Times Now Navbharat Explainer: दिल्ली की तंग गलियों, ऊंची इमारतों और तेजी से फैलते शहरी ढांचे के बीच एक ऐसा खतरा लगातार बढ़ रहा है, जो हर साल सैकड़ों परिवारों को तबाह कर रहा है। यह खतरा है आग का। दक्षिण दिल्ली के मालवीय नगर स्थित फ्लरिश स्टेज बी एंड बी होटल में लगी भीषण आग में 21 लोगों की मौत ने एक बार फिर राजधानी की फायर सेफ्टी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। लेकिन यह कोई अकेली घटना नहीं है। सरकारी आंकड़े बताते हैं कि पिछले छह वर्षों में दिल्ली में आग से जुड़ी घटनाओं में 543 लोगों की जान जा चुकी है। यह बात हमें ध्यान रखनी होगी कि ये आंकड़ा सिर्फ एक संख्या नहीं है, बल्कि 500 से अधिक ऐसे परिवारों की कहानी है जिनके घरों से कोई हमेशा के लिए चला गया।
मालवीय नगर की आग ने फिर जगाया डर
बीते बुधवार को दक्षिण दिल्ली के मालवीय नगर इलाके में स्थित एक होटल में लगी आग ने कुछ ही मिनटों में मौत का तांडव मचा दिया। आग इतनी तेजी से फैली कि कई लोग कमरों में ही फंस गए। इनमें विदेशी नागरिक भी शामिल थे। हादसे में 21 लोगों की मौत हुई जबकि 25 अन्य झुलस गए। जांच में सामने आया कि होटल को केवल 6 कमरों की अनुमति थी, लेकिन वहां 28 कमरे संचालित किए जा रहे थे। इमारत में पर्याप्त वेंटिलेशन नहीं था और बेसमेंट का प्रवेश द्वार बंद मिला, जिसे दमकल कर्मियों को काटकर खोलना पड़ा। पुलिस अब अवैध निर्माण, सुरक्षा नियमों के उल्लंघन और होटल प्रबंधन की भूमिका की जांच कर रही है। यह घटना केवल एक होटल की लापरवाही नहीं, बल्कि दिल्ली में फायर सेफ्टी के बड़े संकट का प्रतीक बन गई है। ये घटना बताती है कि दिल्ली की फायर सेफ्टी कितनी खस्ताहाल है।
6 साल में 543 मौतें: आंकड़े क्या कहते हैं?
दिल्ली सरकार और दिल्ली फायर सर्विस (DFS) के आंकड़ों के अनुसार 2019 से मार्च 2026 तक आग से जुड़ी घटनाओं में 543 लोगों की मौत हुई है। साल के मुताबिक आंकड़ों की तस्वीर देखें तो समस्या और गंभीर दिखाई देती है:
- 2020-21: 41 मौतें
- 2021-22: 55 मौतें
- 2022-23: 95 मौतें
- 2023-24: 77 मौतें
- 2024-25: 90 मौतें
- 2025-26: 84 मौतें
- 2026 के पहले कुछ महीनों में ही: 65 मौतें
इन छह सालों में आग की घटनाओं में 4,403 लोग घायल हुए हैं। इनमें कई ऐसे लोग शामिल हैं जिन्हें जीवनभर के लिए शारीरिक और मानसिक आघात झेलना पड़ा। आग में बच जाने वाले लोग भी अक्सर गंभीर जलन, फेफड़ों की क्षति और पोस्ट-ट्रॉमेटिक स्ट्रेस जैसी समस्याओं से गुजरते हैं। केवल इस साल अग्निकांड में मौत के आंकड़ों को देखें तो यह कहीं अधिक चिंताजनक है। अगर यही रफ्तार जारी रही तो 2026 का आंकड़ा पिछले कई वर्षों के रिकॉर्ड तोड़ सकता है।
क्यों बढ़ रही हैं आग की घटनाएं?
दिल्ली में बढ़ती आग की घटनाओं के पीछे कई कारण हैं। मालवीय नगर होटल मामले में सामने आया कि अनुमति से कई गुना अधिक कमरे बनाए गए थे। यह समस्या सिर्फ एक होटल तक सीमित नहीं है। दिल्ली के कई बाजारों, गेस्ट हाउसों, गोदामों और फैक्ट्रियों में नियमों की अनदेखी आम बात है। कई इमारतों में फायर एग्जिट या तो होते नहीं हैं या सामान से भरे रहते हैं। पुरानी दिल्ली, करोल बाग, सदर बाजार, गांधी नगर और कई घनी आबादी वाले इलाकों में दमकल गाड़ियों का पहुंचना आज भी बड़ी चुनौती है। जब तक फायर ब्रिगेड घटनास्थल तक पहुंचती है, तब तक आग काफी फैल चुकी होती है। केवल इतना ही नहीं, कई व्यावसायिक प्रतिष्ठानों में फायर अलार्म काम नहीं करते। अग्निशमन यंत्र या तो एक्सपायर हो चुके होते हैं या कर्मचारियों को उन्हें चलाना नहीं आता। पीटीआई की रिपोर्ट बताती है कि दिल्ली फायर सर्विस को मिलने वाले आग संबंधी कॉल भी लगातार बढ़ रहे हैं। 2019-20 में दिल्ली फायर सर्विस को 17,231 कॉल और पिछले वित्तीय वर्ष में 20,379 कॉल मिले हैं, यानी कुछ वर्षों में हजारों अतिरिक्त घटनाएं दर्ज हुई हैं। यह बताता है कि आग का खतरा कम नहीं, बल्कि बढ़ रहा है।
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दिल्ली के बड़े अग्निकांड जिन्होंने झकझोर दिया
मालवीय नगर का हादसा कोई इकलौती घटना नहीं है, दिल्ली का इतिहास कई भयावह अग्निकांडों से जुड़ा रहा है, जिन्होंने राजधानी को हिलाकर रख दिया। 1997 का उपहार सिनेमा हादसा, जिसमें 59 लोगों की मौत हुई, फायर सेफ्टी नियमों पर राष्ट्रीय बहस का कारण बना। 2019 का अनाज मंडी अग्निकांड भी बेहद घातक साबित हुआ, जिसमें 44 लोगों की जान गई। हाल ही में विवेक विहार शिशु अस्पताल में लगी आग ने नौ नवजातों की जान ले ली, जबकि पालम अग्निकांड में भी नौ लोगों की मौत हुई थी। अब मालवीय नगर होटल त्रासदी इस भयावह सूची में जुड़ गई है, जिसने एक बार फिर राजधानी में सुरक्षा इंतजामों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
हर बड़ी आग के बाद जांच होती है, समितियां बनती हैं, नोटिस जारी होते हैं और कुछ समय तक अभियान चलाया जाता है। लेकिन कुछ महीनों बाद सब कुछ सामान्य हो जाता है। दरअसल समस्या केवल कानूनों की नहीं, बल्कि उनके पालन की है। दिल्ली में फायर सेफ्टी के नियम पहले से मौजूद हैं, लेकिन निगरानी और अनुपालन में बड़ी खामियां हैं।
क्यों दिल्ली में फेल हो जाता है फायर सेफ्टी सिस्टम
दिल्ली में फायर सेफ्टी का फेलियर किसी एक विभाग या एक चूक का नतीजा नहीं है, बल्कि यह प्रशासनिक शिथिलता, बुनियादी ढांचे की कमी और व्यावसायिक लालच का एक जटिल और जानलेवा कॉम्बिनेशन है। हाल ही में हुए मालवीय नगर, विवेक विहार और पालम जैसे दर्दनाक हादसों ने इस खोखले सिस्टम की पोल खोलकर रख दी है। आइए दिल्ली में फायर सेफ्टी की विफलता के मुख्य कारणों को हम पॉइंट्स में समझते हैं।
1. नियमों का उल्लंघन और अवैध निर्माण
दिल्ली के अधिकांश कमर्शियल इलाकों और संकरी गलियों में नियमों को ताक पर रखकर इमारतें खड़ी की जा रही हैं। मालवीय नगर हादसे में यह साफ देखा गया कि होटल के पास सिर्फ 6 कमरों की अनुमति थी, लेकिन वहां अवैध रूप से 28 कमरे चलाए जा रहे थे। ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाने के चक्कर में मकान मालिक या बिल्डर पूरी जमीन को कवर कर लेते हैं, जिससे आग लगने की स्थिति में बाहर निकलने का कोई रास्ता (Emergency Exit) नहीं बचता। इसके अलावा दिल्ली में बेसमेंट का कमर्शियल इस्तेमाल (जैसे कोचिंग सेंटर, डाइनिंग हॉल, या होटल के कमरे) धड़ल्ले से होता है। बेसमेंट में आने-जाने का रास्ता अक्सर एक ही संकरी सीढ़ी होती है। आग लगने की स्थिति में बेसमेंट में फंसे लोगों के लिए यह सीधे 'डेथ ट्रैप' बन जाता है।
2. वेंटिलेशन की कमी और दम घुटने का खतरा
दिल्ली के रिहायशी और व्यावसायिक इलाकों में वेंटिलेशन (हवा की आवाजाही) की भारी कमी है। फॉरेन्सिक जांचों में यह साबित हो चुका है कि अधिकांश अग्निकांडों में लोगों की मौत जलने से नहीं, बल्कि दम घुटने (Suffocation) से होती है। इमारतों में खिड़कियों और वेंटिलेटर को पैक कर दिया जाता है या वहां कंक्रीट का अवैध निर्माण कर दिया जाता है, जिससे आग लगने पर जहरीला धुआं बाहर नहीं निकल पाता और लोगों का कुछ ही मिनटों में दम घुट जाता है।
3. 'फायर NOC' की अनदेखी और भ्रष्टाचार
दिल्ली में हजारों गेस्ट हाउस, होटल, कोचिंग सेंटर और छोटे अस्पताल बिना वैध फायर NOC (No Objection Certificate) के धड़ल्ले से चल रहे हैं। कई सालों तक दिल्ली के फायर कानूनों में यह नियम था कि 15 मीटर से कम ऊंचाई वाली कमर्शियल इमारतों के लिए सख्त फायर NOC की जरूरत नहीं थी। इसका फायदा उठाकर लोगों ने 4-5 मंजिला इमारतों में बिना किसी सुरक्षा इंतजाम के धंधा शुरू कर दिया। साथ ही कई जगहों पर NOC सिर्फ कागजों पर ले ली जाती है, लेकिन जमीन पर कोई फायर फाइटिंग सिस्टम काम नहीं कर रहा होता.
4. दिल्ली की भौगोलिक बनावट
दिल्ली के कई पुराने और मिश्रित आबादी वाले इलाके जैसे हौज रानी, करोल बाग, अनाज मंडी, चांदनी चौक के इलाके बेहद संकरी गलियों वाले हैं। इन गलियों में चौड़ाई इतनी कम होती है कि आग लगने पर दिल्ली फायर सर्विसेज की बड़ी गाड़ियां (फायर टेंडर) मौके पर नहीं पहुंच पातीं। इन गलियों के ऊपर तारों का जंजाल लटका रहता है, जो राहत कार्य में लगे फायर फाइटर्स के रास्ते में भी बाधा डालता है।
5. निष्क्रिय सुरक्षा उपकरण और ट्रेनिंग की कमी
अक्सर देखा जाता है कि जिन इमारतों में फायर एक्स्टिंग्विशर (अग्निशामक यंत्र) या वॉटर स्प्रिंकलर लगे भी होते हैं, वे सिर्फ दिखावे के लिए होते हैं। उपकरणों का समय पर मेंटेनेंस नहीं होता, जिससे आपातकाल के समय वे काम नहीं करते। मालवीय नगर हादसे में भी तीन से चार फायर एक्स्टिंग्विशर सही-सलामत मिले, यानी आपात स्थिति में वहां मौजूद स्टाफ को उन्हें चलाना ही नहीं आता था।
6. प्रशासनिक विभागों में तालमेल की कमी
दिल्ली में किसी भी इमारत के कमर्शियल इस्तेमाल के लिए नगर निगम (MCD), दिल्ली विकास प्राधिकरण (DDA), दिल्ली पुलिस (लाइसेंसिंग विंग) और दिल्ली फायर सर्विसेज (DFS) जिम्मेदार हैं। इन विभागों के बीच आपसी तालमेल और डेटा शेयरिंग की भारी कमी है। जब तक कोई बड़ा हादसा नहीं होता, तब तक अवैध रूप से चल रही इमारतों के खिलाफ कोई कड़ा या संयुक्त अभियान नहीं चलाया जाता। हादसा होने के बाद विभाग एक-दूसरे पर जिम्मेदारी टालने लगते हैं।
कुल मिलाकर देखें तो दिल्ली में फायर सेफ्टी की विफलता को तब तक नहीं रोका जा सकता, जब तक प्रशासन 'जीरो टॉलरेंस' की नीति नहीं अपनाता. इसके लिए तंग गलियों में कमर्शियल गतिविधियों पर सख्ती से रोक, हर छोटी-बड़ी व्यावसायिक इमारत का रैंडम फायर ऑडिट, अवैध निर्माणों को तुरंत सील करना और आम नागरिकों व कमर्शियल स्टाफ को अनिवार्य फायर सेफ्टी ट्रेनिंग देना बेहद जरूरी है। दिल्ली में पिछले छह वर्षों में 543 लोगों की मौत यह बताती है कि आग अब सिर्फ एक आकस्मिक दुर्घटना नहीं रही। जब तक ऐसा नहीं होगा, तब तक बेकसूर जिंदगियां इसी तरह प्रशासनिक लापरवाही और व्यावसायिक लालच की आहुति चढ़ती रहेंगी।