उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव 2027 से पहले महिला वोटरों को लेकर सियासी हलचल तेज हो गई है। राज्य की योगी आदित्यनाथ सरकार में महिलाओं के लिए एक ऐसी योजना पर मंथन हो रहा है, जिसके लागू होते ही सीधा असर राज्य की करोड़ों महिला वोटरों पर पड़े। चर्चाएं जोरों पर हैं कि पड़ोसी राज्य बिहार की तर्ज पर यूपी में भी महिलाओं को स्वरोजगार के लिए आर्थिक मदद दी जा सकती है। सूत्रों के मुताबिक इस योजना के तहत महिलाओं के बैंक खातों में सीधे पैसा भेजने (DBT) की तैयारी चल रही है। बिहार की ही तरह विधानसभा चुनाव से पहले इसे लागू भी किया जा सकता है। सूत्रों के मुताबिक इस योजना के तहत महिलाओं को 50 हजार रुपये तक की मदद देने की तैयारी है।
उत्तर प्रदेश में भी महिलाओं के लिए आएगी बिहार जैसी योजना!
क्या भाजपा, बिहार में महिला वोटरों के बीच सफल रहे ‘जीविका दीदी’ मॉडल को अब उत्तर प्रदेश में लागू करने की तैयारी में है? सूत्रों के मुताबिक यह रकम एकमुश्त देने के बजाय तीन से चार किश्तों में दी जा सकती है। सूत्रों के मुताबिक योजना के तहत उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 से पहले महिलाओं के खाते में 20 हजार की पहली किस्त भेजी जा सकती है। चुनाव के बाद अगर भाजपा सत्ता में लौटती है तो 10-10 हजार रुपये की तीन और किश्तें देने की भी योजना बनाई जा रही है।
योजना को लेकर अभी राज्य की योगी आदित्यनाथ सरकार के साथ ही भाजपा भी अपने स्तर पर सर्वे करा रही है। सूत्रों के अनुसार योगी सरकार के एक वरिष्ठ मंत्री को इसकी जिम्मेदारी दी गई है, जो भाजपा प्रदेश अध्यक्ष भी रह चुके हैं।
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उत्तर प्रदेश में अगले साल विधानसभा चुनाव की तैयारियां अब धीरे-धीरे तेज होने लगी हैं। सरकार के सामने चुनौती सिर्फ सत्ता में वापसी ही नहीं, बल्कि बड़ी जीत हासिल करके विपक्ष के नेरेटिव को भी ध्वस्त करने की है। ऐसे में अलग-अलग सामाजिक वर्गों और वोट बैंक को साधने की रणनीति पर अभी से काम शुरू हो चुका है। इसी कड़ी में महिला वोटरों पर खास फोकस किया जा रहा है। बता दें कि उत्तर प्रदेश में कुल 5 करोड़ 67 लाख महिला मतदाता हैं, यानी कुल मतदाताओं का लगभघ 50 फीसद महिलाएं हैं।
50 लाख से ज्यादा महिलाएं योजना के दायरे में आ सकती हैं
चर्चा है कि उत्तर प्रदेश की 50 लाख से अधिक महिलाओं को इस प्रस्तावित योजना के दायरे में लाने का लक्ष्य रखा जा सकता है। योजना के तहत आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग की महिलाओं को प्राथमिकता दी जा सकती है। इसमें अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति परिवारों की महिलाओं के साथ ही BPL परिवारों की महिलाओं, निराश्रित और विधवा महिलाओं को भी योजना का लाभ दिया जा सकता है।
प्रस्तावित योजना का लाभ लेने के लिए पात्रता पारिवारिक आय को रखा जा सकता है। इसमें ऐसे परिवारों को शामिल किया जा सकता है, जिनकी सालाना आय 12 लाख रुपये से ज्यादा न हो। हालांकि, पात्रता की अंतिम सीमा सरकार के अंतिम प्रस्ताव और शासनादेश के बाद ही साफ हो पाएगी।
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उत्तर प्रदेश में पहले से मौजूद ये मॉडल
मौजूदा आंकड़ों के अनुसार, उत्तर प्रदेश में लगभग 8 लाख, 99 हजार, 398 परिवारों की 98 लाख, 76 हजार, 389 महिलाएं सेल्फ हेल्प ग्रुपों से जुड़ी हैं। यानी सरकार के पास पहले से ही लगभग एक करोड़ महिलाओं तक पहुंचने का नेटवर्क मौजूद है। अगर नई योजना को इसी नेटवर्क से जोड़ दिया जाता है, तो सरकार के लिए लाभार्थियों की पहचान और आर्थिक गतिविधियों से जोड़ने का काम अपेक्षाकृत आसान हो सकता है।
बिहार मॉडल की इतनी चर्चा क्यों?
बिहार मॉल की इतनी चर्चा इसलिए हो रही है, क्योंकि इस योजना का उद्देश्य हर परिवार की कम से कम एक महिला को स्वरोजगार से जोड़ना था। बिहार चुनाव से पहले महिलाओं के खातों में 10 हजार रुपये की प्रारंभिक आर्थिक सहायता भी भेजी गई थी। इसके बाद रोजगार शुरू करने और कामकाज का आकलन करने के आधार पर आगे आर्थिक मदद देने का प्रावधान रखा गया था। बिहार के चुनाव में महिला मतदाता एक महत्वपूर्ण राजनीतिक ताकत बनकर सामने आईं और बीजेपी की अगुवाई वाले NDA को बंपर जीत मिली थी।
इतना पैसा कहां से आएगा?
सूत्रों के अनुसार अगर एक करोड़ महिलाओं को इस योजना से जोड़ा जाता है तो सरकार को अपनी जेब से लगभग 50 हजार करोड़ रुपये खर्च करने होंगे। अभी उत्तर प्रदेश के बजट का आकार लगभग 9 लाख करोड़ रुपये है और राजकोषीय घाटा एक लाख करोड़ रुपये से ज्यादा का है। ऐसे में इस योजना के लिए पैसा कहां से आएगा? इस सवाल का जवाब सरकार और बीजेपी अपने स्तर पर तलाश कर रही है।
