाद भारत ने फैसला किया कि वह इस तकनीक को खुद विकसित करेगा। इसके बाद भारतीय वैज्ञानिकों ने करीब दो दशकों तक लगातार अनुसंधान, परीक्षण, असफलताओं और सुधार का दौर देखा। कई बार परीक्षण उम्मीद के मुताबिक नहीं रहे, लेकिन हर असफलता से वैज्ञानिकों ने कुछ नया सीखा।
आखिरकार भारत ने अपनी क्रायोजेनिक तकनीक विकसित की और उसे अपने प्रक्षेपण यानों में इस्तेमाल करना शुरू किया। यही वजह है कि जीएसएलवी की सफलता को सिर्फ एक रॉकेट की सफलता नहीं माना जाता। यह भारत की स्वदेशी अंतरिक्ष तकनीक की भी बड़ी उपलब्धि है।
जीएसएलवी को अनौपचारिक तौर पर ‘नॉटी ब्वॉय’ कहा जाने लगा।
जीएसएलवी को ‘नॉटी’ क्यों कहा गया?
जीएसएलवी की शुरुआत हमेशा आसान नहीं रही। शुरुआती उड़ानों में इसे कई मुश्किलों का सामना करना पड़ा। पहले 18 मिशनों में से कुछ पूरी तरह सफल नहीं रहे। इन उतार-चढ़ाव के कारण जीएसएलवी को अनौपचारिक तौर पर ‘नॉटी ब्वॉय’ कहा जाने लगा। लेकिन इस नाम के पीछे एक दिलचस्प कहानी भी है। रॉकेट ने शुरुआत में कई बार वैज्ञानिकों की परीक्षा ली, लेकिन हर असफलता के बाद इसमें सुधार किया गया। धीरे-धीरे इसकी विश्वसनीयता बढ़ती गई और आज यही रॉकेट भारत की महत्वपूर्ण अंतरिक्ष क्षमताओं का हिस्सा बन चुका है।
2021 में भी आई थी बड़ी चुनौती
जीएसएलवी के सफर में अगस्त 2021 का मिशन भी बेहद महत्वपूर्ण था। जीएसएलवी-एफ10 के जरिए जीसैट-1 यानी ईओएस-03 उपग्रह को अंतरिक्ष में भेजा जाना था। रॉकेट के शुरुआती चरणों ने सामान्य प्रदर्शन किया, लेकिन अंतिम क्रायोजेनिक चरण में समस्या आने के कारण मिशन सफल नहीं हो पाया।यह मिशन इसलिए महत्वपूर्ण था क्योंकि उपग्रह का उद्देश्य भू-समकालिक कक्षा से लगातार धरती की तस्वीरें और जानकारी उपलब्ध कराना था। अब ईओएस-05 के जरिए इसी तरह की क्षमता को आगे बढ़ाने की कोशिश की गई है।
ईओएस-05 क्या करेगा?
ईओएस-05 सैटेलाइट एक पृथ्वी अवलोकन सैटेलाइट है। इसका सबसे खास पहलू यह है कि इसे बहुत ऊंची कक्षा से धरती की तस्वीरें लेने और बड़े क्षेत्र पर लगातार नजर रखने के लिए तैयार किया गया है। आमतौर पर धरती की निगरानी करने वाले कई सैटेलाइट धरती के काफी नजदीक वाली कक्षा में घूमते हैं। वे लगातार धरती का चक्कर लगाते हैं और किसी खास इलाके के ऊपर से गुजरने के बाद कुछ समय बाद दोबारा वहां पहुंचते हैं।
इसे ऐसे समझिए कि निचली कक्षा वाला उपग्रह किसी इलाके की तस्वीर लेकर आगे बढ़ जाता है और कुछ समय बाद फिर उसी इलाके के ऊपर आता है। वहीं, भू-समकालिक कक्षा वाला उपग्रह धरती के घूमने की गति के साथ तालमेल रखते हुए एक बड़े क्षेत्र पर लगातार नजर रखने की क्षमता देता है। ईओएस-05 की यही सबसे बड़ी खासियत है।
पढ़ें ईओएस-05 सैटेलाइट की खासियत। AI IMAGE
करीब 36 हजार किलोमीटर ऊपर से धरती पर नजर
ईओएस-05 को करीब 36 हजार किलोमीटर की ऊंचाई वाली भू-स्थिर कक्षा में स्थापित किया जाना है। इतनी ऊंचाई से सैटेलाइट धरती के बहुत बड़े हिस्से को देख सकता है। इसका मतलब यह है कि किसी बड़े इलाके में मौसम, पर्यावरण या किसी प्राकृतिक आपदा जैसी घटनाओं पर लगातार नजर रखने में मदद मिल सकती है। इसी वजह से ऐसे उपग्रहों को आसान भाषा में ‘आसमान की आंख’ भी कहा जा सकता है।
धरती के बड़े हिस्से पर निगरानी रख सकता है ईओएस-05 सैटेलाइट।
सिर्फ जासूसी के लिए नहीं है ईओएस-05
ईओएस-05 को केवल जासूसी या सीमा पर नजर रखने वाला सैटेलाइट समझना सही नहीं होगा। पृथ्वी अवलोकन उपग्रहों का इस्तेमाल कई नागरिक और वैज्ञानिक कामों में किया जाता है।
मौसम की निगरानी, बादलों की गतिविधियों को समझने, चक्रवातों पर नजर रखने, बाढ़ से प्रभावित इलाकों की जानकारी जुटाने और जंगलों में लगी आग के फैलाव का पता लगाने में उपग्रहों से मिलने वाली तस्वीरें बेहद उपयोगी हो सकती हैं। इसके अलावा खेती, जंगल, जमीन के इस्तेमाल में बदलाव, पर्यावरण और बड़े निर्माण कार्यों की निगरानी में भी ऐसी तकनीक मदद करती है।
बाढ़ और प्राकृतिक आपदाओं में कैसे मदद मिलेगी?
मान लीजिए किसी इलाके में अचानक बड़ी बाढ़ आ गई। जमीन पर मौजूद बचाव दल के लिए हर जगह पहुंचना मुश्किल हो सकता है। ऐसे समय में अंतरिक्ष से मिलने वाली लगातार तस्वीरें यह पता लगाने में मदद कर सकती हैं कि पानी कहां तक पहुंचा है, कौन से इलाके सबसे ज्यादा प्रभावित हैं और किन क्षेत्रों में राहत अभियान की सबसे ज्यादा जरूरत है। इसी तरह चक्रवात के दौरान बादलों की गतिविधि और तूफान के फैलाव पर नजर रखने में भी उपग्रह महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
ईओएस-05 का महत्व केवल मौसम और आपदा प्रबंधन तक सीमित नहीं है। किसी बड़े इलाके पर लगातार नजर रखने की क्षमता राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से भी महत्वपूर्ण होती है। इससे समुद्री गतिविधियों, सीमावर्ती क्षेत्रों और अन्य रणनीतिक इलाकों के बारे में बेहतर जानकारी हासिल करने में मदद मिल सकती है।
