9/11 Rescue Dogs: अमेरिकी इतिहास में 9/11 यानि कि 11 सितंबर 2001 का दिन, एक काले अध्याय के रूप में दर्ज है। अमेरिका में इससे पहले ऐसा घातक हमला नहीं हुआ था। 11 सितंबर की सुबह-सुबह चार प्लेनों को अगवा कर आतंकियों ने ऐसा कोहराम मचाया कि 3 हजार लोग मारे गए। आतंकवादी संगठन अल-कायदा द्वारा किए गए इस घातक हमले की छाप आज भी अमेरिका में मौजूद है। सबसे घातक हमला न्यूयॉर्क के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हुआ था। वर्ल्ड ट्रेड सेंटर की ऊंची इमारतें मलबे में बदल चुकी थीं। चारों तरफ धूल, धुआं, आग, चीख-पुकार और तबाही थी। हजारों बचावकर्मी मलबे में जिंदगी तलाशने के लिए वहां पहुंच रहे थे। लेकिन आग, धुएं और धूल में उन्हें बचाव कार्य चलाने में काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ा रहा था, तभी एंट्री हुई थी- सर्च एंड रेस्क्यू डॉग्स की, जिन्हें ऐसा कमाल किया कि आज उन्हें 9/11 के चार पैरों वाले हीरो (Four-Legged 9/11 Heroes) के रूप में जाना जाता है।
न्यूयॉर्क के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर जब बचावदल के साथ ये डॉग्स पहुंचे तो भले ही इनके पास इंसानी भाषा नहीं थी, सुरक्षा कवच नहीं था, लेकिन उनकी तेज सूंघने की क्षमता, ट्रेनिंग और अपने इंसानी साथी पर भरोसा था। अमेरिकी न्यूज वेबसाइट ABC News के अनुसार करीब 300 कुत्ते ग्राउंड जीरो पर बचाव अभियान में शामिल हुए थे। जो बिना रूके, बिना थके, लगातार काम करते रहे। इनका कुत्तों में से किसी का काम जिंदा लोगों को ढूंढना था, किसी को इंसानी अवशेषों की तलाश करनी थी और कुछ कुत्ते ऐसे भी थे, जिन्होंने बिना किसी खास ट्रेनिंग के वहां मौजूद थके और टूटे हुए लोगों को भावनात्मक सहारा दिया।
मलबे में जिंदगी की आखिरी उम्मीद
अमेरिकी ने कभी इन कुत्तों को खास तौर पर आपदाओं में लोगों की तलाश के लिए प्रशिक्षित किया गया था। उनकी सूंघने की क्षमता इतनी तेज होती है कि वे मलबे के नीचे फंसे इंसानों की गंध तक पहुंच सकते हैं। हमले के करीब 27 घंटे बाद मलबे से जिस आखिरी जीवित व्यक्ति को बचाया गया था, उसे भी इन्हीं कुत्तों ने खोजा था। हालांकि इस खोज के बाद स्थिति बदलने लगी। घंटे बीतते गए। फिर दिन। बचावदल को धीरे-धीरे समझ आने लगा कि मलबे में जिंदा लोगों के मिलने की संभावना बहुत कम रह गई है। जो मिशन जिंदगी बचाने के लिए शुरू हुआ था, वह अब मृतकों के अवशेष खोजने का मिशन बनता जा रहा था। यह बदलाव इन कुत्तों के लिए काफी कठिन था। कारण था कि वो अभी तक वास्तिव रूप में इतने लंबे अभियान में शामिल नहीं हुए थे। वे जिंदा इंसान की गंध खोजने के लिए प्रशिक्षित थे। लेकिन अब उन्हें बार-बार ऐसी गंध मिल रही थी, जो जिंदगी की ओर नहीं, मौत की ओर इशारा कर रही थी।
9/11 हमले के सर्वाइवर (फोटो- Library of Congress's Prints and Photographs division)
जब टूट कर थक जाते कुत्ते
बाहर से देखने पर शायद ऐसा लगता है कि एक प्रशिक्षित कुत्ते बस अपने प्रशिक्षक का आदेश सुनते हैं और काम करते रहते हैं। लेकिन बाद में दिखा कि इन बेजुबानों पर भी उस हमले का असर हो रहा था। कुत्ते घंटों तक टूटे कंक्रीट और लोहे के बीच चढ़ते-उतरते थे। कई बार वे 12 घंटे तक लगातार काम करते। आसपास अभी भी आग सुलग रही थी और हवा में धूल और धुआं था। धीरे-धीरे कुछ सर्च डॉग्स का उत्साह कम होने लगा। उनके हैंडलर इसे समझ गए थे। अगर कुत्ते को लगातार ऐसा महसूस हो कि वह कुछ नहीं खोज पा रहा, तो उसकी काम करने की इच्छा भी कम हो सकती है।
नकली खोज से बदला माहौल
इसलिए हैंडलर कभी-कभी मलबे पर एक "मॉक फाइंड" यानी नकली खोज करवाते थे। कुत्ते को ऐसा महसूस कराया जाता था कि उसने किसी को ढूंढ लिया है। वह छोटा-सा खेल असल में बहुत बड़ी चीज था। कुत्ते के लिए वह सफलता थी। उसके लिए इसका मतलब था-मैं अपना काम कर रहा हूं। और फिर वह दोबारा मलबे में उतर जाता था।
बचाव कार्य में लगा कुत्ता आराम करते हुए (फोटो- FEMA Photo by Andrea Booher)
रॉबर्ट श्नेल और एटलस की कहानी
ABC News के अनुसार न्यूयॉर्क पुलिस विभाग की K-9 यूनिट के अधिकारी रॉबर्ट श्नेल 9/11 के दिन अपने सर्च डॉग एटलस के साथ घटनास्थल पर थे। उन्होंने पहला विमान नॉर्थ टावर से टकराते देखा। सिर्फ 17 मिनट बाद दूसरा विमान साउथ टावर से टकरा गया। इसके कुछ ही देर बाद साउथ टावर ढह गया। श्नेल और एटलस को अपनी जान बचाने के लिए छिपना पड़ा। लेकिन वे वहां से चले नहीं गए। अगले करीब आठ महीनों तक श्नेल और एटलस ग्राउंड जीरो पर काम करते रहे। दिन-दर-दिन, 12 घंटे की शिफ्ट में। 30 मई 2002 को जब साइट को बंद किया गया और कहा गया कि रिकवरी का काम खत्म हो चुका है, तब श्नेल के लिए वह बेहद भावुक दिन था। क्योंकि इतने लंबे समय तक वहां रहने के बाद उस जगह को छोड़ना सिर्फ एक ड्यूटी खत्म होना नहीं था। यह उनके जीवन के एक ऐसे अध्याय का अंत था, जिसे वे कभी भूल नहीं सकते थे।
उम्मीद की आखिरी निशानी...
9/11 की तस्वीरों में हमें अक्सर फायरफाइटर, पुलिस अधिकारी और बचावकर्मी दिखाई देते हैं। लेकिन उन तस्वीरों के पीछे सैकड़ों ऐसे चार पैरों वाले साथी भी थे, जिन्होंने उसी मलबे पर अपने इंसानी साथियों के साथ कदम से कदम मिलाकर काम किया। उन्होंने जिंदा लोगों की तलाश की। उन्होंने मृतकों को खोजने में मदद की। उन्होंने थके हुए बचावकर्मियों को कुछ पल का सुकून दिया। और सबसे बढ़कर, उन्होंने उस जगह पर उम्मीद की एक छोटी-सी लौ जलाए रखी, जहां चारों तरफ सिर्फ तबाही दिखाई दे रही थी। इसीलिए 9/11 के इतिहास में इन कुत्तों का नाम सिर्फ एक खोजी दस्ते के सदस्य के रूप में नहीं लिया जाना चाहिए। वे उस त्रासदी के गवाह थे। वे बचावकर्मियों के साथी थे। और कई लोगों के लिए, वे उस मलबे के बीच उम्मीद की आखिरी निशानी थे।
