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भारत की रक्षा तैयारियों को कितना मजबूती देगा रैमजेट इंजन? मिसाइल प्रोग्राम के लिए इसे क्यों बताया जा रहा 'वरदान'

रैमजेट तकनीक का सबसे बड़ा लाभ इसकी सरल संरचना और उच्च गति पर बेहतर दक्षता है। यह पारंपरिक जेट इंजन की तुलना में कम जटिल होता है और सुपरसोनिक रेंज में ज्यादा प्रभावी रहता है। हालांकि, कम गति या स्थिर अवस्था में यह काम नहीं कर सकता, इसलिए इसे बूस्टर इंजन की जरूरत पड़ती है।

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भारत ने किया है रैमजेट इंजन का सफल परीक्षण। तस्वीर-DRDO
Written by: Alok Rao
Updated Feb 5, 2026, 15:03 IST
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What is Solid Fuel Ducted Ramjet: मिसाइल टेक्नॉलजी में भारत दुनिया की एक बड़ी ताकत बन चुका है। नए कीर्तमानों ने उसे जटिल एवं उन्नत मिसाइल तकनीक रखने वाले एलीट देशों के क्लब में शामिल कर दिया है। अब रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) के सॉलिड फ्यूल डक्टेड रैमजेट (SFDR) इंजन के सफल परीक्षण ने कामयाबी में चार चांद लगा दिया है। डीआरडीओ ने बीत तीन जनवरी को ओडिशा के चांदीपुर रेंज में SFDR का सफल टेस्ट किया। इस माना जा रहा है कि सफल परीक्षण के बाद डीआरडीओ को हवा से हवा में मार करने वाली लंबे दूरी की अगली पीढ़ी की मिसाइलें बनाने में काफी मदद मिलेगी।

क्या है रैमजेट टेक्नॉलजी?

रैमजेट टेक्नोलॉजी एक उन्नत एयर-ब्रीदिंग जेट इंजन प्रणाली है, जिसका उपयोग मुख्य रूप से सुपरसोनिक मिसाइलों और उच्च गति वाले विमानों में किया जाता है। इस इंजन में कंप्रेसर या टरबाइन जैसे घूमने वाले पुर्जे नहीं होते। रैमजेट अपने आगे की तेज गति से हवा को संपीड़ित करता है, इसी कारण इसे 'रैम' जेट कहा जाता है। रैमजेट इंजन तभी काम करता है जब वाहन पहले से ही बहुत तेज गति (लगभग मैक 2 या उससे अधिक) पर हो। जैसे ही वाहन आगे बढ़ता है, सामने से आने वाली हवा इनलेट में प्रवेश करती है और प्राकृतिक रूप से संपीड़ित हो जाती है। इस संपीड़ित हवा में ईंधन इंजेक्ट कर उसे जलाया जाता है। दहन से उत्पन्न अत्यधिक गर्म गैसें पीछे की ओर निकलती हैं, जिससे थ्रस्ट पैदा होता है और वाहन और तेज गति पकड़ लेता है।

सुपरसोनिक, हाइपरसोनिक मिसाइलों में लग रही यह तकनीक

रैमजेट तकनीक का सबसे बड़ा लाभ इसकी सरल संरचना और उच्च गति पर बेहतर दक्षता है। यह पारंपरिक जेट इंजन की तुलना में कम जटिल होता है और सुपरसोनिक रेंज में ज्यादा प्रभावी रहता है। हालांकि, कम गति या स्थिर अवस्था में यह काम नहीं कर सकता, इसलिए इसे बूस्टर इंजन की जरूरत पड़ती है। आज रैमजेट तकनीक का इस्तेमाल ब्रह्मोस जैसी सुपरसोनिक क्रूज मिसाइलों और भविष्य की हाइपरसोनिक प्रणालियों के विकास में किया जा रहा है, जिससे सैन्य क्षमताओं में बड़ा बदलाव आ रहा है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने एसएफडीआर प्रौद्योगिकी के सफल परीक्षण के लिए डीआरडीओ और उद्योग जगत की सराहना की। मंत्रालय ने एक बयान में कहा कि इस सफल प्रदर्शन ने भारत को उन चुनिंदा देशों की श्रेणी में शामिल कर दिया है जिनके पास यह प्रौद्योगिकी है, जो लंबी दूरी की हवा से हवा में मार करने वाली मिसाइलों को विकसित करने में सक्षम बनाती है, जिससे प्रतिद्वंद्वियों पर सामरिक बढ़त हासिल होती है।

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परीक्षण में सभी मानकों पर खरा उतरा SFDR

डीआरडीओ का कहना है कि परीक्षण के दौरान SFDR पूरी तरह से मानकों पर खरा उतरा और इसने सभी वांछित उद्देश्यों को पूरा किया। रैमजेट इंजन वाली मिसाइलें काफी शक्तिशाली और इनका प्रभाव बहुत ज्यादा होता है। ये मिसाइलें काफी दूरी पर स्थित लक्ष्य या ठिकाने को निशाना बना सकती हैं। इस तरह की मिसाइलें फाइटर प्लेन को वियोंड विजुअल रेंज (वीबीआर) मार करने में मदद करती हैं। पायलट बहुत दूर और सुरक्षित दूरी से ही दुश्मन के लड़ाकू विमान को अपने निशाने पर ले लेते हैं। रिपोर्टों में कहा गया है कि इस तकनीक का इस्तेमाल सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइलों के विकास में भी हो सकता है।

स्वदेशी मिसाइल प्रोग्राम में मील का एक बड़ा पत्थर

एसएफडीआर का सफल परीक्षण भारत के स्वदेशी मिसाइल प्रोग्राम में मील का एक बड़ा पत्थर है। डीआरडीओ की यह सफलता वर्षों का नतीजा है। डीआरडीओ ने SFDR तकनीक पर काम साल 2017 में शुरू किया। इसके बाद उसने 2018, 2019 और 2021 में इसका सफल परीक्षण भी किया। इसका निर्माण हैदराबाद स्थित डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट लेबोरेटरी (DRDL) द्वारा किया गया है, जिसमें DRDO की अन्य प्रयोगशालाओं जैसे रिसर्च सेंटर इमारत (RCI), हैदराबाद और हाई एनर्जी मटीरियल्स रिसर्च लेबोरेटरी (HEMRL) पुणे—का सहयोग रहा है। इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर स्ट्रैटेजिक स्टडीज (IISS) के अनुसार, रैमजेट इंजन से लैस मिसाइलें ठोस ईंधन से चलने वाली मिसाइलों की तुलना में अधिक मारक दूरी और औसतन अधिक गति प्रदान करती हैं।

drdo missile programme

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दुश्मनों पर IAF को मिलेगी बढ़त

इन मिसाइलों में ऑक्सीडाइजर ले जाने की आवश्यकता नहीं होती, इसलिए ये अपेक्षाकृत बड़ा वारहेड भी ले जा सकती हैं। TOI के अनुसार, SFDR तकनीक से लैस मिसाइलें 50 किलोमीटर से लेकर 340 किलोमीटर तक की दूरी पर अत्यधिक फुर्तीले लक्ष्यों को निष्क्रिय करने में सक्षम हैं। ये मिसाइलें मैक 2 से मैक 3.8 की गति से उड़ान भर सकती हैं और समुद्र तल से लेकर 20 किलोमीटर की ऊंचाई तक संचालन कर सकती हैं, साथ ही 10 किलोमीटर तक की वर्टिकल मैन्युवर क्षमता रखती हैं। इन रैमजेट-चालित मिसाइलों की गति, मारक दूरी और फुर्ती दुश्मन के विमानों के लिए बच निकलना बेहद मुश्किल बना देती है। इससे हवाई युद्ध में भारतीय लड़ाकू विमानों को महत्वपूर्ण बढ़त मिलेगी। यह तकनीक भविष्य की एयर-टू-एयर और एयर-डिफेंस हथियार प्रणालियों की ऑपरेशनल क्षमता को और विस्तार देती है। SFDR का सफल परीक्षण भारत की विश्वस्तरीय रक्षा तकनीक को विकसित और निर्मित करने की क्षमता को दर्शाता है। इससे भारत की विदेशी आपूर्तिकर्ताओं पर निर्भरता कम होगी और स्वदेशी रक्षा क्षमताएं और मजबूत होंगी।

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