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उपचुनाव नतीजे 2026: BJP-विपक्ष के लिए क्या है सियासी संदेश? बांकीपुर सीट पर कैसे ध्वस्त हो गए जातीय समीकरण

ये तीन उपचुनाव नतीजे बीजेपी के लिए खतरे की एक घंटी तो हैं, लेकिन विपक्ष के लिए जश्न मनाने का मौका नहीं। असली सवाल यह है कि क्या बीजेपी 'ऊंची जाति' की नाराजगी को शांत कर पाएगी, बिना अपने ओबीसी-ईबीसी समीकरण को कमजोर किए और क्या विपक्ष बिखरे हुए नाराज वोटों को अपने पाले में ला पाएगा

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तीन में से दो सीटों पर भाजपा की हुई हार। तस्वीर-AI
Written by: Alok Rao
Updated Aug 4, 2026, 07:38 IST
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Bypoll results 2026 : बिहार के पटना की बांकीपुर सीट जहां 2008 से आज तक भारतीय जनता पार्टी कभी हारी नहीं। जहां पार्टी का वोट शेयर कभी 59 प्रतिशत से नीचे नहीं गया। तीन जुलाई को जब इस सीट के नतीजे आए, तो भाजपा का यही 'सबसे सुरक्षित किला' ढह गया लेकिन ये कहानी सिर्फ एक सीट की नहीं है। बिहार, मध्य प्रदेश और गुजरात तीन राज्यों में हुए उपचुनावों ने एक साथ मिलकर एक सवाल खड़ा कर दिया है- क्या बीजेपी के लिए जमीन खिसक रही है? और अगर हां, तो क्या विपक्ष उस जगह को भरने की स्थिति में भी है? आज हम इन तीनों नतीजों को बारीकी से समझेंगे।

बांकीपुर सीट से 4 बार जीत चुके हैं नितिन नवीन

भाजपा और उसके राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन के लिए सबसे बड़ा झटका पटना की बांकीपुर सीट से आया है। यह सीट 2008 में बनने के बाद से हर बार बीजेपी के खाते में गई है। बीजेपी नेता नितिन नवीन ने यहां से चार बार जीत दर्ज की थी। इस बार जन सुराज पार्टी के प्रशांत किशोर ने यह सीट 19,324 वोटों के अंतर से जीत ली। ध्यान रहे यह वही बिहार है, जहां महज नौ महीने पहले एनडीए ने 243 में से 202 सीटें जीतकर प्रचंड बहुमत हासिल किया था। और जन सुराज पार्टी उन विधानसभा चुनावों में एक भी सीट नहीं जीत पाई थी।

भाजपा का वोट शेयर गिरकर 34.4% पर आया

आंकड़ों पर गौर करें तो तस्वीर और साफ होती है। प्रशांत किशोर को करीब 49 प्रतिशत वोट मिले, जबकि बीजेपी का वोट शेयर, जो 2025 के विधानसभा चुनाव में 62 प्रतिशत से ऊपर था, इस बार गिरकर सिर्फ 34.4 प्रतिशत रह गया। यानी लगभग 28 प्रतिशत वोटों की सीधी गिरावट। बांकीपुर की सामाजिक बनावट पर नजर डालें तो यह बिहार की बाकी सीटों से अलग है। राजनीतिक दलों के अनुमानित आंकड़ों के अनुसार यहां करीब 14 प्रतिशत कायस्थ, 12 प्रतिशत मुस्लिम, 9 प्रतिशत चंद्रवंशी यानी ईबीसी, 9 प्रतिशत बनिया, 9 प्रतिशत अनुसूचित जाति, 8 प्रतिशत भूमिहार, 8 प्रतिशत ब्राह्मण, 7 प्रतिशत राजपूत, 5 प्रतिशत कुर्मी और 3 प्रतिशत कुशवाहा मतदाता हैं।

Prashant Kishor

Prashant Kishor

भाजपा की हार में दो वजहें बेहद अहम रहीं

अगर बनियों को अलग रखें, जो बिहार में ओबीसी माने जाते हैं, तो यह सीट करीब 37 प्रतिशत 'ऊंची जाति' बहुल है जो बिहार के औसत से काफी ज्यादा है। बिहार के एक अधिकारी ने इंडियन एक्सप्रेस को बताया कि स्थानीय स्तर पर दो वजहें अहम रहीं। पहली, बीजेपी उम्मीदवार आखिरी वक्त पर बदला गया और उसे विधायक बनने लायक चेहरा नहीं माना गया। दूसरी नीतीश कुमार के बाद सम्राट चौधरी को मुख्यमंत्री बनाए जाने से 'ऊंची जातियों' में पहले से ही असंतोष के संकेत मिल रहे थे। यहीं बीजेपी की असली दुविधा सामने आती है। नीतीश के बाद के बिहार में 'ऊंची जातियां' संकेत दे रही हैं कि वो विकल्प तलाशने को तैयार हैं- फिलहाल राजद की तरफ नहीं, लेकिन अगर उनकी मांगें पूरी नहीं हुईं तो स्थिति बदल भी सकती है। मुश्किल यह है कि 'ऊंची जातियों' को साधने की कोशिश में कहीं ओबीसी और ईबीसी वोट न खिसक जाएं क्योंकि नीतीश कुमार वो कड़ी थे जो इन तीनों वर्गों को आपस में जोड़े रखते थे। बीजेपी के लिए एक राहत की बात जरूर है वोट खिसका है, तो प्रशांत किशोर की तरफ, जो खुद एक ब्राह्मण हैं और जिनके पास अभी कोई बड़ा संगठनात्मक ढांचा नहीं है।

कमजोर पड़े पारंपरिक जातीय समीकरण

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि इन नतीजों का संदेश केवल भाजपा तक सीमित नहीं बल्कि विपक्ष, खासकर राजद के लिए भी महत्वपूर्ण है।

राजनीतिक विश्लेषक अरुण कुमार पांडे ने कहा कि बांकीपुर उपचुनाव में बिहार की पारंपरिक जातीय राजनीति के समीकरण कुछ हद तक कमजोर पड़ते दिखाई दिए। उन्होंने कहा कि भाजपा के पारंपरिक सवर्ण मतदाताओं का एक वर्ग पार्टी से दूरी बनाता नजर आया जबकि राजद का मुस्लिम यादव समीकरण भी पहले जैसा प्रभावी नहीं दिखा पाया। पांडे के अनुसार, पिछले कुछ समय से भाजपा के पुराने कार्यकर्ताओं में उपेक्षा की भावना रही है और इसका असर चुनावी अभियान पर भी दिखाई दिया। उन्होंने कहा कि आमतौर पर भाजपा कार्यकर्ता मतदान के दिन मतदाताओं को बूथ तक पहुंचाने में सक्रिय भूमिका निभाते हैं लेकिन इस उपचुनाव में वैसी सक्रियता नजर नहीं आई।

सुशासन, विकास के मुद्दे पर PK ने वोट मांगा

अब बड़ा सवाल, क्या यह सिर्फ एक सीट की स्थानीय कहानी है, या इसके पीछे कोई बड़ी राष्ट्रीय बेचैनी है? पिछले कुछ महीनों में तीन घटनाक्रम गौर करने लायक हैं। पहला, यूजीसी का जातीय भेदभाव-विरोधी नियमन, जिसे फिलहाल रोक दिया गया है, लेकिन जिसने 'ऊंची जातियों' में नाराजगी पैदा की। दूसरा, नीट परीक्षा में पेपर लीक के मामले, जिनका असर सबसे ज्यादा 'ऊंची जाति' के छात्रों पर माना जाता है और तीसरा हाल के जेन-जी विरोध प्रदर्शन, जिनमें बड़ी संख्या में हिंदू, और खासकर 'ऊंची जाति', ओबीसी और दलित युवा शामिल हुए। ये तीनों मिलकर उन जातीय समीकरणों को हिला सकते हैं, जिन्हें बीजेपी अब तक तय मानकर चल रही थी। प्रशांत किशोर ने अपनी जातीय पहचान को उभारने के बजाय सुशासन और विकास के मुद्दे को आगे रखा और यही रणनीति शायद दिल्ली, बिहार, महाराष्ट्र जैसे राज्यों में हुए जेन-जी विरोध प्रदर्शनों के माहौल में जाति की सीमाओं को पार कर गई। यह भी ध्यान देने वाली बात है कि बांकीपुर एक शहरी, मध्यम वर्ग बहुल सीट है यानी वो तबका जो सिर्फ जातीय पहचान से नहीं, बल्कि शासन और अवसरों की भाषा से भी प्रभावित होता है।

कांग्रेस की सीट थी दतिया

अब बात मध्य प्रदेश की दतिया सीट की। यहां कांग्रेस के घनश्याम सिंह ने बीजेपी के आशुतोष तिवारी को 6,016 वोटों से हराया। लेकिन यह झटका बांकीपुर जितना बड़ा नहीं माना जा सकता, क्योंकि दतिया कोई बीजेपी का गढ़ नहीं थी। 2023 में भी यह सीट कांग्रेस के पास ही थी। दिलचस्प बात यह है कि 1990 के बाद से बीजेपी ने यहां चार बार और कांग्रेस ने तीन बार जीत दर्ज की है। इस सीट से जुड़े कांग्रेस के पुराने नेता राजेंद्र भारती को इसी साल एक बैंक धोखाधड़ी मामले में तीन साल की सजा हुई, जिसके बाद उनकी विधायकी रद्द हो गई। मतगणना से कुछ घंटे पहले कांग्रेस ने उन्हें पार्टी से निलंबित भी कर दिया, क्योंकि उम्मीदवार घनश्याम सिंह ने उन पर बीजेपी के साथ मिलकर पार्टी को नुकसान पहुंचाने का आरोप लगाया था।

भाजपा के खाते में गई मंजलपुर सीट

तीसरी सीट गुजरात की मंजलपुर बीजेपी के लिए एकमात्र राहत की खबर लेकर आई। यहां बीजेपी के सत्येंद्रभाई पटेल ने कांग्रेस के भिखाभाई रबारी को 30,630 वोटों से हराया। यह बीजेपी का पुराना गढ़ है। 2022 में यहां पार्टी को 75.85 प्रतिशत वोट मिले थे, और 2008 में सीट बनने के बाद से बीजेपी कभी 65.5 प्रतिशत से कम वोट नहीं पाई। तो कुल मिलाकर तस्वीर क्या बनती है? तीन में से दो सीटें बीजेपी हारी। यह पार्टी के लिए निश्चित तौर पर एक चेतावनी है। लेकिन क्या यह विपक्ष की जीत है? आंकड़े कुछ और ही कहानी बताते हैं।

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आजाद समाज पार्टी को 22,527 वोट मिले

बांकीपुर में समर्थन बीजेपी से जरूर खिसका, लेकिन पारंपरिक प्रतिद्वंद्वी राजद की तरफ नहीं गया। वोटर सीधे प्रशांत किशोर की तरफ गए। राजद का वोट शेयर तो पिछले साल के विधानसभा चुनाव के करीब 30 प्रतिशत से घटकर इस बार महज 10.95 प्रतिशत रह गया। दतिया में भले कांग्रेस जीती हो, लेकिन यह सीट पहले से बीजेपी के पास नहीं थी। और यहां भी चंद्रशेखर आजाद की आजाद समाज पार्टी को 22,527 वोट मिले। यानी बीजेपी-विरोधी वोट अब भी बंटा हुआ है। साफ है कि बीजेपी से नाराज हर वोटर मुख्यधारा के विपक्ष को विकल्प के तौर पर स्वीकार नहीं कर रहा, बल्कि नई और छोटी ताकतें उन्हें ज्यादा आकर्षित कर रही हैं।

विपक्ष के लिए जश्न मनाने का मौका नहीं।

ये तीन उपचुनाव नतीजे बीजेपी के लिए खतरे की एक घंटी तो हैं, लेकिन विपक्ष के लिए जश्न मनाने का मौका नहीं। असली सवाल यह है कि क्या बीजेपी 'ऊंची जाति' की नाराजगी को शांत कर पाएगी, बिना अपने ओबीसी-ईबीसी समीकरण को कमजोर किए और क्या विपक्ष बिखरे हुए नाराज वोटों को अपने पाले में ला पाएगा। क्या यह सिर्फ स्थानीय कारणों का नतीजा है, या 2029 से पहले एक बड़े बदलाव की शुरुआत?

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