आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), डेटा साइंस और साइबर सिक्योरिटी जैसे क्षेत्रों की चर्चा के बीच न्यूक्लियर इंजीनियरिंग तेजी से उभरते करियर विकल्प के रूप में सामने आ रहा है। इसकी सबसे बड़ी वजह है देश में स्वच्छ ऊर्जा पर बढ़ता फोकस, परमाणु ऊर्जा क्षेत्र में निवेश और इस दिशा में शैक्षणिक संस्थानों की नई पहल। दरअसल, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, बॉम्बे (IIT Bombay) ने सस्टेनेबिलिटी हार्नेसिंग एंड एडवांसमेंट ऑफ न्यूक्लियर एनर्जी फॉर ट्रांसफॉर्मिंग इंडिया (SHANTI) एक्ट के तहत न्यूक्लियर इंजीनियरिंग का नया प्रोग्राम शुरू करने की घोषणा की है।
इस पहल का उद्देश्य देश में न्यूक्लियर टेक्नोलॉजी, रिसर्च और इंडस्ट्री के लिए विशेषज्ञ मानव संसाधन तैयार करना है। वहीं, सरकार भारत को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के लिए इस्तेमाल होने वाले नए डेटा सेंटर्स का एक बड़ा केंद्र बनाने पर जोर दे रही है, जिसके लिए बहुत ज्यादा बिजली क्षमता की जरूरत होगी। यहीं पर परमाणु ऊर्जा की भूमिका अहम हो जाती है। इस बीच यह जानना जरूरी है कि न्यूक्लियर इंजीनियरिंग की मांग आखिर क्यों बढ़ रही है और इसका भविष्य कैसा है?
आखिर क्यों बढ़ रही है न्यूक्लियर इंजीनियरिंग की मांग?
भारत ने वर्ष 2047 तक अपनी परमाणु ऊर्जा क्षमता को बड़े स्तर पर बढ़ाने का लक्ष्य रखा है। बढ़ती बिजली की जरूरत, कार्बन उत्सर्जन में कमी और ऊर्जा सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए सरकार न्यूक्लियर एनर्जी को भविष्य की महत्वपूर्ण ऊर्जा के रूप में देख रही है। ऐसे में इस सेक्टर को डिजाइन, रिसर्च, ऑपरेशन और सेफ्टी के लिए बड़ी संख्या में प्रशिक्षित इंजीनियरों की आवश्यकता होगी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ऑस्ट्रेलिया के दौरे पर रहेंगे।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस दौरे में वह भारत की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए यूरेनियम सप्लाई को लेकर डील पर हस्ताक्षर भी कर सकते हैं। 2014 में दोनों देशों के बीच सिविल न्यूक्लियर कोऑपरेशन एग्रीमेंट (नागरिक परमाणु सहयोग समझौता) पर हस्ताक्षर होने के बाद से भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच यूरेनियम की सप्लाई के लिए एक कमर्शियल डील पर बातचीत चल रही है। भारत को मौजूदा वक्त में यूरेनियम की सालभर की जरूरत अभी 1,500–2,000 टन है। 2047 तक 100 गीगावाट न्यूक्लियर क्षमता का लक्ष्य पूरा करने के लिए इसके बढ़कर 5,400 टन होने की उम्मीद है।
IIT बॉम्बे की नई पहल क्यों खास है?
IIT बॉम्बे का नया कार्यक्रम केवल पारंपरिक न्यूक्लियर इंजीनियरिंग तक सीमित नहीं रहेगा। इसमें एडवांस्ड रिएक्टर टेक्नोलॉजी, थोरियम आधारित ऊर्जा प्रणाली, न्यूक्लियर सेफ्टी, सिमुलेशन, रिसर्च और इंडस्ट्री सहयोग जैसे विषय शामिल किए जाएंगे। संस्थान का लक्ष्य छात्रों को ऐसी स्किल्स देना है, जिनकी आने वाले वर्षों में देश और विदेश दोनों जगह मांग बढ़ सकती है। इस नए प्रोग्राम के लिए आईआईटी बॉम्बे के कई विभाग मिलकर एक साथ काम करेंगे। इसमें मैकेनिकल इंजीनियरिंग डिपार्टमेंट, एनर्जी साइंस एंड इंजीनियरिंग, मेटालर्जिकल इंजीनियरिंग और मैटेरियल्स साइंस और इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग डिपार्टमेंट शामिल होंगे।
IIT बॉम्बे का नया न्यूक्लियर इंजीनियरिंग प्रोग्राम
इस क्षेत्र में कहां मिल सकती हैं नौकरियां?
न्यूक्लियर इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने वाले छात्रों के लिए अवसर केवल परमाणु बिजली संयंत्रों तक सीमित नहीं हैं। न्यूक्लियर टेक्नोलॉजी से जुड़ी निजी कंपनियों और वैश्विक ऊर्जा संगठनों में भी अवसर बढ़ने की संभावना है।
- न्यूक्लियर पावर प्लांट्स
- परमाणु अनुसंधान संस्थान
- रक्षा एवं रणनीतिक अनुसंधान
- हेल्थकेयर और न्यूक्लियर मेडिसिन
- रेडिएशन सेफ्टी एवं रेगुलेशन
- ऊर्जा और इंजीनियरिंग कंसल्टेंसी
- अंतरराष्ट्रीय रिसर्च संस्थान और उच्च शिक्षा
AI बनाम न्यूक्लियर इंजीनियरिंग: कौन बेहतर?
न्यूक्लियर इंजीनियरिंग को AI का विकल्प नहीं, बल्कि एक पूरक क्षेत्र के रूप में देखना चाहिए। आज न्यूक्लियर सेक्टर में भी AI, मशीन लर्निंग, डिजिटल ट्विन और ऑटोमेशन जैसी तकनीकों का तेजी से उपयोग हो रहा है। यानी भविष्य के इंजीनियरों के लिए AI और न्यूक्लियर इंजीनियरिंग का संयोजन सबसे अधिक मूल्यवान साबित हो सकता है। IIT बॉम्बे में इस नए प्रोग्राम को और ज्यादा प्रभावी बनाने के लिए न्यूक्लियर मेजरमेंट लेबोरेटरी भी तैयार की जाएगी। आईआईटी बॉम्बे के निदेशक प्रो. शिरीष केदारे का कहना है कि शांति एक्ट ने न्यूक्लियर एनर्जी की फील्ड में काम करने, इनोवेशन करने और व्यापक भागीदारी के लिए अनुकूल परिस्थितियां बनाने में महत्पूर्ण भूमिका निभाई है। आईआईटी बॉम्बे का यह न्यूक्लियर इंजीनियरिंग प्रोग्राम सीधे तौर पर इसी बदलाव को ध्यान में रखकर तैयार किया जाएगा।
AI VS न्यूक्लियर इंजीनियरिंग
किन छात्रों के लिए है बेहतर विकल्प?
यदि आपकी रुचि फिजिक्स, मैथ्स, ऊर्जा विज्ञान, रिसर्च और नई तकनीकों में है, तो न्यूक्लियर इंजीनियरिंग एक बेहतरीन करियर विकल्प बन सकती है। न्यूक्लियर इंजीनियरिंग प्रोग्राम में कैसे एडमिशन होगा? कौन इसमें अप्लाई कर सकेगा? कितनी सीटें होंगी? इसकी जानकारी फिलहाल साझा नहीं की गई है। हालांकि न्यूक्लियर इंजीनियरिंग भविष्य में उन छात्रों के लिए एक मजबूत करियर विकल्प बनकर उभर सकता है, जो पारंपरिक इंजीनियरिंग से आगे बढ़कर देश के ऊर्जा क्षेत्र में योगदान देना चाहते हैं। खासकर ऐसे समय में, जब भारत स्वच्छ ऊर्जा, आत्मनिर्भर तकनीक और हाई-एंड इंजीनियरिंग पर तेजी से निवेश कर रहा है। बीते कुछ वर्षों में AI ने करियर की दिशा जरूर बदली है, लेकिन आने वाला दशक केवल सॉफ्टवेयर का नहीं होगा। क्लीन एनर्जी, एडवांस्ड मैन्युफैक्चरिंग, स्पेस और न्यूक्लियर टेक्नोलॉजी जैसे क्षेत्रों में भी विशेषज्ञों की मांग तेजी से बढ़ने वाली है।
