Heatwave in Europe: यूरोप इन दिनों प्रचंड गर्मी की मार झेल रहा है। चिलचिलाती धूप तापमान के रिकॉर्ड तोड़ रही है। पूरा महाद्वीप भीषण गर्मी का सामना कर रहा है। यूरोप के ज्यादातर इलाकों में तापमान 40 डिग्री सेल्सियस के आस-पास बना हुआ है। यूरोप जो कि इस तरह की गर्मी का आदी नहीं है, बेहाल हो गया है। अकेले फ्रांस में 1000 से अधिक लोगों की जान जा चुकी है। हीटवेव की वजग से 15 करोड़ से ज्यादा लोग प्रभावित हुए हैं। इस तपती गर्मी ने देशों पर बिजली उत्पादन, बुनियादी संरचना एवं स्वास्थ्य व्यवस्था पर दबाव बढ़ा दिया है। अब यूरोप में एयर कंडीशनिंग (AC) को लेकर नई बहस छिड़ गई है।
फ्रांस, स्पेन, इटली, ब्रिटेन गर्मी के रिकॉर्ड टूटे
फ्रांस की संसद में नेता एक-दूसरे पर हमलावर हैं। यूरोपीय यूनियन कह रही है कि 'हम इसमें नहीं पड़ेंगे', और आम लोग पंखे और गीले तौलिए से गुजारा कर रहे हैं। सवाल है कि आधुनिक सुख-सुविधाओं से लैस रहने वाला यूरोप आखिर AC से इतना दूर क्यों रहा? अब हालात इतने बिगड़े क्यों हैं, और इसका कनेक्शन भारत और पूरी दुनिया से कैसे जुड़ता है। जून 2026 में यूरोप ने अपने इतिहास की सबसे भीषण गर्मी की लहरों में से एक झेली। फ्रांस, स्पेन, इटली, ब्रिटेन हर जगह तापमान के रिकॉर्ड टूट गए। हालात इतने खराब हो गए कि पेरिस के शव-गृह (मुर्दाघर) भर गए, क्योंकि गर्मी से होने वाली मौतें बहुत तेजी से बढ़ीं। अनुमान है कि इस लहर में करीब तेरह सौ से ज्यादा लोगों की जान गई।
यूरोप के 20% घरों में है AC
अब यहां एक चौंकाने वाला आंकड़ा समझिए पूरे यूरोप में सिर्फ करीब 20 प्रतिशत घरों में ही एयर कंडीशनर लगा है। तुलना के लिए, अमेरिका, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे देशों में यह आंकड़ा 90 प्रतिशत से भी ऊपर है। यानी जिस महाद्वीप को हम तकनीकी रूप से सबसे आगे मानते हैं, वहां गर्मी से बचने का सबसे बुनियादी उपकरण ही ज्यादातर घरों में नहीं है। जैसे ही यह हीटवेव आई, AC की दुकानों पर भीड़ उमड़ पड़ी। जर्मनी से लेकर फ्रांस तक, पंखे और पोर्टेबल कूलर रातों-रात बिक गए। और यहीं से शुरू हुई वो बहस, जो अब राजनीति का रूप ले चुकी है।
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यूरोप में लोग अब तक AC के बिना कैसे रहते आए?
पहली वजह है पुरानी इमारतें। यूरोप के ज्यादातर घर और अपार्टमेंट सौ-डेढ़ सौ साल पुराने हैं। इनकी बनावट ऐसी नहीं है कि उनमें आसानी से AC लगाया जा सके। दीवारें मोटी हैं, खिड़कियां अलग तरह की हैं, और बिजली के पुराने सिस्टम भी AC का लोड नहीं झेल पाते। इस वजह से एक यूनिट लगवाने का खर्च ही करीब एक हजार यूरो यानी लगभग एक लाख रुपये तक पहुंच जाता है। दूसरी वजह है सरकारी नियम-कानून। ब्रिटेन और फ्रांस जैसे देशों में हेरिटेज इमारतों और शहरी नियोजन से जुड़े सख्त नियम हैं, जिनकी वजह से बाहर की दीवार पर AC यूनिट लगाना भी आसान नहीं होता। तीसरी और सबसे दिलचस्प वजह है सोच और संस्कृति।
AC को 'फिजूलखर्ची' मानता है यूरोप
यूरोप का मौसम पारंपरिक रूप से ठंडा माना जाता रहा है। दशकों तक वहां AC को एक 'अमेरिकी फिजूलखर्ची' जैसा देखा गया, ना कि जरूरत। लेकिन जलवायु परिवर्तन ने यह तस्वीर पूरी तरह बदल दी है। यूरोपियन यूनियन की अपनी जलवायु एजेंसी के मुताबिक, यूरोप धरती का सबसे तेजी से गर्म होता महाद्वीप है। यहां तापमान वैश्विक औसत से करीब दोगुनी रफ्तार से बढ़ रहा है। पिछले चार सालों में अकेले गर्मी से जुड़ी मौतों का आंकड़ा दो लाख के पार बताया गया है, और स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि इनमें से ज्यादातर मौतें रोकी जा सकती थीं।
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फ्रांस में AC बना चुनावी मुद्दा
फ्रांस में अगले साल चुनाव होने हैं, और AC अचानक एक बड़ा चुनावी मुद्दा बन गया है। एक तरफ हैं धुर दक्षिणपंथी नेता, जो कह रहे हैं कि हर घर में AC होना चाहिए, इसे बुनियादी जरूरत माना जाए, सरकार सब्सिडी दे। दूसरी तरफ हैं वामपंथी नेता, जिनका कहना है कि AC लगाना एक 'झूठा समाधान' है, जो असल समस्या यानी जलवायु परिवर्तन को और बढ़ा देगा। AC के विरोधी कहते हैं कि एयर कंडीशनर बहुत ज्यादा बिजली खाते हैं, उनमें इस्तेमाल होने वाली कूलिंग गैसें प्रदूषण फैलाती हैं, और सबसे बड़ी बात AC कमरे को तो ठंडा करता है, लेकिन गर्म हवा बाहर फेंकता है। घनी आबादी वाले शहरी इलाकों में इससे बाहर का तापमान और बढ़ जाता है। यानी आप अपना घर ठंडा करके पड़ोसी की गर्मी बढ़ा रहे हैं।
ईयू ने इस विवाद से खुद को अलग किया
इस पूरे विवाद के बीच यूरोपीय संघ ने एक दिलचस्प रुख अपनाया है। यूरोपीय आयोग की प्रवक्ता ने साफ कहा कि इस मसले पर हमारा कोई पक्ष-विपक्ष नहीं है। यह तय करना लोगों का अपना मामला है, ब्रसेल्स इसमें दखल नहीं देगा। यानी एक तरह से यूरोपीय यूनियन ने इस गरमागरम बहस से किनारा कर लिया, और इसे इमारतों के नवीनीकरण और ऊर्जा-दक्षता नीति का हिस्सा बताकर टाल दिया।
फ्रांस के 25 प्रतिशत घरों में है AC
वैज्ञानिकों ने एक 'मिटिगेशन-एडेप्टेशन ट्रेडऑफ' यानी एक समझौते की बात कही है। मतलब, AC लोगों को गर्मी से तो बचाता है, लेकिन इसके लिए जो अतिरिक्त बिजली खर्च होती है, वह कार्बन उत्सर्जन को बढ़ा देती है। अगर वही बिजली आज के पावर मिक्स यानी कोयला-गैस आधारित ढांचे से आती रहे, तो यह एक चक्र बन जाता है। गर्मी बढ़ी तो AC बढ़ा, AC बढ़ा तो बिजली की खपत बढ़ी, खपत बढ़ी तो उत्सर्जन बढ़ा, और उत्सर्जन बढ़ा तो गर्मी और बढ़ेगी। यही वजह है कि विशेषज्ञ कहते हैं कि असली समाधान सिर्फ AC लगाना नहीं, बल्कि इमारतों का बेहतर इंसुलेशन, हरित ऊर्जा से चलने वाले कूलिंग सिस्टम, और शहरी इलाकों में हरियाली बढ़ाना भी है। स्पेन में, जहां गर्मी ज्यादा पड़ती है, करीब आधे घरों में पहले से AC है — और फ्रांस में यह आंकड़ा सिर्फ पच्चीस प्रतिशत के आसपास है। यानी जरूरत और तैयारी में भी एक बड़ा अंतर है।
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1950 के बाद यह केवल दूसरी भीषण गर्मी
यूरोप में, साल का सबसे गर्म समय जुलाई के मध्य से लेकर आखिर तक होता है। लेकिन हालिया शोध बताते हैं कि अब भीषण गर्मी जून में ही पड़ने लगा है। वर्ष 1950 के बाद यह केवल दूसरी भीषण गर्मी है, जो यूरोप में गर्मियों के चरम मौसम से कई सप्ताह पहले शुरू हुई है। वैज्ञानिकों के अनुसार, जलवायु परिवर्तन के कारण भीषण गर्मी पहले की तुलना में अधिक समय तक पड़ रही है। एक अध्ययन में, जून 2025 में दक्षिण-पूर्वी इंग्लैंड में पड़ी भीषण गर्मी का विश्लेषण किया गया। इसमें पाया गया कि यदि मानव गतिविधियों से होने वाले ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन का प्रभाव न होता, तो ऐसी भीषण गर्मी लगभग 50 वर्षों में केवल एक बार आती। लेकिन मानव-जनित जलवायु परिवर्तन के कारण वैश्विक तापमान में हुई 1.3 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि को ध्यान में रखते हुए पाया गया कि ऐसी भीषण गर्मी की स्थिति अब 50 वर्ष में एक बार नहीं, बल्कि कम से कम हर पांच वर्ष में एक बार देखने को मिल रही है।
भीषण गर्मी की वजह क्या है?
स्थानीय स्तर पर 'हीटवेव’ की स्थिति तब उत्पन्न होती है, जब किसी क्षेत्र के ऊपर उच्च वायुदाब का मजबूत क्षेत्र लंबे समय तक बना रहता है। ये उच्च वायुदाब प्रणालियां 'वायुमंडलीय परत’ की तरह काम करती हैं, जो गर्म हवा को नीचे की सतह के पास रोके रखती हैं। साथ ही बादलों को हटाकर धूप को धरती तक पहुंचने देती हैं, जिससे तापमान और बढ़ जाता है। वृहद स्तर पर तेल, कोयला और गैस जैसे जीवाश्म ईंधनों के उपयोग से हो रहा जलवायु परिवर्तन भीषण गर्मी और उसकी अवधि, दोनों को प्रभावित कर रहा है। वायुमंडल में बढ़ती अतिरिक्त गर्मी बड़े पैमाने के मौसमीय पैटर्न को भी बदल रही है। इससे धीमी गति से आगे बढ़ने वाली उच्च वायुदाब प्रणालियां अधिक बनने लगी हैं, जिससे भीषण गर्मी का खतरा बढ़ जाता है। शोध से पता चलता है कि 1950 से 1999 के बीच यूरोप में भीषण गर्मी के केवल पांच दौर देखने को मिले थे।
