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एक किशोर शहर की बूढ़ी परेशानियां: ग्रेटर नोएडा वेस्ट में ऊंची इमारतें, बौना विकास

Greater Noida West: ग्रेटर नोएडा वेस्ट की उम्र तो अभी किशोरावस्था वाली है। यहां प्राधिकरण है, संबंधित विभाग हैं, जनप्रतिनिधि हैं और विकास की योजनाएं भी। फिर भी बुनियादी सुविधाओं के लिए नागरिकों को रोज संघर्ष करना पड़ता है।

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ग्रेटर नोएडा वेस्ट (फोटो- AI Image Verified by Newsroom)
Authored by: सुनील कुमार सिरीज
Updated Oct 31, 2026, 17:17 IST
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Greater Noida West: ग्रेटर नोएडा वेस्ट की उम्र तो अभी किशोरावस्था वाली है। शहर को बसे ज्यादा वक्त नहीं हुआ, लेकिन इसकी बदहाली देखकर लगता है कि इसने विकास की उम्र से पहले ही बुढ़ापा ओढ़ लिया है। यहां आसमान छूती इमारतें हैं, लाखों सपनों के आशियाने हैं और भविष्य की एक तस्वीर भी। मगर इस तस्वीर का फ्रेम जरा हटाकर देखिए, तो विकास की कहानी में कई ऐसे पन्ने मिलेंगे, जिन्हें शायद जानबूझकर पलटना भूल गए हैं। सोसायटियों के आसपास की कनेक्टिंग सड़कें इस शहर की सबसे बड़ी विडंबना हैं। एक तरफ ऊंची इमारतों की कतारें हैं, दूसरी तरफ गड्ढों से भरी सड़कें, बजबजाती नालियां, गायब ढक्कन और कचरे के ढेर। इन रास्तों से गुजरते हुए यह तय करना मुश्किल हो जाता है कि यह एक तेजी से बसता हुआ शहर है या किसी उजड़ते इलाके की तस्वीर।

सड़क पर गड्ढे हैं, किनारे ठूंठ पेड़ हैं, हवा में धूल है और नालियों में गंदगी। विकास की रफ्तार इतनी तेज रही कि शायद सड़क, सफाई और जलनिकासी जैसी बुनियादी सुविधाएं पीछे छूट गईं। शहर की इमारतें ऊंची होती गईं, लेकिन नागरिक सुविधाएं जमीन से ऊपर उठने का नाम नहीं ले सकीं।

यहां धूल के गुबार सिर्फ हवा को प्रदूषित नहीं करते, वे विकास के दावों पर भी एक मोटी परत चढ़ा देते हैं। सड़क पर निकलने वाला नागरिक रोज अपनी आंखों, नाक और फेफड़ों से इस विकास का अनुभव करता है। उसे किसी रिपोर्ट, सर्वे या सरकारी आंकड़े की जरूरत नहीं। उसकी रोजमर्रा की जिंदगी ही शहर की बदहाली का सबसे बड़ा दस्तावेज है।

और चौराहे, उसके तो कहने ही क्या! यहां यातायात व्यवस्था देखकर लगता है कि सड़क पर चलने के नियमों को भी स्वतंत्रता दे दी गई है। दाएं जाएं या बाएं, कौन सी गाड़ी किस दिशा से आ जाए, इसका अनुमान लगाना मुश्किल है। लेन का मतलब शायद यहां सिर्फ अंग्रेजी का एक शब्द है, जिसका जमीन पर कोई खास इस्तेमाल नहीं। हर वाहन चालक अपने हिसाब से रास्ता खोजता है और हर पैदल यात्री अपनी किस्मत के भरोसे सड़क पार करता है।

जाम तो इस इलाके का पुराना परिचित है। सुबह हो या शाम, सड़क पर निकलते ही नागरिकों का समय, धैर्य और ईंधन तीनों दांव पर लग जाते हैं। शहर की सड़कों पर गाड़ियां चलती कम और रेंगती ज्यादा हैं। जाम इतना सामान्य हो गया है कि अब उसे समस्या मानने के बजाय शहर की जीवनशैली का हिस्सा समझ लिया गया है। शायद यही वह विकास है जिसमें नागरिकों को घर और दफ्तर के बीच की दूरी से ज्यादा समय ट्रैफिक में बिताने की सुविधा मिलती है।

लेकिन यह कहानी सिर्फ सोसायटियों के बाहर की नहीं है। भीतर की समस्याओं का जिक्र करें तो शिकायतों की एक अलग किताब खुल जाएगी। यानी नागरिक घर से बाहर निकलें तो सड़कें परेशान करती हैं और घर के भीतर रहें तो रखरखाव, प्रबंधन और सुविधाओं से जुड़ी समस्याएं उनका पीछा करती हैं। फ्लैट खरीदकर लोगों ने आशियाना तो बना लिया, लेकिन उस आशियाने तक पहुंचने और उसके आसपास रहने लायक शहर की तलाश अब भी जारी है।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि इस बदहाली की जिम्मेदारी आखिर किसकी है? ग्रेटर नोएडा वेस्ट में प्राधिकरण है, संबंधित विभाग हैं, जनप्रतिनिधि हैं और विकास की योजनाएं भी। फिर भी बुनियादी सुविधाओं के लिए नागरिकों को रोज संघर्ष करना पड़ता है। शिकायतें सोशल मीडिया पर आती हैं, तस्वीरें साझा होती हैं, समस्याएं बताई जाती हैं, लेकिन समाधान की गति अक्सर शिकायतों की संख्या से भी धीमी नजर आती है।

क्या जिम्मेदार लोगों को इस शहर की वास्तविक स्थिति का अंदाजा है? क्या वे कभी उन सड़कों पर चलते हैं, जिनसे रोज हजारों लोग गुजरते हैं? क्या उन्होंने कभी उस धूल को महसूस किया है, जो नागरिकों के घरों तक पहुंचती है? क्या उन्हें पता है कि एक खुली नाली, टूटी सड़क या अव्यवस्थित चौराहा किसी नागरिक के लिए रोजाना कितनी बड़ी परेशानी बन सकता है?

इन सवालों का जवाब सिर्फ सरकारी दफ्तरों में बैठकर नहीं मिल सकता। इसके लिए जरूरी है कि जिम्मेदार अधिकारी नागरिकों के बीच आएं और उनकी समस्याएं सुनें। ग्रेटर नोएडा वेस्ट में एक व्यापक जनसुनवाई या जनशिकायत मंच की जरूरत है। ऐसा मंच, जहां सोसायटियों के निवासी अपनी समस्याएं सीधे संबंधित अधिकारियों के सामने रख सकें। सड़क, सफाई, जलनिकासी, यातायात और हरियाली से जुड़े मुद्दों पर खुलकर बात हो। अधिकारी सिर्फ शिकायतें सुनें ही नहीं, बल्कि उनके समाधान की समयसीमा भी तय करें। नागरिकों को यह भरोसा मिले कि उनकी आवाज किसी फाइल में दबकर नहीं रह जाएगी।

जनसुनवाई का मतलब महज एक औपचारिक कार्यक्रम नहीं होना चाहिए। यह प्रशासन और नागरिकों के बीच जवाबदेही का ऐसा संवाद बने, जिसमें समस्याओं की पहचान हो, जिम्मेदारी तय हो और समाधान की प्रगति पर नजर रखी जाए। आखिर शहर नागरिकों के लिए बनते हैं, नागरिक शहर की अव्यवस्था के लिए नहीं। ग्रेटर नोएडा वेस्ट को अब और ऊंची इमारतों या नए विकास के दावों से ज्यादा जरूरत उन बुनियादी सुविधाओं की है, जो किसी शहर को रहने लायक बनाती हैं। अच्छी सड़कें, साफ नालियां, व्यवस्थित यातायात, हरियाली और जवाबदेह प्रशासन कोई विलासिता नहीं, नागरिकों का अधिकार हैं।

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