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मार्को रुबियो का जामनगर दौरा क्यों है खास? भारत-अमेरिका रिश्तों के बीच इसके मायने समझें

जानकारों का कहना है कि रुबियो का जामनगर दौरा ऊर्जा सुरक्षा, वेनेजुएला के तेल, रूसी कच्चे तेल, अमेरिकी निवेश और भारत-अमेरिका व्यापार वार्ता जैसे कई मुद्दों से जुड़ा है। आने वाले समय में इन बातचीतों से निकलने वाले ठोस फैसले ही बताएंगे कि यह दौरा दोनों देशों के आर्थिक संबंधों को किस दिशा में ले जाता है।

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मार्को रुबियो का जामनगर दौरा
Authored by: आलोक कुमार
Updated Oct 21, 2026, 14:02 IST
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गुजरात का जामनगर अपने पेट्रोकेमिकल हब और पीतल उद्योग के लिए जाना जाता है। लेकिन इन दिनों अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो के दौरे के कारण यह शहर चर्चा में है। दो दिवसीय भारत यात्रा के दौरान रुबियो नई दिल्ली के बजाय सीधे मुंबई पहुंचे। दौरे के दूसरे दिन वह जामनगर स्थित रिलायंस इंडस्ट्रीज की तेल रिफाइनरी का दौरा करेंगे और कंपनी के चेयरमैन एवं मैनेजिंग डायरेक्टर मुकेश अंबानी से मुलाकात करेंगे।

ईरान युद्ध, होर्मुज जलडमरूमध्य में नाकेबंदी और कच्चे तेल की कीमतों में उछाल के बीच यह दौरा अहम माना जा रहा है। इसके साथ ही, भारत-अमेरिका व्यापार और ऊर्जा संबंधों पर भी नजरें टिकी हैं। आइए समझते हैं कि जामनगर इस दौरे के लिए क्यों महत्वपूर्ण है और इसके भारत के लिए क्या मायने हैं।

रुबियो ने दिल्ली नहीं, जामनगर ही क्यों चुना?

आमतौर पर किसी देश के विदेश मंत्री की यात्रा में राजधानी में सरकारी बैठकों को प्राथमिकता दी जाती है। लेकिन रुबियो के कार्यक्रम में कारोबारी और ऊर्जा सहयोग पर विशेष जोर दिखाई देता है। मुंबई में विदेश मंत्री एस. जयशंकर से बातचीत और उद्योग जगत से संपर्क के बाद जामनगर जाना इसी दिशा में अहम है। अमेरिकी विदेश विभाग ने भी यात्रा के उद्देश्यों में रणनीतिक साझेदारी, आर्थिक सहयोग और ऊर्जा क्षेत्र के अवसरों को शामिल किया है।

बता दें कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के गृह राज्य में स्थित रिलायंस की क्रूड रिफाइनरी, दुनिया की सबसे बड़ी सिंगल-साइट रिफाइनरी है। कई मायनों में, रिलायंस इंडस्ट्रीज का कारोबार मौजूदा वैश्विक ऊर्जा संकट के केंद्र-बिंदु पर स्थित है।इसलिए यह दौरा केवल राजनयिक संपर्क तक सीमित नहीं है। यह वैश्विक ऊर्जा संकट के बीच भारत की औद्योगिक क्षमता और निजी क्षेत्र की भूमिका के महत्व को भी दर्शाता है।

जामनगर रिफाइनरी क्यों है खास?

दुनिया के सबसे बड़े एकल-स्थल तेल रिफाइनिंग कॉम्प्लेक्स में शामिल जामनगर की कुल कच्चा तेल प्रसंस्करण क्षमता 14 लाख बैरल प्रतिदिन है। कंपनी के मुताबिक, यह दुनिया की कुल रिफाइनिंग क्षमता का करीब 1.5 प्रतिशत है। इस परिसर में दो रिफाइनरियां हैं। पहली 1999 में शुरू हुई थी, जिसकी क्षमता 6.60 लाख बैरल प्रतिदिन है। दूसरी रिफाइनरी 2008 में चालू हुई। यह निर्यात-केंद्रित रिफाइनरी विशेष आर्थिक क्षेत्र (SEZ) में स्थित है और इसकी क्षमता 5.80 लाख बैरल प्रतिदिन है।

जामनगर में अंतरराष्ट्रीय बाजारों से कच्चा तेल आयात कर उसे प्रोसेस किया जाता है और तैयार पेट्रोलियम उत्पाद दुनिया भर में निर्यात किए जाते हैं। इसकी बड़ी खासियत भारी और अधिक सल्फर वाले कच्चे तेल को प्रोसेस करने की क्षमता है। रिलायंस के अनुसार, यहां 216 से अधिक किस्मों के कच्चे तेल को प्रोसेस किया जा सकता है।

यही क्षमता वेनेजुएला के तेल कारोबार में भी जामनगर को महत्वपूर्ण बनाती है। केप्लर (Kpler) के अनुमान के मुताबिक, अक्टूबर में रिलायंस का वेनेजुएला से कच्चे तेल का आयात करीब 3.50 लाख से 3.70 लाख बैरल प्रतिदिन रह सकता है। रुबियो ने पत्रकारों से कहा कि वह रिलायंस से वेनेजुएला के अधिक कच्चे तेल को रिफाइन करने के बारे में बातचीत करेंगे। इससे संकेत मिलता है कि ऊर्जा सहयोग और वैश्विक तेल व्यापार उनके दौरे के प्रमुख मुद्दों में शामिल हैं।

वैश्विक ऊर्जा के लिए रिलायंस क्यों अहम?

रिलायंस दुनिया के बड़े रिफाइंड पेट्रोलियम उत्पाद आपूर्तिकर्ताओं में शामिल है। समाचार एजेंसी रॉयटर्स के मुताबिक, कंपनी ने 2025 की पहली छमाही में जामनगर से 2.166 करोड़ टन रिफाइंड पेट्रोलियम उत्पादों का निर्यात किया। इसमें 98.1 लाख टन डीजल, 61.4 लाख टन पेट्रोल और 20.6 लाख टन जेट ईंधन शामिल था।

इस निर्यात में यूरोप की हिस्सेदारी 28 प्रतिशत रही। खरीदारों में बीपी, एक्सॉनमोबिल, ग्लेनकोर, विटोल और ट्रैफिगुरा जैसी कंपनियां शामिल हैं। एक रिपोर्ट के मुताबिक, जामनगर रिफाइनरी ने पिछले महीने अमेरिका को करीब 14.3 करोड़ डॉलर मूल्य के तेल उत्पाद भेजे।

रिलायंस के उत्पादों का वैश्विक बाजार में महत्व ऐसे समय और बढ़ जाता है, जब ईंधन की कीमतें राजनीतिक चिंता का विषय बनी हुई हैं। अमेरिका में डीजल की कीमतों पर भी नजर है, क्योंकि नवंबर में होने वाले मध्यावधि चुनावों से पहले महंगाई और ऊर्जा लागत महत्वपूर्ण मुद्दे हैं।

वहीं, सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर (CREA) की रिपोर्ट के मुताबिक, जनवरी 2026 से रूसी कच्चे तेल से बने पेट्रोलियम उत्पादों के आयात पर यूरोपीय संघ के प्रतिबंध के बावजूद, तीसरे देशों की रिफाइनरियों से आने वाले उत्पादों पर पूरी तरह रोक नहीं लगती। रूसी तेल प्रोसेस करने वाली रिफाइनरियों से यूरोप पहुंचने वाले उत्पाद इस चुनौती का उदाहरण हैं।

वेनेजुएला का तेल रुबियो के एजेंडे में क्यों?

वेनेजुएला के पास दुनिया के सबसे बड़े प्रमाणित तेल भंडार हैं। हालांकि, उसके तेल उद्योग को उत्पादन संबंधी चुनौतियों, निवेश की कमी और राजनीतिक अस्थिरता का सामना करना पड़ा है। वहां का काफी कच्चा तेल भारी और गाढ़ा होता है, जिसे प्रोसेस करने के लिए विशेष तकनीक और रिफाइनिंग क्षमता चाहिए।

जामनगर की रिफाइनरी ऐसे तेल को प्रोसेस कर सकती है। इस कारण रिलायंस वेनेजुएला के कच्चे तेल को खरीदकर उससे पेट्रोलियम उत्पाद तैयार करने वाला संभावित बड़ा साझेदार बन सकती है। केप्लर के अनुमान के अनुसार, अक्टूबर में रिलायंस का वेनेजुएला से आयात 3.50 लाख से 3.70 लाख बैरल प्रतिदिन रह सकता था। रुबियो की बातचीत से इस कारोबार को और बढ़ाने की संभावनाएं तलाशे जाने का संकेत मिलता है।

ईरान युद्ध और होर्मुज संकट का क्या असर?

वैश्विक ऊर्जा बाजार में कच्चे तेल की आपूर्ति और कीमतों का भू-राजनीतिक घटनाओं से सीधा संबंध है। पश्चिम एशिया में संघर्ष बढ़ने या समुद्री मार्गों पर खतरा पैदा होने से तेल की ढुलाई प्रभावित हो सकती है। इसका असर कच्चे तेल के साथ पेट्रोल, डीजल और विमानन ईंधन की कीमतों पर भी पड़ता है।

होर्मुज जलडमरूमध्य फारस की खाड़ी को अरब सागर से जोड़ने वाला प्रमुख समुद्री मार्ग है। यहां आपूर्ति बाधित होने से आयातक देश वैकल्पिक स्रोतों और रास्तों की तलाश कर रहे हैं। 21 अक्टूबर 2026 की रॉयटर्स रिपोर्ट के मुताबिक, मध्य पूर्व में आपूर्ति संबंधी चिंताओं के बीच ब्रेंट क्रूड 110 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गया।

रूस से तेल खरीदने का मुद्दा भी अहम

रूस से तेल खरीदने के मामले में रिलायंस की भूमिका भी अमेरिका के लिए महत्वपूर्ण है। फरवरी 2022 में यूक्रेन पर रूस के पूर्ण पैमाने पर हमले के बाद भारत चीन के बाद रूसी तेल का दूसरा सबसे बड़ा खरीदार बन गया। रिलायंस के कुल तेल आयात में रूस की हिस्सेदारी 2022 से पहले करीब 3 प्रतिशत थी, जो 2025 तक बढ़कर 50 प्रतिशत हो गई।

अगस्त 2025 में ट्रंप प्रशासन ने रूसी तेल खरीदने के मुद्दे पर भारतीय सामानों पर 25 प्रतिशत अतिरिक्त टैरिफ लगाया था। इसके बाद रिलायंस ने रूस से कच्चे तेल के आयात में कटौती की। फिर भी, जुलाई-सितंबर 2026 की तिमाही में जामनगर में प्रोसेस किए गए कुल तेल का करीब एक-तिहाई हिस्सा रूस से आया था। रूसी तेल का आयात जारी रहने पर ट्रंप प्रशासन ने भारतीय सामानों पर 100 प्रतिशत शुल्क लगाने का संकेत भी दिया था, हालांकि बाद में प्रस्तावित शुल्क रोक दिए गए।

रुबियो ने कहा है कि भारत ऊर्जा आयात के स्रोतों में विविधता ला रहा है और रूसी तेल पर निर्भरता घटा रहा है। साथ ही, उन्होंने माना कि रातोंरात दूसरे स्रोतों पर पूरी तरह निर्भर होना मुश्किल है। उन्होंने भारत को अमेरिका का महत्वपूर्ण सहयोगी और साझेदार भी बताया।

क्या रिलायंस अमेरिका में निवेश कर रही?

रिलायंस इंडस्ट्रीज अमेरिका के ऊर्जा क्षेत्र में भी निवेश से जुड़ी है। मुकेश अंबानी टेक्सास के पोर्ट ऑफ ब्राउनविले में प्रस्तावित ‘अमेरिका फर्स्ट रिफाइनिंग’ परियोजना को समर्थन दे रहे हैं। मार्च में घोषित इस परियोजना को करीब 50 वर्षों में अमेरिका की पहली बड़ी रिफाइनरी बताया गया है।

इस पर 3 से 4 अरब डॉलर खर्च होने का अनुमान है। इसकी सालाना क्षमता करीब 6 करोड़ बैरल अमेरिकी कच्चे तेल को प्रोसेस करने की होगी। रिलायंस ने यहां उत्पादित तेल का बड़ा हिस्सा खरीदने के लिए 20 साल का समझौता किया है। परियोजना के 2029 के आसपास शुरू होने की उम्मीद है। इसके अलावा, ट्रंप ने पिछले महीने कहा था कि एस्सार ग्रुप की सहायक कंपनी मेसाबी मेटालिक्स अमेरिका में 18 अरब डॉलर के एकीकृत स्टील निवेश की योजना बना रही है।

मार्को रुबियो का जामनगर दौरा

मार्को रुबियो का जामनगर दौरा

भारत-अमेरिका ट्रेड डील से दौरे का क्या संबंध?

रुबियो का दौरा ऐसे समय हो रहा है, जब भारत और अमेरिका व्यापार समझौते को अंतिम रूप देने की कोशिश कर रहे हैं। टैरिफ, बाजार तक पहुंच, निवेश और अन्य नीतिगत मुद्दे बातचीत का हिस्सा रहे हैं। रुबियो ने संकेत दिया है कि वार्ता काफी आगे बढ़ चुकी है और कुछ मुद्दों पर सहमति बाकी है। उन्होंने उम्मीद जताई कि समझौते को आने वाले कुछ हफ्तों में अंतिम रूप दिया जा सकता है।

रिलायंस जैसी बड़ी कंपनी से मुलाकात इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि दोनों देशों के आर्थिक संबंध केवल सरकारी समझौतों पर निर्भर नहीं हैं। ऊर्जा, तकनीक, विनिर्माण और निवेश में निजी कंपनियों की भागीदारी भी इन संबंधों को दिशा देती है। हालांकि, जामनगर में होने वाली बातचीत से ट्रेड डील पर तुरंत अंतिम फैसला हो जाएगा, ऐसा मानना सही नहीं होगा। यह दौरा व्यापक आर्थिक संबंधों का एक हिस्सा है।

भारत के लिए इस दौरे के क्या मायने हैं?

भारत के लिए इस दौरे में अवसर और चुनौतियां दोनों हैं। वेनेजुएला से तेल खरीदने के विकल्प बढ़ने पर ऊर्जा स्रोतों में विविधता आ सकती है, बशर्ते कीमत, गुणवत्ता और आपूर्ति की शर्तें अनुकूल हों। जामनगर की क्षमता यह भी दिखाती है कि भारत कच्चा तेल आयात करने के साथ उसे प्रोसेस करके तैयार उत्पादों का निर्यात भी कर सकता है।

रिलायंस की टेक्सास परियोजना जैसे निवेश भारतीय कंपनियों को विदेशी बाजारों में विस्तार का अवसर देते हैं। लेकिन भारत को अमेरिका के साथ ऊर्जा और व्यापार सहयोग बढ़ाते हुए अपनी ऊर्जा सुरक्षा और स्वतंत्र विदेश नीति का संतुलन भी बनाए रखना होगा। दौरे की वास्तविक सफलता का आकलन ठोस कारोबारी फैसलों, निवेश और ऊर्जा आपूर्ति में बदलाव से किया जाना चाहिए।

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