Power Corridor: इंडियन पुलिस सेवा (IPS) अधिकारी दीपक बर्नवाल ने टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल के खास कार्यक्रम 'पावर कॉरिडोर' के साथ बातचीत में प्रारंभिक जीवन, हिंदी माध्यम की चुनौतियां, संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) इंटरव्यू के अनूठे अनुभव साझा किए।
उत्तर प्रदेश के प्रयागराज (इलाहाबाद) के एक छोटे से गांव से निकलकर 2010 बैच के आईपीएस अधिकारी बनने वाले दीपक बर्नवाल की जीवन-यात्रा मेहनत, धैर्य और जन-सेवा के समर्पण की मिसाल है। आईपीएस ट्रेनिंग के दौरान पहली बार हैदराबाद शहर देखने वाले दीपक बर्नवाल को बिहार कैडर आवंटित हुआ, जहां उन्होंने 16 वर्षों तक अपनी सेवाएं दीं और वर्तमान में वह डाआईजी (DIG) के पद पर कार्यरत हैं।
टाइम्स नाउ नवभारत की डॉ. रमा सोलंकी के साथ बातचीत में दीपक बर्नवाल ने कहा, ''सिविल सर्विसेज में आने का उद्देश्य तो बहुत तरह के होते हैं। मेरा प्राथमिक उद्देश्य एक ऐसी स्थिति तक पहुंचना था जहां से समाज में लोगों की भलाई और मदद करने का प्रत्यक्ष अवसर मिल सके।''
डीआईजी बर्नवाल का मानना है कि व्यक्तिगत लाभ तो किसी भी क्षेत्र में हासिल किया जा सकता है, लेकिन सिविल सेवा का कोई विकल्प नहीं है, क्योंकि यहां योजनाबद्ध व समर्पित होकर काम करने से हर वर्ग के व्यक्ति की मदद की जा सकती है, जो आत्म-संतुष्टि के लिए बहुत मायने रखता है।
इस दौरान, उन्होंने हिंदी मीडियम में सिविल सेवा (UPSC) की तैयारी करने वाले अभ्यर्थियों को कुछ टिप्स भी दिए। उन्होंने कहा, ''उनके समय में आज की तुलना में हिंदी मीडियम के छात्रों के लिए अध्ययन सामग्री और एक्सपोजर की कमी एक बड़ी चुनौती थी। उस दौर में छोटे शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों में उपलब्ध स्कूल-कॉलेज भी मुख्य रूप से हिंदी मीडियम के ही थे।''
बकौल बर्नवाल, हिंदी मीडियम के छात्रों के सामने सबसे बड़ी दिक्कत यह रहती है कि उन्हें अंग्रेजी मीडियम की तुलना में अध्ययन सामग्री कम उपलब्ध होती है। हालांकि, उन्होंने इस चुनौती को रास्ता रोकने वाली समस्या मानने के बजाय अतिरिक्त मेहनत के अवसर के तौर पर लेने की सलाह दी।
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हिंदी मीडियम के छात्रों को ज्यादा मेहनत की जरूरत
उन्होंने कहा कि हिंदी मीडियम में अंग्रेजी की तुलना में एक्सपोजर और स्टडी मटीरियल की उपलब्धता थोड़ी कम हो सकती है, इसलिए अभ्यर्थियों को थोड़ी अधिक मेहनत और सिंसियरिटी रखनी होगी। उन्होंने कहा कि अच्छी अंग्रेजी बोलने वालों के सामने खुद को कमतर न समझें। यह अंतर स्वाभाविक है, परंतु सही रणनीति और मेहनत से इस पर आसानी से पार पाया जा सकता है।
डीआईजी बर्नवाल ने कहा कि भाषा आपके ज्ञान, समझ और विचारों को प्रदर्शित करने का एक जरिया है, इसलिए मीडियम को अपनी कमजोरी न बनने दें। उन्होंने सुझाव दिया कि हिंदी मीडियम के छात्रों को अंग्रेजी को लेकर जो हिचकिचाहट (Hesitation) होती है, उससे बचना चाहिए। अंग्रेजी में काफी पठन सामग्री उपलब्ध होती है, इसलिए उसे समझकर पढ़ना जरूरी है।
UPSC इंटरव्यू में बोर्ड से पूछा था सवाल
डीआईजी बर्नवाल ने 2010 में यूपीएससी का इंटरव्यू दिया था और आज भी उन्हें लगता है जैसे कल की ही बात रही हो और उसके बारे में सोचकर वह नर्वस हो जाते हैं। उन्होंने बताया कि मेरा श्री बालागोस्वामी सर का बोर्ड था और उन्होंने मुझसे कहा था- आप मुझसे एक सवाल पूछिए।
डीआईजी बर्नवाल ने बताया कि उन्हें पहले से पता था कि इस बोर्ड में आखिर में उम्मीदवार से सवाल पूछने को कहा जाता है। उनके दोस्तों ने भी उन्हें पहले से कोई सवाल तैयार रखने की सलाह दी थी, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया और इंटरव्यू में स्वाभाविक रूप से सवाल पूछने का फैसला किया।
DIG बर्नवाल ने क्या सवाल पूछा?
उन्होंने बताया, ''उन्होंने इलाहाबाद उत्तरी शहरी क्षेत्र का उदाहरण देते हुए पूछा कि वहां साक्षरता दर सबसे अधिक है, फिर भी वोटिंग प्रतिशत सबसे कम रहता है। इसके विपरीत, उनके ग्रामीण क्षेत्र में साक्षरता दर कम होने के बावजूद लोग मुंबई जैसे दूर-दराज शहरों से वोट देने आते हैं और वहां वोटिंग प्रतिशत अधिक रहता है। सिद्धांत और व्यवहार के इस अंतर पर उन्होंने बोर्ड से राय मांगी कि पढ़े-लिखे लोग मतदान के प्रति उदासीन क्यों रहते हैं?''
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इस दौरान, बोर्ड ने डीआईजी बर्नवाल ने उत्तर प्रदेश को एक सवाल पूछा था कि जनसंख्या कम करने के लिए क्या किया जा सकता है, लेकिन साथ में बोर्ड ने यह शर्त रख दी कि 'शिक्षा' और 'जागरूकता' जैसे सामान्य उत्तर नहीं देने हैं। उन्होंने कहा कि केवल जनसंख्या बढ़ाने वालों को हतोत्साहित करने के बजाय, जो लोग जनसंख्या नियंत्रण में योगदान दे रहे हैं उन्हें प्रोत्साहित किया जाए और विशेष सरकारी योजनाएं दी जाएं।
DIG Deepak Barnwal
बकौल डीआईजी बर्नवाल, उन्होंने महिलाओं को आर्थिक व वित्तीय रूप से स्वतंत्र बनाने पर जोर दिया, ताकि ग्रामीण क्षेत्रों में परिवार नियोजन से जुड़े फैसलों में केवल पुरुषों का ही नहीं, बल्कि महिलाओं का भी प्रभाव हो सके।
स्ट्रेज मैनेजमेंट को लेकर क्या बोले DIG बर्नवाल
उन्होंने कहा कि समाज और परिवार दोनों ही इस बात से भली-भांति परिचित होते हैं और त्योहारों पर छुट्टी न मिलने या उच्च दबाव वाली स्थितियों के लिए मानसिक रूप से तैयार रहते हैं। उन्होंने कहा कि किसी अपराध को सुलझाने या किसी पीड़ित व्यक्ति की निस्वार्थ मदद करने से मिलने वाली आत्म-संतुष्टि सबसे बड़ा स्ट्रेस-बस्टर होती है।
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सीनियर्स का मिलता है गाइडेंस
डीआईजी बर्नवाल ने कहा कि शुरुआती दौर में नर्वसनेस और तनाव को कम करने में सीनियर ऑफिसर्स का मार्गदर्शन और सहयोग बहुत महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। उन्होंने कहा कि जब लॉ एंड ऑर्डर की समस्या या कोई अपराध होता है तो बहुत तनाव होता है, लेकिन जब मामला सुलझ जाता है और लोगों को सुरक्षा मिलती है, तो उसके बाद जो सुकून मिलता है, उसका कोई मुकाबला नहीं है। साथ ही उन्होंने बताया कि तनाव दूर करने के लिए वह किताबें पढ़ने, खेल-कूद और फ़िल्में देखने जैसी पुरानी आदतों को भी समय देते हैं।
उन्होंने कहा कि जब व्यक्ति अपनी परेशानियां शेयर नहीं करता, तो तनाव बढ़ जाता है। पुराने दोस्तों, बैचमेट्स या सीनियर अधिकारियों से बात करने पर यह अहसास होता है कि अन्य लोग भी ऐसी ही या इससे भी कठिन परिस्थितियों का सामना कर चुके हैं, जिससे यह भाव खत्म हो जाता है कि "केवल मैं ही परेशान हूं"।
