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दर्द की स्याही से लिखी सफलता की कहानी, बेटे के निधन के बाद खाई डॉक्टर बनने की कसम, अमेरिका से हासिल की MD की डिग्री

Indias First Female doctor Anandi Gopal Joshi: नौ साल की उम्र में 25 साल की उम्र के आदमी से शादी, 14 की उम्र में बनी मां लेकिन 9 दिन बाद बेटे का निधन। यह कहानी है आनंदीबाई गोपाल जोशी की, जिन्होंने नवजात बेटे के निधन के बाद कसम खाई कि किसी भी बच्चे को बीमारी से नहीं मरने देंगी। यह कहानी है देश की पहली महिला डॉक्टर की जिन्होंने समाज की बेड़ियों को तोड़कर दर्द की स्याही से सफलता की कहानी लिख डाली।

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नवजात बेटे के निधन के बाद बनी देश की पहली महिला डॉक्टर
Authored by: Kuldeep Raghav
Updated Jul 1, 2026, 12:12 IST

National Doctors Day: आज जब हम डॉक्टर्स डे मनाते हैं, तो सफेद कोट पहनकर लोगों की जान बचाने वाले हजारों डॉक्टरों को सलाम करते हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि भारत की पहली महिला डॉक्टर बनने का रास्ता कितना कठिन रहा होगा? जब लड़कियों की पढ़ाई को ही पाप माना जाता था, तब एक लड़की ने समाज की हर बंदिश को चुनौती देकर इतिहास लिख दिया। नौ साल की उम्र में 25 साल की उम्र के आदमी से शादी, 14 की उम्र में बनी मां लेकिन 9 दिन बाद बेटे का हुआ निधन। यह कहानी है आनंदीबाई गोपाल जोशी की, जिन्होंने नवजात बेटे के निधन के बाद कसम खाई कि किसी भी बच्चे को बीमारी से नहीं मरने देंगी। यह कहानी है देश की पहली महिला डॉक्टर की जिन्होंने समाज की बेड़ियों को तोड़कर दर्द की स्याही से सफलता की कहानी लिख डाली।

यह कहानी सिर्फ एक डॉक्टर बनने की नहीं, बल्कि एक मां के दर्द, एक बेटी के संघर्ष और एक ऐसी महिला की है जिसने अपनी निजी त्रासदी को लाखों महिलाओं की उम्मीद में बदल दिया। 31 मार्च 1865 को महाराष्ट्र के एक रूढ़िवादी परिवार में एक बच्ची का जन्म हुआ। उसका नाम रखा गया यमुना। महज 9 साल की उम्र में उनकी शादी उनसे काफी बड़े गोपालराव जोशी से कर दी गई। शादी के बाद उनका नाम आनंदीबाई रखा गया। उस दौर में लड़कियों की शिक्षा की कोई चर्चा नहीं होती थी। समाज की सोच साफ थी- लड़कियों का जीवन घर की चारदीवारी तक ही सीमित रहेगा, लेकिन किस्मत ने यमुना के लिए कुछ और ही लिखा था।

डॉ आनंदी गोपाल जोशी

डॉ आनंदी गोपाल जोशी

सिर्फ 14 साल की उम्र में आनंदीबाई मां बनीं लेकिन खुशियां ज्यादा देर तक टिक नहीं सकीं। उनका नवजात बच्चा किसी गंभीर बीमारी से पीड़ित था, जिसकी वजह से जन्म के 9-10 दिन बाद ही उसकी मौत हो गई। बच्चे को खोने का दर्द आनंदी के लिए असहनीय था लेकिन उन्हें ठाना कि किसी भी बच्चे को बीमारी से नहीं मरने देंगी। एक मां के लिए इससे बड़ा दर्द शायद ही कोई हो सकता है, लेकिन यही दर्द उनकी जिंदगी का सबसे बड़ा मोड़ बन गया।

अपने बेटे को खोने के बाद आनंदीबाई ने फैसला किया कि अब कोई मां इलाज के अभाव में अपना बच्चा न खोए। उन्होंने डॉक्टर बनने का संकल्प लिया। आज यह फैसला सामान्य लग सकता है, लेकिन उस समय किसी भारतीय महिला का डॉक्टर बनने का सपना देखना भी समाज के खिलाफ विद्रोह माना जाता था। घर से बाहर निकलना आसान नहीं था। समाज ताने देता था, लोग विरोध करते थे, लेकिन आनंदीबाई ने हार नहीं मानी। 1880 में उनके पति गोपालराव ने एक मशहूर अमेरिकी मिशनरी को पत्र लिखकर अमेरिका में चिकित्सा की पढ़ाई करने की पूरी जानकारी एकत्र की। पति ने भी उस दौर की परंपराओं से अलग जाकर उनकी शिक्षा का समर्थन किया। आखिरकार, आनंदीबाई ने अमेरिका के वुमेन्स मेडिकल कॉलेज ऑफ पेनसिल्वेनिया में प्रवेश लिया। वह पश्चिमी चिकित्सा की पढ़ाई करने वाली पहली भारतीय महिलाओं में शामिल हुईं।

डॉ आनंदी गोपाल जोशी

डॉ आनंदी गोपाल जोशी

पेंसिल्वेनिया के महिला मेडिकल कॉलेज में आनंदी ने दाखिला लिया। इसके लिए उन्होंने अपने सारे गहने बेच दिए। कुछ लोगों ने आनंदी के इस कदम में उनका साथ देते हुए सहायता के लिए 200 रुपये की मदद की। हालांकि मौसम, खान-पान अलग होने की वजह से लगातार उनकी सेहत बिगड़ती गई। लेकिन इन कठिन परिस्थितियों के बीच उन्होंने पढ़ाई नहीं छोड़ी। बीमारी से लड़ते हुए उन्होंने अपनी पढ़ाई पूरी की और एमडी की डिग्री हासिल कर भारत का नाम दुनिया में रोशन कर दिया। वह अमेरिका से मेडिकल डिग्री प्राप्त करने वाली पहली भारतीय महिला बनीं। उनकी इस उपलब्धि पर तत्कालीन ब्रिटिश महारानी विक्टोरिया ने भी उन्हें बधाई संदेश भेजा था।

भारत लौटने पर उनका भव्य स्वागत हुआ और कोल्हापुर रियासत के अल्बर्ट एडवर्ड अस्पताल के महिला वार्ड में प्रभारी चिकित्सक पद पर नियुक्त हुईं। लेकिन किस्मत ने यहां भी उनका साथ नहीं दिया। डाॅक्टरी की प्रैक्टिस के दौरान वह टीबी की बीमारी की शिकार हो गईं। जिसकी वजह से 26 फरवरी 1887 में महज 22 साल की उम्र में बीमारी के कारण आनंदीबाई का निधन हो गया। उनका सपना बहुत छोटा था, लेकिन उसका असर बहुत बड़ा निकला।

समाज की बदली सोच

जिस दौर में महिलाओं को पढ़ने का अधिकार भी मुश्किल से मिलता था, उस दौर में उन्होंने डॉक्टर बनकर भारतीय समाज की सोच बदलने की शुरुआत की। आनंदीबाई का जीवन हमें सिखाता है कि कभी-कभी एक व्यक्ति का संघर्ष आने वाली कई पीढ़ियों का रास्ता बदल देता है। आज देश में लाखों महिला डॉक्टर मरीजों का इलाज कर रही हैं, लेकिन उस सफर की पहली मजबूत नींव आनंदीबाई गोपाल जोशी ने रखी थी। आनंदीबाई सिर्फ भारत की पहली महिला डॉक्टर नहीं थीं, बल्कि वे इस बात का जीवंत प्रमाण हैं कि दृढ़ इच्छाशक्ति, शिक्षा और सेवा का भाव इतिहास बदल सकता है। यही उनकी सबसे बड़ी विरासत है।

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