US Fed Rate Hike Impact on Rupee, Economy and Market : अमेरिकी केंद्रीय बैंक (US Fed) ने ब्याज दर में 25 आधार अंक की बढ़ोतरी की है। नीतिगत ब्याज दर बढ़ाकर को 4 फीसदी कर दिया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप लगातार ब्याज दर घटाने की बात करते रहे। लेकिन, उनके खुद के चुने हुए फेड प्रमुख केवन वार्श ने भी अमेरिका में महंगाई, बेरोजगारी और तेल की ऊंची कीमत जैसे फैक्टर पर गौर करते हुए रेट हाइक के पक्ष में वोट किया।
जब भी कोई केंद्रीय बैंक ब्याज दर बढ़ाता है, तो इसका सीधा असर उस देश के लोगों और इकोनॉमी पर पड़ता है। ब्याज दर बढ़ने से कर्ज महंगा हो जाता है। इसकी वजह से इकोनॉमी की रफ्तार थोड़ी धीमी होती है। आम आदमी पर EMI का बोझ बढ़ता है, जिससे वह खर्च घटाता है और ओवरऑल मार्केट में लिक्विडिटी घटती है। लेकिन, फेड के फैसले का असर सिर्फ अमेरिका तक सीमित नहीं रहता है। क्योंकि अमेरिकी डॉलर आज भी ग्लोबल ट्रेड की करेंसी है। जब भी डॉलर महंगा होता है, तो डॉलर और ज्यादा आकर्षक हो जाता है।
ग्लोबल मार्केट्स के लिए क्या मायने?
ब्याज दर बढ़ने का एक सीधा मतलब यह भी होता है कि अमेरिकी डॉलर के टर्म में कर्ज महंगा हो गया है। ग्लोबल मार्केट में डॉलर के महंगे होने का दूसरा मतलब डॉलर की घर वापसी होता है। क्योंकि, जब ब्याज दर कम होती है, तो निवेशक अमेरिका से बाहर ज्यादा रिटर्न देने वाले एसेट्स में डॉलर लगाते हैं। लेकिन, जब अमेरिका में ही ब्याज दर बढ़ती है, तो निवेशक रिस्की एसेट्स से पैसा निकालकर यूएस बॉन्ड्स में लगाते हैं। यानी उन्हें अमेरिका के भीतर सुरक्षा के साथ ज्यादा रिटर्न मिलता है। इस तरह मोटे तौर पर यूएस फेड का ब्याज दर बढ़ाना ग्लोबल मार्केट्स की ग्रोथ के नेगेटिव ट्रिगर बन जाता है।
क्या RBI भी फेड की राह चलेगा?
US FED पॉलिसी रेट पूरी दुनिया को प्रभावित करने वाला फैक्टर है। लेकिन, इसका यह मतलब नहीं कि दुनिया के सभी केंद्रीय बैंक पूरी तरह इसको फॉलो करें। RBI भी अपनी स्वतंत्र मौद्रिक नीति पर काम करता है। भारत और अमेरिका की इकोनॉमी में कई तरह के बुनियादी अंतर हैं। मसलन, अमेरिका एक विकसित अर्थव्यव्स्था है, जबकि भारत विकासशील है। दोनों के आकार, घरेलू खपत, आयात-निर्यात, GDP To Debt रेश्यो जैसे कई अहम पहलुओं में बड़ा फर्क है। ऐसे में RBI फेड को फॉलो करने की जगह भारतीय अर्थव्यवस्था और भारतीय लोगों के हितों को ध्यान में रखकर फैसला करता है।
क्या रिजर्व बैंक भी बढ़ाएगा ब्याज दर?
रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति की समिति अगले महीने होने वाली है। इस बैठक में समिति के सदस्य भारतीय अर्थव्यवस्था के हालात, महंगाई, खपत और उत्पादन जैसे तमाम फैक्टर्स को ध्यान में रखकर फैसला लेंगे। हालांकि, मौजूदा आंकड़े इस यह संकेत दे रहे हैं कि रिजर्व बैंक की तरफ से भी रेपो रेट में बढ़ोतरी देखने को मिल सकती है। क्योंकि, महंगाई रिजर्व बैंक के 4% टारगेट रेट से लगातार ऊपर है। इसके अलावा पश्चिम एशिया का युद्ध भारत में महंगाई के लिहाज से आग में घी का काम कर रहा है। क्योंकि, क्रूड का दाम लगातार 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बना हुआ है। वहीं, PPCA के आंकड़ों के मुताबिक इंडियन बास्केट में सितंबर का औसत भी 112 डॉलर प्रति बैरल के करीब है।
रुपये पर क्या होगा असर?
यूएस फेड रेट हाइक का डॉलर की तुलना में रुपये पर सीधा असर होगा। रेट हाइक की वजह से डॉलर की डिमांड बढ़ेगी, जिससे डॉलर मजबूत होगा और रुपया कमजोर होगा। यहां एक पूरी चेन ऑफ इवेंट शुरू होगी, जो रुपये और इकोनॉमी पर असर डालेगी। इसे सेबी रजिस्टर्ड फर्म ओलैंडर ने अपने सोशल मीडिया पोस्ट में समझाया है, जिसे नीचे देखा जा सकता है।
भारतीय शेयर बाजार पर क्या असर होगा?
ट्रेडस्विफ्ट के फाउंडर संदीप जैन ने फेड के फैसले का भारतीय बाजार पर असर क्या असर होगा, इसे सोशल मीडिया पर एक्सप्लेन किया है। जैन का कहना है कि अमेरिकी केंद्रीय बैंक का यह फैसला भारतीय बाजार पर दबाव बढ़ा सकता है। जैन के मुताबिक फेड के रेट हाइक से ज्यादा अहम पॉलिसी आउटलुक है, जो हॉकिश नजर आती है, जिससे यह साफ हो जाता है कि आने वाले दिनों में फिर से रेट हाइक हो सकता है।
आम आदमी पर क्या होगा असर?
फेड रेट हाइक का उन लोगों पर असर होगा, जो शेयर बाजार में निवेश करते हैं। इसके अलावा अगर RBI भी रेट हाइक करता है, तो बाजार पर और ज्यादा दबाव बढ़ सकता है। हालांकि, रिजर्व बैंक के रेट हाइक का व्यापक असर होगा। इसके तहत EMI का बोझ बढ़ने से लेकर, इकोनॉमिक ग्रोथ धीमी होने तक की आशंकाएं हैं। हालांकि, दूसरा पहलू यह भी है कि जो लोग बैंक में FD के जरिये जमा करते हैं, उन्हें ज्यादा ब्याज मिल सकता है।