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असम में क्षेत्रीय दलों पर क्यों है BJP-कांग्रेस की नजर, कौन सी पार्टी आ सकती है किसके साथ, बिछ रही गठबंधन की बिसात

कांग्रेस की अगर बात करें तो असम में कांग्रेस रायजोर दल और असम जातीय परिषद (AJP) को अपने साथ लाना चाहती है। ये दोनों ही पार्टियां 2021 के चुनावों से पहले और सीएए प्रदर्शनों के बाद अस्तित्व में आईं। कांग्रेस के साथ माकपा, भाकपा, भाकपा माले और ऑल पार्टी हिल लीडर्स कॉन्फ्रेंस पहले से हैं।

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Photo : PTI
असम में इसी साल होंगे विधानसभा चुनाव।
Written by: Alok Rao
Updated Feb 20, 2026, 14:34 IST
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Assam Assembly Election 2026: पूर्वोत्तर के राज्य असम में इसी साल विधानसभा चुनाव होने हैं। चुनाव को देखते हुए राजनीतिक सरगर्मियां शुरू हो गई हैं। नेताओं के दौरे हो रहे हैं। कौन से चुनावी समीकरण फायदा पहुंचा सकते हैं, इस पर मंथन और गठबंधन बनाने का दौर भी चल रहा है। वैसे तो राज्य में मुख्य मुकाबला सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और कांग्रेस के बीच है लेकिन चुनाव में क्षेत्रीय एवं छोटे दलों की भूमिका को नजरंदाज नहीं किया जा सकता। बहुमत के आंकड़े से दूर रहने पर ये क्षेत्रीय दल ही सत्ता तक पहुंचाएंगे, भाजपा और कांग्रेस दोनों इस बात को जानती हैं। चुनाव में इन दलों की उपयोगिता एवं महत्व को देखते हुए दोनों राष्ट्रीय पार्टियां इन्हें अपने साथ लेने के लिए सियासी बिसात बिछा रही हैं। चुनाव आयोग जल्द ही इस राज्य के लिए चुनाव कार्यक्रम की घोषणा कर सकता है।

रायजोर दल, एजेपी को साथ लाना चाहती है कांग्रेस

राज्य में भाजपा की अगुवाई वाले एनडीए गठबंधन की सरकार और विपक्ष में कांग्रेस के नेतृत्व वाला गठबंधन है। सूत्रों का कहना है कि आगामी चुनाव को लेकर दोनों ही गठबंधनों में मोटे तौर पर सैद्धांतिक रूप से सहमति बन चुकी है लेकिन कुछ छोटी चीजों को अंतिम रूप दिया जाना बाकी है। कांग्रेस की अगर बात करें तो असम में कांग्रेस रायजोर दल और असम जातीय परिषद (AJP) को अपने साथ लाना चाहती है। ये दोनों ही पार्टियां 2021 के चुनावों से पहले और सीएए प्रदर्शनों के बाद अस्तित्व में आईं। कांग्रेस के साथ माकपा, भाकपा, भाकपा माले और ऑल पार्टी हिल लीडर्स कॉन्फ्रेंस पहले से हैं। साल 2021 के चुनाव में रायजोर दल और एजेपी ने तीसरे मोर्चे के रूप में चुनाव लड़ा और इसका नुकसान कांग्रेस को उठाना पड़ा।

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2021 में दोनों दलों ने पहुंचाया नुकसान

हालांकि, इस चुनाव में इस मोर्चे को कोई खास सफलता नहीं मिली। यह मोर्चा केवल एक सीट पर जीत दर्ज कर पाया। रायजोर दल के नेता अखिल गोगोई अपनी सीट निकालने में कामयाब रहे। रायजोर दल और एजेपी भले ही ज्यादा सीटें नहीं जीत पाए लेकिन इन्होंने कांग्रेस को अच्छा-खासा नुकसान कर दिया क्योंकि जिन 14 सीटों पर कांग्रेस की हार हुई, इन सीटों पर एजेपी अथवा रायजोर दल को जितने वोट मिले, वे जीत की मार्जिन से ज्यादा थे। इनमें से 11 सीटें अपर असम में थीं। रायजोर एवं एजेपी दोनों ने अहोम समुदाय से अपने उम्मीदवार उतारे थे। इसकी वजह से जातीय असमी वोटर कांग्रेस से दूर रहा। चुनाव नतीजों के बाद कांग्रेस ने अपनी हार की समीक्षा की और पाया कि राज्य में सत्ता तक पहुंचने के लिए इन दोनों क्षेत्रीय दलों का साथ जरूरी है।

भूपेन बोराह के इस्तीफे से कांग्रेस को लगा झटका

2026 के चुनाव में इन दोनों दलों के साथ गठबंधन करने के कांग्रेस के प्रस्ताव को पार्टी के वरिष्ठ नेता भूपेन बोराह आगे बढ़ा रहे थे लेकिन उनके इस्तीफे ने चुनाव से पहले कांग्रेस को एक बड़ा धक्का लगा है। बोराह 2021 के चुनाव के बाद से ही इन दोनों दलों के साथ गठबंधन करने पर जोर देते आ रहे थे। गठबंधन पर वही कांग्रेस की तरफ से बातचीत कर रहे थे। इसमें उन्हें आंशिक सफलता भी मिली थी। अब चूंकि कांग्रेस अपने वोट बैंक में बिखराव रोकना चाहती है और क्षेत्रीय दल राज्य में अपना फुटप्रिंट बढ़ाना चाहते हैं, ऐसे में गठबंधन क्या रूप लेगा, यह देखना दिलचस्प होगा। असम कांग्रेस के अध्यक्ष गौरव गोगोई ने कहा है कि उनकी पार्टी का इरादा विधानसभा की 126 सीटों में से 100 पर लड़ने की है।

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अपनी पार्टी के लिए 15 सीटें चाहते हैं अखिल गोगोई

वहीं, अखिल गोगोई 15 सीटों पर चुनाव लड़ने की दावा कर रहे हैं। यदि ऐसा होता है तो कांग्रेस के साथ गठबंधन करने की इच्छा रखने वाले अन्य दलों के खाते में बहुत कम सीटें जाएंगी। एजेपी के प्रवक्ता जियाउर रहमान का कहना है कि उनकी पार्टी करीब 40 सीटों पर चुनाव लड़ना चाहती है। इसके पीछे उनका तर्क है कि राज्य की पार्टी का दर्जा हासिल करने के लिए उन्हें छह प्रतिशत वोट हासिल करने होंगे। हालांकि, रहमान ने यह भी कहा कि गठबंधन के व्यापक हित को देखते हुए वह कम सीटों पर भी मान सकते हैं। उन्होंने कहा कि हमने पहले ही अपने सीटों की संख्या घटाकर 20 कर दी है। भाजपा को सत्ता से बाहर करने के लिए हम सीटों की संख्या और कम कर सकते हैं।

सीटों पर एजीपी और भाजपा के बीच हो सकती है खींचतान

भाजपा की अगर बात करें तो गठबंधन के लिहाज से इस बार का चुनाव उसके लिए भी आसान नहीं रहने वाला है। राज्य में असम गण परिषद (एजीपी) भाजपा का पुराना साथी है लेकिन हाल के चुनावों में एजीपी का वोट बैंक सिकुड़ा है जबकि भाजपा का बढ़ा है। सीट बंटवारे को लेकर दोनों दलों में अभी कोई समझौता नहीं हुआ है। साल 2016 के विधानसभा चुनाव में एजीपी ने 24 सीटों पर चुनाव लड़ा और 14 पर उसे जीत मिली। इसके बाद 2021 के चुनाव में भाजपा ने 93 सीटों, एजीपी ने 25 और यूनाइटेड पीपुल्स पार्टी लिबरल (यूपीपीएल) ने आठ साटों पर चुनाव लड़ा। इस चुनाव में एजीपी को आठ सीटों पर जीत मिली।

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बेचैनी बढ़ाने वाला है गठबंधन पर हिमंता का बयान

मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा का गठबंधन को लेकर दिया गया हालिया बयान भी सहयोगी दलों की बेचैनी बढ़ाने वाला है। सरमा ने कहा, 'एजीपी एक स्वतंत्र पार्टी है। वह जितनी सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारना चाहती है, वह उतार सकती है लेकिन भाजपा को कहां पर उपना प्रत्याशी उतारना है, इसका फैसला वह खुद करेगी।' सरमा ने डेरगांव सीट से भी अपना उम्मीदवार उतारने की घोषणा की। अभी इस सीट से एजीपी के भभेंद्र नाथ भराली विधायक हैं। सीएम ने कहा कि इस सीट से एजीपी यदि उम्मीदवार उतारना चाहता है तो वह 'दोस्ताना मुकाबले' के लिए तैयार हैं।

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