Noida News: Well-Planned Conspiracy जी हां, उत्तर प्रदेश के श्रम मंत्री अनिल राजभर ने नोएडा में हुए श्रमिक के प्रदर्शन के लिए यही शब्द कहे। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी साजिश का आरोप लगाया। उन्होंने इस प्रदर्शन को राज्य में बने निवेश के माहौल और उत्तर प्रदेश की ग्रोथ को पटरी से उतारने की साजिश बताया। पहले सोमवार 13 अप्रैल को फैक्टरियों में काम करने वाले श्रमिकों का आंदोलन और फिर मंगलवार 14 अप्रैल को घरों में काम करने वाली घरेलू सहायिकाओं (House Help or Maid) का प्रदर्शन... दोनों में ही हिंसा हुई, जिससे सार्वजनिक संपत्ति के साथ ही प्राइवेट प्रॉपर्टी को भी नुकसान पहुंचा। तो क्या श्रमिक आंदोलन और मेड का प्रदर्शन दोनों ही साजिश का हिस्सा हैं? अगर हां तो इसके पीछे कौन है? चलिए जानते हैं -
हिंसक हुआ श्रमिकों का आंदोलन
शुरू से शुरू करें तो सप्ताह के पहले दिन यानी मंगलवार 13 अप्रैल की घटना को लेते हैं। वेतन बढ़ाने और अन्य सुविधाओं की मांग को लेकर एक फैक्टरी की कर्मचारी सड़कों पर उतर आए। देखते ही देखते कुछ अन्य फैक्टरियों और कंपनियों के कर्मचारी भी उनके समर्थन में सड़कों पर आ गए। सुबह-सुबह ही उन्होंने तमाम सड़कों पर डेरा डाल दिया और सड़कों पर ट्रैफिक ठप हो गया। सुबह के समय सोमवार का दिन और दफ्तर जाने को निकले लोग कई-कई घंटों तक सड़कों पर ट्रैफिक जाम में फंसे रहे। इस बीच प्रदर्शन ने हिंसक रूप ले लिया और गाड़ियों को आग के हवाले कर दिया गया, कई फैक्टरियों और सड़कों पर भी तोड़फोड़ की घटनाएं साने आने लगीं। किसी तरह हिंसा पर काबू पाया गया और रात तक मजदूरों की ज्यादातर मांगों को मान भी लिया गया। उनका न्यूनतम वेतन बढ़ाने का भी फैसला ले लिया गया।
सड़क पर उतरीं घरेलू सहायिकाएं
सोमवार को सड़कों पर हुई हिंसा पर काबू पाने और मजदूरों की मांगें पूरी करने के बाद सरकार ने राहत की सांस ली ही थी, कि मंगलवार 13 अप्रैल को घरेलू सहायिकाएं (Maid) सड़क पर उतर आईं। अब इन घरेलू सहायिकाओं की मांग भी यही थी कि उनकी न्यूनतम मजदूरी बढ़ाई जाए। घरों में काम करने वाली इन महिलाओं का प्रदर्शन भी शांतिपूर्ण नहीं रहा, जल्द ही पत्थरबाजी होने लगी। नोएडा में सेक्टर 121 की क्लियो काउंटी सोसाइटी के बाहर घरेलू सहायिकाओं ने खूब हंगामा किया। उनकी मांग सैलरी बढ़ाने और छुट्टियां बढ़ाने की थीं। प्रदर्शन धीरे-धीरे हंगामे में बदला और फिर पत्थरबाजी भी होने लगी, जिसके बाद पुलिस को लाठीचार्ज करना पड़ा।

मंगलवार 14 अप्रैल को घरेलू सहायिकाओं ने किया प्रदर्शन
फैक्टरी कर्मियों और मेड के प्रदर्शन में फर्क
दोनों प्रदर्शन सैलरी बढ़ोतरी के लिए हुए और दोनों में ही हिंसा भी हुई। लेकिन दोनों में एक बड़ा फर्क ये है कि फैक्टरी में काम करने वाले मजूरों की एक न्यूनतम मजदूरी होती है। सरकार की तरफ से उनकी न्यूनतम मजदूरी तय की जाती है। लेकिन घरेलू सहायिकाओं के मामले में ऐसा नहीं होता। बल्कि मेड का मेहनताना घर के मालिक और घरेलू सहायिका के बीच बातचीत के आधार पर दोनों की सहमति से तय होता है। मेहनताना कम करने पर घरेलू सहायिका काम करने से इनकार कर सकती है। मकान मालिक भी न्यूनतम मेहनताने पर सहायिका अगर तैयार हो तो रख सकते हैं, क्योंकि सरकार की तरफ से उनकी न्यूनतम सैलरी तय नहीं होती। अब घरेलू सहायिकाओं का कहना है कि उन्हें भी फैक्टरी कामगारों की तरफ समझा जाए। उनके लिए भी मजदूरों की तरह न्यूनतम सैलरी तय की जाए।
संयोग या नोएडा को हिंसा में झौंकने की साजिश
सोमवार 13 अप्रैल को मजदूरों की मांगों को लेकर नोएडा में पहले ही हिंसा हो चुकी थी। आगजनी और तोड़फोड़ की घटनाएं हो चुकी थीं और मजदूरों की मांगें मानने के बाद मंगलवार को शांति की उम्मीद की जा रही थी। मंगलवार को मजदूर तो सड़कों पर नहीं उतरे, लेकिन घरेलू सहायिकाओं का प्रदर्शन हुआ और उसमें भी हिंसा हुई। उनकी मांग भी वेतन बढ़ोतरी की ही थी, जबकि ऐसा कोई प्रावधान या नियम नहीं है। जब नोएडा में एक दिन पहले ही हिंसा हुई तो उसके अगले दिन ही घरेलू सहायिकाओं का प्रदर्शन और उसमें हिंसा संयोग से ज्यादा जिले को हिंसा में झौंकने का प्रयोग लगा। जबकि घरेलू सहायिकाएं शांतिपूर्ण प्रदर्शन करके अपनी सैलरी में बढ़ोतरी अपने मकान मालिकों से ही करवा सकती थीं, क्योंकि नोएडा जैसे शहरों में घरेलू सहायिकाओं की मांग काफी ज्यादा है और उतनी सहायिकाएं मौजूद नहीं हैं।
ये फर्क भी तो समझना होगा
यह मुद्दा इसी साल जनवरी में सुप्रीम कोर्ट में भी उठ चुका है और अदालत ने भी साफ कर दिया था कि मुद्दा सिर्फ अधिकारों का नहीं, बल्कि इसके सामाजिक और आर्थिक असर का भी है। वैसे भी मेड का मेहनताना मांग और आपूर्ति के नियम के तहत तय होता है। नोएडा जैसे शहरों में हाउस हेल्प की मांग काफी ज्यादा और आपूर्ति कम है। फिर एक मेड कई-कई घरों में थोड़े-थोड़े समय के लिए काम करती है। जबकि छोटे शहरों में वह पूरे समय एक ही परिवार से जुड़ी रहती है।

सोमवार को नोएडा में कई जगह हिंसक प्रदर्शन हुए
क्या सच में नोएडा की हिंसा साजिश थी?
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और उनकी सरकार ने सोमवार को मजदूरों का हिंसक प्रदर्शन और मंगलवार को घरेलू सहायिकाओं के प्रदर्शन में हिंसा को साजिश करार दिया। जिस तरह से लगातार दो दिन नोएडा में हंगामे की स्थिति बनी रही, वह किसी साजिश की तरफ इशारा तो करती है। फैक्टरी कर्मियों की मांगें मानी जा चुकी हैं। उनकी न्यूनतम सैलरी भी बढ़ा दी गई है। लेकिन अगले ही दिन मेड की न्यूनतम सैलरी की मांग और उस मांग को लकेर हिंसा किसी साजिश का हिस्सा तो लगती ही है। उत्तर प्रदेश के श्रम मंत्री अनिल राजभर ने आरोप लगाया कि इन हिंसक प्रदर्शनों के तार उन पाकिस्तानी हैंडलरों से जुड़े हैं, जिन्हें हाल ही में गाजियाबाद और आसपास के क्षेत्रों से गिरफ्तार किया गया है। उन्होंने इस हिंसा को सोची-समझी साजिश बताया।
कांग्रेस-समाजवादी पार्टी पर गंभीर आरोप
मंत्री ने आरोप लगाया कि राज्य में कानून व्यवस्था की स्थिति को बिगाड़ने के मकसद से हिंसा की घटनाओं को अंजाम दिया गया। दूसरी तरफ यूपी के औद्योगिक विकास मंत्री नंद गोपाल गुप्ता नंदी ने विपक्ष पर प्रदर्शनकारियों के बीच हिंसा भड़काने का आरोप लगाया। उन्होंने खुले तौर पर कांग्रेस और समाजवादी पार्टी का नाम लेकर कहा कि उनकी पार्टी से जुड़े अराजक तत्वों ने राज्य की शांति भंग करने की कोशिश की।
क्या बोले अखिलेश यादव और राहुल गांधी
अखिलेश यादव से लेकर राहुल गांधी तक विपक्ष के नेताओं ने इस मुद्दे पर सरकार को घेरने की कोशिश की। उन्होंने प्रदर्शनकारियों की मांगों का समर्थन किया और इस मुद्दे की हैंडलिंग को लेकर सरकार की आलोचना भी की। पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने तो इस मामले में सीएम योगी आदित्यनाथ का इस्तीफा तक मांग लिया।
नोएडा पुलिस और ATS कर रही जांच
गौतमबुद्ध नगर जिले की पुलिस कमिश्नर लक्ष्मी सिंह और यूपी एटीएस ने इस मामले में साजिश के आरोपों के बीच जांच शुरू कर दी है। इसमें बाहरी लोगों के जरिए मिसइंफार्मेशन फैलाए जाने, विशेषतौर पर पाकिस्तानी हैंडरों की नक्सलवाद को जिंदा करने की संभावित कोशिश की भी जांच की जा रही है।
