Cauvery Water Dispute: दक्षिण भारत की जीवनदायिनी कही जाने वाली कावेरी नदी एक बार फिर दो पड़ोसी राज्यों, कर्नाटक और तमिलनाडु के बीच भारी तनाव का कारण बन गई है। साल 2026 में मानसून के दौरान कम बारिश होने के चलते जब कर्नाटक के जलाशयों में पानी का स्तर गिरा, तो उसने पानी छोड़ने से हाथ खड़े कर दिए। दूसरी तरफ, फसल बचाने की चिंता में तमिलनाडु सरकार ने सर्वोच्च अदालत का दरवाजा खटखटाया है। इस बीच कर्नाटक के मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार ने बंगलूरू स्थित अपने आधिकारिक आवास 'कृष्णा' में एक महत्वपूर्ण सर्वदलीय बैठक बुलाई, जिसमें पक्ष-विपक्ष दोनों ने राज्य की 'भूमि, जल और भाषा' की रक्षा के लिए एकसुर में आवाज उठाई।
आखिर यह विवाद कितना पुराना है? सुप्रीम कोर्ट का इसमें क्या रुख रहा है? मेकेदातु परियोजना पर पेंच क्यों फंसा है? आइए, इस पूरे मामले को आसान और विस्तार से समझते हैं।
कावेरी नदी और इसके पानी का गणित
कावेरी नदी केवल एक जलधारा नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की आजीविका का आधार है। यह नदी कर्नाटक के कोडागु (कुर्ग) जिले से निकलती है और लगभग 800 किलोमीटर का सफर तय करते हुए तमिलनाडु और पुडुचेरी के रास्ते बंगाल की खाड़ी में गिरती है। इसका कुल जलसंभरण क्षेत्र यानी बेसिन एरिया लगभग 81,155 वर्ग किलोमीटर है। इसमें से कर्नाटक में 34,273 वर्ग किमी और तमिलनाडु/पुडुचेरी में 44,016 वर्ग किमी क्षेत्र आता है। केरल में भी इसका कुछ हिस्सा (2,866 वर्ग किमी) पड़ता है।
कर्नाटक में इस पर कृष्णराज सागर (KRS), कबिनी, हरंगी और हेमावती जैसे बड़े बांध हैं। वहीं तमिलनाडु में मुख्य नदी पर ऐतिहासिक मेटूर (Mettur) बांध स्थित है।
अब पेंच ये है कि कर्नाटक नदी का उद्गम स्थल होने के नाते ऐतिहासिक अधिकार जताता है, जबकि तमिलनाडु का कहना है कि सदियों से उसके कावेरी डेल्टा क्षेत्र के किसान पूरी तरह सिंचाई के लिए इसी पानी पर निर्भर रहे हैं।
विवाद का इतिहास: 1892 से लेकर आज तक
कावेरी जल बंटवारे की यह जंग आज की नहीं, बल्कि 134 साल पुरानी एक लंबी और जटिल ऐतिहासिक यात्रा है। इसकी शुरुआत साल 1892 में हुई, जब तत्कालीन मद्रास प्रेसिडेंसी और मैसूर रियासत के बीच पहला आधिकारिक समझौता हुआ, जिसमें मैसूर द्वारा किसी भी नए प्रोजेक्ट के निर्माण से पहले मद्रास की सहमति लेना अनिवार्य किया गया था। इसके बाद 1924 में दोनों पक्षों के बीच 50 वर्षों के लिए एक नया समझौता हुआ, जिसके तहत मैसूर को कृष्णराज सागर बांध और मद्रास को मेटूर बांध बनाने की अनुमति मिली।
जैसे ही 1974 में यह 50-वर्षीय समझौता समाप्त हुआ, विवाद ने विकराल रूप ले लिया। कर्नाटक ने अपनी बढ़ती जरूरतों को पूरा करने के लिए नए बांधों का निर्माण शुरू कर दिया, जिसका तमिलनाडु ने पुरजोर विरोध किया। स्थिति को संभालते हुए केंद्र सरकार ने 1990-1991 में 'कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण' (CWDT) का गठन किया, जिसने कर्नाटक को हर साल तमिलनाडु के लिए पानी छोड़ने का पहला अंतरिम आदेश दिया। लगभग 16 वर्षों की लंबी सुनवाई के बाद 2007 में CWDT ने अपना अंतिम फैसला सुनाते हुए चारों बेसिन राज्यों (कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल और पुडुचेरी) के लिए जल आवंटन तय किया।
आगे चलकर 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए CWDT के आवंटन में थोड़ा संशोधन किया और आदेश को ईमानदारी से लागू कराने के लिए कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण (CWMA) तथा कावेरी जल नियामक समिति (CWRC) का गठन किया। हालांकि, 2026 में मानसून की कमी के कारण यह पुराना विवाद एक बार फिर उबल पड़ा है, जहां एक ओर तमिलनाडु अपने हक के पानी के लिए सुप्रीम कोर्ट का रुख कर रहा है, वहीं दूसरी ओर कर्नाटक अपनी जल सुरक्षा को देखते हुए सर्वदलीय बैठक के जरिए नई रणनीति तैयार कर रहा है।
सुप्रीम कोर्ट का रुख और कावेरी प्रबंधन प्राधिकरण
जब विवाद न्यायाधिकरण से नहीं सुलझा, तो मामला भारत की सबसे बड़ी अदालत पहुंचा। 16 फरवरी 2018 को सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला दिया। कोर्ट ने CWDT के 2007 के फैसले में थोड़ा संशोधन करते हुए कर्नाटक का हिस्सा बढ़ा दिया और तमिलनाडु के हिस्से को 192 TMC से घटाकर 177.25 TMC कर दिया। साथ ही अदालत ने आदेश दिया कि नियमों को लागू करने के लिए कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण (CWMA) और कावेरी जल नियामक समिति (CWRC) का गठन किया जाए। सुप्रीम कोर्ट ने बार-बार स्पष्ट किया है कि संकट के वर्षों में दोनों राज्यों को आपसी तालमेल और "जियो और जीने दो" के सिद्धांत पर पानी साझा करना चाहिए।
फिलहाल का विवाद
हालिया संकट ये है कि CWMA ने कर्नाटक को 15 दिनों तक प्रतिदिन 3,500 क्यूसेक पानी छोड़ने का निर्देश दिया था। तमिलनाडु (डीएमके सरकार) का आरोप है कि कर्नाटक ने इसका पूरी तरह पालन नहीं किया, जिससे उसके कावेरी डेल्टा में धान की फसलों की बुवाई और सिंचाई ठप हो गई है। इसी के खिलाफ तमिलनाडु सरकार सुप्रीम कोर्ट का रुख कर रही है।
क्या है मेकेदातु परियोजना और क्यों है इस पर घमासान?
कावेरी जल विवाद में हालिया तनाव की एक सबसे प्रमुख वजह मेकेदातु (Mekedatu) बांध परियोजना है, जिसका कन्नड़ भाषा में शाब्दिक अर्थ 'बकरी की छलांग' होता है। यह स्थान कर्नाटक के रामनगर जिले के कनकपुरा तालुक में कावेरी और अर्कावती नदियों के संगम पर स्थित एक गहरी घाटी है, जहां कर्नाटक सरकार लगभग 9,000 करोड़ रुपये की लागत से 67.16 TMC क्षमता वाला एक विशाल जलाशय और 400 मेगावाट का बिजली संयंत्र बनाना चाहती है।
इस बहुउद्देश्यीय परियोजना को लेकर दोनों राज्यों के बीच भारी घमासान मचा हुआ है। एक तरफ कर्नाटक का तर्क है कि इसका मुख्य उद्देश्य तेजी से बढ़ते बंगलूरू शहर और आसपास के क्षेत्रों को पेयजल आपूर्ति सुनिश्चित करना है और इसके निर्माण से मानसून के दौरान समुद्र में बह जाने वाले अतिरिक्त (Surplus) पानी को सहेजा जाएगा, जिससे तमिलनाडु के हिस्से का पानी बिल्कुल प्रभावित नहीं होगा।
इसके विपरीत, तमिलनाडु का कड़ा विरोध इस आशंका पर टिका है कि ऊपरी धारा में इतना विशाल बांध बनने से नदी का प्राकृतिक प्रवाह बाधित होगा, जिससे तमिलनाडु के कावेरी डेल्टा क्षेत्र में लाखों किसानों की फसलों और आजीविका पर संकट आ जाएगा। साथ ही तमिलनाडु इसे अंतरराज्यीय नदियों पर न्यायाधिकरण के आदेशों और निचली धारा वाले राज्यों के अधिकारों का सीधा उल्लंघन मानता है। तमिलनाडु विधानसभा ने सर्वसम्मति से इस बांध के खिलाफ प्रस्ताव पारित किया है, जबकि सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु की एक पुनर्विचार याचिका को खारिज करते हुए कहा कि जब तक संशोधित DPR और मंजूरी की स्थिति साफ न हो, तब तक चुनौती देना समय से पहले है।
ऑल पार्टी मीटिंग की तस्वीर (चित्र साभार: CMO Karnataka Via ANI)
कर्नाटक की सर्वदलीय बैठक में क्या हुआ?
तमिलनाडु की कानूनी तैयारियों और राज्य में बढ़ते पारे को देखते हुए कर्नाटक के मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार ने सर्वदलीय बैठक बुलाई। बैठक में पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैया, बसवराज बोम्मई, एच.डी. कुमारस्वामी, बी.एस. येदियुरप्पा समेत कांग्रेस, बीजेपी और जेडीएस के तमाम वरिष्ठ नेता मौजूद रहे।
बैठक के मुख्य निष्कर्ष:
एकजुटता का संदेश: पूर्व सीएम सिद्धारमैया ने कहा कि जब बात राज्य की 'भूमि, जल और भाषा' की आती है, तो कर्नाटक की परंपरा दलगत राजनीति से ऊपर उठकर एकजुट होने की रही है।
पानी की कमी की हकीकत: सरकार ने बताया कि राज्य में सामान्य से केवल 30-35% वर्षा हुई है, जिससे जलाशय सूखे की कगार पर हैं।
मेकेदातु ही स्थाई समाधान: सीएम शिवकुमार ने जोर देकर कहा कि मेकेदातु परियोजना ही इस समस्या का एकमात्र स्थाई समाधान है और राज्य सरकार कानून के दायरे में रहकर किसानों के हितों की सुरक्षा करेगी।
शांति की अपील: राज्य भर में तमिल फिल्मों के विरोध और कन्नड़ संगठनों के प्रदर्शन को देखते हुए सरकार ने संगठनों से बंद टालने और शांति बनाए रखने का आग्रह किया है।
आगे की क्या है राह
कावेरी जल विवाद सिर्फ दो सरकारों का राजनीतिक टकराव नहीं है, बल्कि यह कर्नाटक के पेयजल संकट और तमिलनाडु के लाखों किसानों की रोजी-रोटी के बीच का मानवीय संघर्ष है। जब-जब मानसून नाराज होता है, कावेरी का पानी फिर से उबलने लगता है। अब सबकी निगाहें सुप्रीम कोर्ट के अगले कदम और CWMA की आगामी बैठकों पर टिकी हैं कि वह इस संकट काल में दोनों राज्यों के बीच संतुलन कैसे कायम करता है।
