पिछले कुछ दशकों में दिल्ली, नोएडा, लखनऊ, पटना, रांची, चंडीगढ़, गुरुग्राम, मुंबई जैसे बड़े शहरों में आबादी तेजी से बढ़ी है। जिस तेजी से आबादी बढ़ी है, उसी तेजी से किराएदारों की संख्या भी बढ़ी है। छोटे शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों से आने वाले लोग इन शहरों में किराये पर मकान या कमरा लेकर जीवन यापन करते हैं। कई बार तो उन्हें बहुत ही खराब स्थिति में किराये के मकान में रहने को मजबूर होना पड़ता है। घर के अंदर पानी की सप्लाई की जगह एक सार्वजनिक नल से पानी भरना और एक ही टॉयलेट का इस्तेमाल करने को भी मजबूर होना पड़ता है। ऐसे में क्या कभी कोई किराएदार उस मकान पर कब्जा कर सकता है? चलिए इस प्रश्न का उत्तर जानने की कोशिश करते हैं।
कब्जे का डर और किराएदार की स्थिति
बड़े शहरों में मकान किराये पर लगाना आमदनी का एक बड़ा साधन है। इससे जहां मकान मालिक की कमाई हो जाती है, वहीं किराएदार को सिर छिपाने के लिए जगह मिल जाती है। कई मामलों में किराएदारों की दयनीय स्थिति के बारे में हम ऊपर बात कर चुके हैं। कहीं किराएदार मकान पर अपना कब्जा न कर ले या दावा न कर दे मकान मालिकों में यह डर हमेशा रहता है। यही कारण है कि बहुत से मकान मालिक अपने किराएदार को अपने एड्रेस पर राशन कार्ड, पेन कार्ड, आधार कार्ड जैसे जरूरी सरकारी कागजात बनाने की इजाजत नहीं देते हैं। अगर किराएदार ऐसा करता है तो उन्हें मकान खाली करने का फरमान सुना दिया जाता है। मकान मालिकों के इस डर की वजह से किराएदारों को शहर में काफी परेशानियों का सामना करना पड़ता है। लेकिन क्या मकान मालिकों का यह डर जायज है? चलिए जानते हैं।
किस कानून के तहत हो सकता है कब्जा
दरअसल भारत में संपत्ति कानून से जुड़ा एक ऐसा प्रावधान है, जो अक्सर ही किराएदारों और मकान मालिकों को चौंका देता है। इसी कानून की वजह से किराएदारों के द्वारा मकान पर कब्जे का डर भी मकान मालिकों में देखने को मिलता है। विशेष कानूनी परिस्थितियों में ही, बिना सेल डीड के भी कोई व्यक्ति (अक्सर किराएदार) किसी मकान पर स्वामित्व का दावा (कब्जा) कर सकता है। यह स्थिति 1963 के लिमिटेशन एक्ट के तहत उत्पन्न होती है, जो संपत्ति विवादों के लिए एक सख्त समयसीमा तय करता है। यदि संपत्ति का वास्तविक मालिक तय समयावधि तक अपने अधिकारों का दावा नहीं करता, तो लंबे समय से काबिज व्यक्ति को कानून मान्यता दे सकता है।
मकान मालिक कब्जा होने से कैसे रोकते हैं?
यानी इस नियम के तहत किराएदार आपके घर पर कब्जे का दावा कर सकता है, लेकिन इसके लिए ऊपर बताए गए कानून के अनुसार तय समयावधि में अगर आप अपना दावा करते हैं तो अपनी मकान को किराएदार के हाथों खोने से बचा सकते हैं। इस लीगल कॉन्सेप्ट को सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के साथ ही न्यायिक व्याख्या से आकार मिला है। यानी कई वर्षों तक किसी घर में रहना ही उस पर स्वामित्व के अधिकार का आधार नहीं बनता। कोर्ट को इस बात का पक्का सबूत चाहिए होता है कि कब्जा लगातार, दिखने वाला, एक्सक्लूसिव और मालिक की अनुमति के खिलाफ था। यह सिद्धांत इस विचार पर आधारित है कि कानून सजग मकान मालिक का पक्ष लेता है, न कि निष्क्रिय व्यक्ति का। यही कारण है कि दिल्ली जैसे शहरों में मकान मालिक सब कुछ ठीक होने के बावजूद हर कुछ साल बाद किराएदार से अपना घर खाली करवा देते हैं।
कुल मिलाकर बात ये है कि अगर कोई किराएदार लंबे समय तक आपकी प्रॉपर्टी में रहता है। वह उसे अपनी संपत्ति बताकर रहता है और आप इसके विरोध में कुछ नहीं करते हैं तो आप अपनी प्रॉपर्टी से हाथ धो सकते हैं।
rented Property
मकान मालिक के लिए अपील की समयावधि
लिमिटेशन एक्ट, 1963 की धारा 65 के मुताबिक, निजी अचल संपत्ति (मकान आदि) पर कब्जा वापस पाने के लिए उसके असली मालिक के पास 12 वर्ष की समयसीमा होती है। यदि इस समयसीमा में मालिक अदालत का दरवाजा नहीं खटखटाता, तो धारा 27 के तहत उसका स्वामित्व अधिकार समाप्त हो सकता है। यानी प्रॉपर्टी पर किराएदार का कब्जा हो सकता है। हालांकि, सरकारी जमीन के मामलों में यह अवधि 30 साल निर्धारित है, जो सार्वजनिक संपत्तियों के लिए अलग कानूनी व्यवस्था बनाता है।
किराएदार और मकान मालिक के बीच संपत्ति को लेकर एक एग्रीमेंट होता है, जिसके तहत तय किराया देकर मकान मालिक की मर्जी से किराएदार उसके मकान में रहता है। लेकिन कब्जे के मामले में व्यक्ति मकान मालिक की मंजूरी के बिना जोर-जबरदस्ती या उसकी जानकारी के बाहर उस संपत्ति में रहता है। विभिन्न अदालतों ने बार-बार साफ कहा है कि मकान मालिक की अनुमति से एक तय किराया देकर रहने वाले किराएदार का उस प्रॉपर्टी पर स्वत: कब्जा नहीं हो सकता। ऐसे किसी भी किराएदार के लिए यह साबित करना लगभग नामुमकिन है कि वह अब मालिक की मर्जी के खिलाफ उस प्रॉपर्टी में रह रहा है। इसलिए आपको चिंतित होने की जरूरत नहीं है। जरूरत है तो बस इस बात की कि आप अपने किराएदार के साथ एक एग्रीमेंट बनाएं, जिसकी शर्तों के अनुसार वह आपकी प्रॉपर्टी में रहेगा।
प्रॉपर्टी पर कब कब्जा कर सकता है किराएदार?
प्रॉपर्टी पर अपना कब्जा साबित करने के लिए किराएदार को यह साबित करना पड़ता है कि प्रॉपर्टी पर उसका कब्जा लगातार, सार्वजनिक रूप से दिखना वाला, बिना रुकावट और पूरी तरह से एकाधिकार वाला है। यही कारण है कि किराए के लिए बनाए जाने वाले एग्रीमेंट की एक तय सीमा होती है, उसके बाद किराएदार को घर खाली करना पड़ता है या एग्रीमेंट रिन्यू करवाना पड़ता है। इस बीच अगर मकान मालिक ने नोटिस दिया हो या कानूनी कार्रवाई की हो, तो किराएदार का दावा कमजोर पड़ जाता है। अपना कब्जा साबित करने के लिए किराएदार को बिजली-पानी के बिल, प्रॉपर्टी टैक्स की रिसिप्ट, फोटो और गवाहों के बयान जैसी कई महत्वपूर्ण चीजें पेश करनी होंगी।
लंबे समय तक रहने से नहीं मिलता मालिकाना हक
सुप्रीम कोर्ट और देश की विभिन्न हाईकोर्ट ने कई बार साफ कहा है कि सिर्फ लंबे समय तक किराये पर रहने से किसी व्यक्ति को उस प्रॉपर्टी पर मालिकाना हक नहीं मिल जाता है। 2020 से 2025 के बीच दिए गए कई फैसलों में इस बात को दोहराया गया है कि लंबे समय तक रहने की अनुमति मिलने से प्रॉपर्टी पर कब्जे यानी मालिकाना अधिकार नहीं मिल जाता है।
अपनी प्रॉपर्टी को बचाने के लिए क्या करें?
अगर आपको भी ये डर है कि आपका किराएदार प्रॉपर्टी पर कब्जा कर सकता है तो रजिस्टर्ड लीज एग्रीमेंट, समय-समय पर इंस्पेक्शन और अवैध कब्जे के खिलाफ नोटिस जैसे कदम उठा सकते हैं। 2021 का मॉडल टेनेंसी एक्ट भी मकान मालिकों को अतिरिक्त कानूनी सुरक्षा प्रदान करता है और बिना मालिक की मर्जी के ज्यादा समय तक प्रॉपर्टी में रहने वाले किरायेदारों के खिलाफ दंड का प्रावधान करता है।
