Bihar Assembly Election 2025: 'सिंहासन खाली करो कि जनता आती है', ये नारा तो आपको याद ही होगा। जेपी आंदोलन के दौरान यह नारा देश में हर तरफ गूंजता था। यही नारा और जेपी आंदोलन था, जिसके कारण प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल की घोषणा की। बात बिहार विधानसभा चुनाव की हो रही है, ऐसे में आप भी सोच रहे होंगे कि ये जेपी आंदोलन और देश में आपातकाल की बात बीच में कहां से आ गई। असल में इस नारे, जेपी आंदोलन और देश में आपातकाल की जड़ में बिहार ही था। बिहार चुनाव पर हमारी 'मुख्यमंत्री' स्पेशल सीरीज में आज बात हो रही है, बिहार के 13वें और अब तक के इकलौते मुस्लिम मुख्यमंत्री अब्दुल गफूर के बारे में। अब्दुल गफूर के ही एक फैसले के कारण जेपी आंदोलन को हवा मिली और आगे चलकर देश में आपातकाल तक लग गया। इस बारे में भी आगे जानेंगे, चलिए समझते हैं अब्दुल गफूर के बारे में, जो 1 साल 283 दिन तक बिहार के मुख्यमंत्री रहे।
बिहार के 13वें मुख्यमंत्री अब्दुल गफूर
कौन थे बिहार के मुख्यमंत्री अब्दुल गफूर?
बिहार के 13वें मुख्यमंत्री रहे अब्दुल गफूर का जन्म 18 मार्च 1918 को मौजूदा बिहार में गोपालगंज जिले के सरेया अख्तियार गांव में हुआ था। उनके पिता शेख वशीर अली एक छोटे किसान थे और मां गृहणी थी। उनकी शुरुआती पढ़ाई गोपालगंज में ही हुई और बाद में वह पटना आ गए। पटना से 10वीं करने के बाद परिवार ने उन्हें 1935 में आगे की पढ़ाई के लिए अलीगढ़ भेज दिया। यहां अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (AMU) से उन्होंने एमए और कानून की पढ़ाई की।
नेताजी सुभाष चंद्र बोस के साथ फॉरवर्ड ब्लॉक में शामिल हुए गफूर
AMU में रहते हुए ही गफूर देश की आजादी की लड़ाई में कूद पड़े। इस दौरान वह कांग्रेस पार्टी में भी शामिल हो गए। वह महात्मा गांधी के विचारों को मानते जरूर थे, लेकिन उन्होंने सुभाष चंद्र बोस की राह चुनी। साल 1939 में जब नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने कांग्रेस छोड़कर फॉरवर्ड ब्लॉक बनाया तो गफूर भी उसमें शामिल हो गए। उन्हें बिहार में फॉरवर्ड ब्लॉक का स्टेट रिप्रेजेंटेटिव बनाया गया। वह मानते थे कि आजादी के लिए गांधी जी की बजाय नेताजी की सोच और तरीका ज्यादा असरदार है।
जिन्ना ने की पाकिस्तान की मांग तो गफूर ने किया विरोध
साल 1941 में नेताजी सुभाष चंद्र बोस जर्मनी चले गए। इसके बाद फॉरवर्ड ब्लॉक के ज्यादातर नेता कांग्रेस में शामिल हो गए और अब्दुल गफूर ने भी ऐसा ही किया। 1942 में उन्होंने भारत छोड़ो आंदोलन में भाग लिया। वह बिहार कांग्रेस के युवा गुट में शामिल हो गए, जिन्हें यंग टर्क्स ऑफ बिहार कहा जाता था। इसमें बिंदेश्वरी दुबे, भागवत झा आजाद, चंद्रशेखर, सत्येंद्र नारायण सिन्हा, केदार पांडे और सीताराम केसरी जैसे नेता शामिल थे। भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान अंग्रेजों के खिलाफ भाषण देने पर उन्हें गिरफ्तार किया गया और उन्होंने ढाई साल जेल में बिताए। जेल में वह मौलाना आजाद, रफी अहमद किदवई जैसे बड़े नेताओं के करीब आ गए। इधर मुस्लिम लीग के नेता मोहम्मद अली जिन्ना ने मुसलमानों के लिए एक अलग देश पाकिस्तान की मांग करनी शुरू कर दी। जिन्ना ने मुसलमानों को इकट्ठा करना शुरू किया, लेकिन गफूर जिन्ना की इस मांग के सख्त खिलाफ थे। उन्होंने जिन्ना की मांग का भरपूर विरोध किया। हलांकि, उनका विरोध किसी काम नहीं आया, 1947 में देश का बंटवारा हुआ। इस दौरान गफूर को पूर्वी पाकिस्तान जाने की सलाह दी गई, लेकिन उन्होंने भारत में रहना ही बेहतर समझा।
कांग्रेस के दो फाड़ हुए तो गफूर ने इंदिरा गांधी का साथ चुना
अब्दुल गफूर ने 1952 के पहले बिहार विधानसभा चुनाव में भाग लिया और गोपालगंज की बरौली सीट से कांग्रेस के टिकट पर जीते। 1957 के दूसरे विधानसभा चुनाव में भी वह बरौली सीट से जीते और श्रीबाबू की सरकार में मंत्री बने। 1962 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने बरौली की जगह गोपालगंज से चुनाव लड़ा और जीतने के बाद फिर से मंत्री बने। वह कांग्रेस संगठन में भी मजबूत होते गए और कांग्रेस का बड़ा अल्पसंख्यक चेहरा बनकर भरे। 1967 के चुनाव में भी कांग्रेस ने उन्हें टिकट दिया, लेकिन इस बार उन्हें गोपालगंज सीट पर हार का सामना करना पड़ा। 1968 में विनोदानंद झा ने 17 कांग्रेस विधायकों को लेकर नई पार्टी लोकतांत्रिक कांग्रेस बनाई तो गफूर नई पार्टी में शामिल होकर महासचिव बन गए। 1969 वह साल था, जब कांग्रेस में फूट पड़ गई। इंदिरा गांधी ने युवा नेताओं के साथ कांग्रेस (R) बनाई तो लोकतांत्रिक कांग्रेस ने इंदिरा का साथ दिया। गफूर भी इंदिरा गांधी के साथ आ गए। इसके बाद उन्हें विधान परिषद का सदस्य यानी MLC बनाया गया और मंत्री पद भी मिल गया।
मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंच गए गफूर
1972 के छठे बिहार विधानसभा चुनाव में कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी के रूप में सामने आई। पार्टी आलाकमान ने कद्दावर ब्राह्मण नेता केदार पांडेय को मुख्यमंत्री पद की जिम्मेदारी सौंप दी। अब्दुल गफूर को स्पीकर बनाया गया। लेकिन धीरे-धीरे केदार पांडे का विरोध शुरू हो गया और जून 1973 आते-आते यह विरोध बढ़ने लगा। इस बीच वरिष्ठ कांग्रेस नेता दीप नारायण और ललित नारायण मिश्र ने खेमेबंदी भी शुरू कर दी। 24 जून पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री सिद्धार्थ राय ने पटना कर कांग्रेस विधायक दल की बैठक बुलाई, जिसमें केदार पांडे के खिलाफ दो-तिहाई वोट पड़ गए और उन्हें इस्तीफा देना पड़ा। अब कांग्रेस को एक बार फिर नए मुख्यमंत्री का नाम तय करना था। कांग्रेस अध्यक्ष शंकर दयाल शर्मा ने दिल्ली में बैठक की, जिसमें केदार पांडे और ललित नारायण मिश्र भी शामिल रहे। विधानसभा स्पीकर व अल्पसंख्यक नेता अब्दुल गफूर के नाम को आगे बढ़ाया गया और दोनों धड़ों ने गफूर के नाम पर हामी भर दी। और इस तरह से प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने अब्दुल गफूर को बिहार का नया मुख्यमंत्री बनाने का फैसला किया। 2 जुलाई 1973 को गफूर ने बिहार के 13वें मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ ली। इसी के साथ गफूर बिहार के पहले मुस्लिम CM बन गए।
हाथ में लबनी, मुंह में पान
गफूर बिहार के 13वें मुख्यमंत्री बन चुके थे। पटना में 5 केजी एवेन्यू उनका सरकारी आवास बना। जिस दौरान वह मुख्यमंत्री थे, तब हर शाम एक सफेद रंग की फिएट कार उनके सरकारी आवास से निकलती थी, जिसे स्वयं मुख्यमंत्री चला रहे होते थे। इस दौरान उनके साथ सिक्योरिटी भी नहीं होती थी। कार सीधे जाकर बेली रोड पर मौजूद एक पान की दुकान पर रुकती थी। मुख्यमंत्री यहां रुककर एक बीड़ा मुंह में दबा लेते थे। अक्सर उनकी गाड़ी थोड़ा आगे भी जाती और मुख्यमंत्री गफूर ताड़ी पीकर लौटते थे। तब बिहार में सीएम गफूर का यह कारनामा चर्चा का विषय बन गया। लोग अक्सर कहने लगे थे - 'हाथ में लबनी, मुंह में पान। गफूर चचा की यही पहचान।' दरअसल मिट्टी की हांडी जैसे एक बर्तन को लबनी कहा जाता है, जिसमें ताड़ी जमा की जाती है।
छात्र आंदोलन में घिरे गफूर
1974 में छात्रों ने हॉस्टल की समस्याओं, मेस के बिल और यूनिवर्सिटी-कॉलेजों में भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों पर आंदोलन शुरू कर दिया। समाजवादी नेता जय प्रकाश नारायण भी इस छात्र आंदोलन से जुड़ गए थे। 18 मार्च 1974 को बिहार छात्र संघर्ष समिति ने विधानमंडल घेराव का ऐलान कर दिया। दरअसल 18 मार्च को इसलिए चुना गया, क्योंकि इसी दिन विधानमंडल का सत्र शुरू होने वाला था और राज्यपाल आरडी भंडारे का अभिभाषण होना था। गांधी मैदान में समूचे बिहार से छात्र पहले ही जुटने लगे थे। शहर में कर्फ्यू लगा दिया गया। हजारों छात्र सड़कों पर उतर आए, जिसमें मौजूदा मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, लालू प्रसाद यादव, सुशील मोदी, रामविलास पासवान और शिवानंद तिवारी जैसे कई छात्र नेता शामिल थे। सीएम गफूर किसी भी कीमत पर राज्यपाल का अभिभाषण करवाना चाहते थे। लेकिन छात्रों ने राज्यपाल भंडारे के काफिले को विधान मंडल के रास्ते में घेर लिया।
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छात्रों पर लाठीचार्ज और 8 की मौत
छात्र आंदोलन और राज्यपाल को घेरने की खबर दिल्ली में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी तक भी पहुंच गई। इंदिरा गांधी ने जब गफूर से फोन कर पूछा, तो उन्होंने जवाब दिया, ‘कुछ नहीं मैडम। कदमकुआं के कायस्थों का आंदोलन है।’ दरअसल उनका तंज जेपी की तरफ था, जो कदमकुआं में रहते थे और उस इलाके को कायस्थों का इलाका कहा जाता था। उन्होंने प्रधानमंत्री को बस ठीक कर लेने का भरोसा भी दिया। सीएम गफूर ने प्रदर्शनकारी छात्रों से सख्ती से निपटने का फैसला किया। पुलिस के लाठीचार्ज में 8 लोगों की मौत हो गई। पटना में लालू प्रसाद यादव के मारे जाने की भी अफवाह फैल गई। बाद में लालू यादव ने एक इंटरव्यू में बताया कि वह अंडरग्राउंड हो गए थे। हालांकि, कुछ समय बाद लालू यादव के साथ ही दर्जनों छात्रों व नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया। फिर धीरे-धीरे यह छात्र आंदोलन जेपी आंदोलन में बदल गया। अब आंदोलन इंदिरा गांधी को हटाने की मांग की तरफ बढ़ चला। उस समय नारे लगने लगे - सिंहासन खाली करो कि जनता आती है। आंदोलन लगातार बड़ा होता चला गया और जल्द ही इंदिरा गांधी को देश में आपातकाल की घोषणा करनी पड़ी।
सुन ले ए दिल्ली की रानी, नहीं चलेगी तेरी मनमानी
मुख्यमंत्री गफूर के खिलाफ आंदोलन लगातार बड़ा होता गया। गफूर का विरोधी खेमा सारी खबरें दिल्ली तक पहुंचाता रहा। लेकिन अभी गफूर की कुर्सी बची हुई थी। फिर 4 नवंबर 1974 को पटना के कदमकुआं में एक रैली निकली। छात्रों की भीड़ के बीच जेपी एक जीप पर थे। उन्होंने सिगरेट की डिब्बी के पेपर पर नारा लिखकर छात्रों को दिया। तब नारा लगा - 'सुन ले ए दिल्ली की रानी, नहीं चलेगी तेरी मनमानी।' इंदिरा गांधी के लिए नारे लगाते हुए रैली गांधी मैदान पहुंची तो पुलिस ने आंसू गैस के गोले दाग दिए और लाठीचार्ज किया। जेपी की रैली के जवाब में सीएम गफूर ने भी 16 नवंबर को गांधी मैदान में रैली का ऐलान किया और कहा कि पीएम इंदिरा गांधी भी इसमें आएंगी। लेकिन न प्रधानमंत्री आईं और न ही भीड़ जुट पायी। कुछ कांग्रेस नेता और सरकारी अमला ही वहां दिखा। मंच से विवादित भाषण जरूर हुए, जिसे अखबारों में प्रमुखता से छापा। गफूर को पद से हटाने के लिए स्क्रिप्ट अब तैयार हो चुकी थी। इंदिरा गांधी न मन बना लिया और संजय गांधी व उनके खास रहे रेलमंत्री ललित नारायण मिश्र ने इस स्क्रिप्ट पर मुहर लगा दी। 2 जनवरी 1975 को समस्तीपुर जंक्शन पर एक कार्यक्रम के दौरान बम धमाका हुआ, जिसमें ललित नारायण मिश्र और उनके भाई जगन्नाथ मिश्र गंभीर रूप से घायल हो गए। अगले दिन ललित नारायण मिश्र की मौत भी हो गई। साजिश के आरोप भी लगने लगे। 5 अप्रैल 1975 को आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री पीवी नरसिम्हा राव को पर्यवेक्षक बनाकर पटना भेजा गया और उनके कहने पर अब्दुल गफूर इस्तीफा देने को तैयार भी हो गए। नरसिम्हा राव ने जगन्नाथ मिश्र को मुख्यमंत्री बनाने का ऐलान किया। इस गफूर ने अपने पद से इस्तीफा दिया और 11 अप्रैल 1975 को जगन्नाथ मिश्र ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली।
इंदिरा के विरोधी खेमे में गफूर
आपातकाल के बाद जब चुनाव में कांग्रेस को हार मिली तो कांग्रेस के दो टुकड़े हो गए। इंदिरा गांधी ने कांग्रेस (I) बनाई और उनके विरोधी कांग्रेस (O) कहलाए। तब गफूर ने भी इंदिरा के विरोधी कांग्रेस (O) को चुना। 1980 में गफूर ने गोपालगंज से लोकसभा चुनाव लड़ा, लेकिन वह हार गए। जबकि इंदिरा की कांग्रेस जीत गई और इंदिरा गांधी फिर से प्रधानमंत्री बन गईं। अब गफूर ने धीरे-धीरे राजीव गांधी से नजदीकियां बढ़ाईं। 1984 के आम चुनाव में गफूर सीवान से चुनाव लड़े और जीत गए। राजीव गांधी प्रधानमंत्री बने तो गफूर को आवास और शहरी कार्य मंत्रालय की जिम्मेदारी दी गई। हालांकि, बाद में राजीव गांधी ने कांग्रेस के पुराने नेताओं को किनारे लगाना शुरू किया तो गफूर को भी इस्तीफा देने को मजबूर किया गया। लेकिन गफूर ने राजीव गांधी से नाराजगी जताते हुए उनसे कई प्रश्न पूछ लिए।
समता पार्टी के संस्थापक सदस्य रहे गफूर
1989 में वह सीवान से लोकसभा चुनाव हार गए और फिर कांग्रेस छोड़कर जनता दल में शामिल हो गए। 1991 के आम चुनाव में जीतकर संसद पहुंचे, लेकिन तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू यादव से नहीं बनी। आखिर 1994 में जनता दल के 14 सांसदों के साथ नीतीश कुमार और जॉर्ज फर्नांडिस ने समता पार्टी बनाई, जिसमें अब्दुल गफूर की अहम भूमिका थी। गफूर समता पार्टी के संस्थापक अध्यक्ष भी बने। 1996 में वह समता पार्टी की टिकट पर गोपालगंज से चुनाव लड़े और हार गए। 1998 में उन्होंने अपना अंतिम चुनाव लड़ा और गोपालगंज से चुनाव जीतकर दिल्ली पहुंचे। 13 दिन की लोकसभा के सदस्य रहे। राजनीति से सन्यास लेने के बाद 2004 में उनका लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया।
