चीनी, तेल, प्याज और सब्जियों के बढ़ते दामों ने आम आदमी की रसोई का बजट बिगाड़ दिया है। दिहाड़ी मजदूरों, BPL परिवारों और निम्न मध्यम वर्ग पर इसकी सबसे ज्यादा मार पड़ रही है। गृहणियों के लिए घर का खर्च संभालना मुश्किल हो रहा है और सवाल यही है कि बढ़ती महंगाई के बीच आखिर किस खर्च में कटौती की जाए? लेकिन महंगाई की इस पूरी कहानी का एक दूसरा पहलू यह भी है कि जिस महंगाई का खामियाजा उपभोक्ता भुगत रहा है, उसका फायदा किसान को क्यों नहीं मिल रहा? महंगाई से बिचौलिए मौज में हैं, व्यापारी चांदी काट रहे हैं, लेकिन किसान की जेब आज भी खाली है।
इसी अहम सवाल को लेकर टाइम्स नाउ डिजिटल ने देश के जाने-माने कृषि विशेषज्ञ देवेंद्र शर्मा से बातचीत की। उनसे समझने की कोशिश की गई कि कृषि उत्पादों की कीमतें बढ़ने के बावजूद किसान की आमदनी और बाजार भाव के बीच इतना बड़ा अंतर क्यों है? आखिर खेत से बाजार तक पहुंचते-पहुंचते किसान की फसल की कीमत में ऐसा क्या बदल जाता है? क्यों महंगाई का बोझ उपभोक्ता और किसान दोनों पर है, जबकि फायदा बिचौलियों और व्यापारियों को हो रहा है?
किसान बेचता सस्ता, ग्राहक खरीदता महंगा
देवेंद्र शर्मा कहते हैं कि सुपरमार्केट से लेकर रिटेल दुकानों तक उपभोक्ता जिस कीमत पर सामान खरीदता है, उसका फायदा किसान तक नहीं पहुंचता। उन्होंने टमाटर का उदाहरण देते हुए बताया कि जब बाजार में टमाटर की कीमत 100 रुपये प्रति किलो तक पहुंच जाती है, तब भी मंडी में किसान को अपनी फसल के बमुश्किल 3 से 8 रुपये ही मिलते हैं। प्याज का भी यही हाल है। इसी तरह किसान से 18-20 रुपये किलो में खरीदी गई भिंडी उपभोक्ता तक पहुंचते-पहुंचते कई गुना महंगी हो जाती है।
गन्ने और चीनी के कारोबार का उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि इस पूरी व्यवस्था में कॉर्पोरेट घरानों और बड़े व्यापारियों की कमाई हो रही है। सेब के बाजार में भी स्थिति अलग नहीं है। बड़े कॉर्पोरेट ब्रांड्स 280 रुपये किलो के हिसाब से सेब बेचते हैं, वहीं, इसे उपजाने वाले किसानों को एक चौथाई भाव नहीं मिल पाता है।
खेत से ग्राहक तक कीमत का सफर
किसान की फसल खेत से निकलने के बाद सीधे ग्राहक तक नहीं पहुंचती। वह कई स्तरों से गुजरती है—स्थानीय व्यापारी, आढ़ती, मंडी, थोक कारोबारी, परिवहन, स्टोरेज और फिर रिटेल बाजार।
खेत → स्थानीय व्यापारी → मंडी/आढ़ती → थोक बाजार → रिटेलर → ग्राहक
हर पड़ाव पर कीमत और मार्जिन जुड़ता जाता है। यही वजह है कि खेत से निकलने वाली उपज उपभोक्ता तक पहुंचते-पहुंचते कई गुना महंगी हो जाती है। दूसरी ओर, किसान की स्थिति अलग है। फसल तैयार होने के बाद उसे अक्सर तुरंत बेचने की जरूरत होती है। लंबे समय तक स्टोरेज करने, बेहतर कीमत का इंतजार करने या सीधे बड़े खरीदार तक पहुंचने की उसकी क्षमता सीमित हो सकती है।
कीमतों में अंतर सबसे बड़ी समस्या
देवेंद्र शर्मा कहते हैं कि किसान की फसल का बाजार भाव बढ़ना अपने आप में समस्या नहीं है। असली समस्या तब पैदा होती है जब उपभोक्ता द्वारा चुकाई गई कीमत और किसान को मिली कीमत के बीच का अंतर लगातार बढ़ता जाता है। यानी सवाल सिर्फ यह नहीं है कि कोई चीज कितने रुपये किलो महंगी हुई। सवाल यह है कि उस बढ़ी हुई कीमत में किसान का हिस्सा कितना बढ़ा?
बिचौलिया सिर्फ एक व्यक्ति नहीं
महंगाई के खेल में बिचौलिया सिर्फ एक व्यापारी नहीं है। किसान और ग्राहक के बीच मौजूद पूरी सप्लाई चेन कीमत तय करने और उसे बढ़ाने में भूमिका निभाती है। इसीलिए किसान को बेहतर कीमत दिलाने के लिए सिर्फ मंडी या किसी एक बिचौलिए को जिम्मेदार मानना पर्याप्त नहीं होगा। पूरी सप्लाई चेन में किसान की हिस्सेदारी और कीमत तय होने की प्रक्रिया को समझना जरूरी है।
MSP का फायदा सभी किसान को नहीं
सरकार 22 फसलों के लिए MSP तय करती है। लेकिन MSP घोषित होना और किसान को वास्तव में उसी कीमत पर अपनी फसल बेच पाना दो अलग बातें हैं। यही वजह है कि कृषि महंगाई की समस्या का समाधान सिर्फ MSP बढ़ाने या अधिक फसलों को MSP के दायरे में लाने से नहीं होगा। किसान को बाजार में अपनी उपज की बेहतर कीमत हासिल करने की क्षमता भी देनी होगी।
किसान गरीब क्यों
समाधान क्या? पैकेट पर छपे किसानों की चुकाई गई कीमत
देवेंद्र शर्मा के अनुसार, अगर किसानों को उनकी उपज का बेहतर दाम दिलाना है, तो सिर्फ उत्पादन बढ़ाना काफी नहीं होगा। किसानों को बाजार में मजबूत हिस्सेदारी और कीमत तय होने की प्रक्रिया में पारदर्शिता देनी होगी। देवेंद्र शर्मा का सुझाव है कि सरकार भले ही हर फसल के लिए MSP तय न करे, लेकिन खाद्य उत्पादों की पैकेजिंग पर किसान को मिली कीमत की जानकारी देना अनिवार्य कर सकती है।
मसलन, अगर किसी सुपरमार्केट में 10 किलो आटे का पैकेट 450 रुपये में बिक रहा है, तो पैकेट पर यह भी लिखा होना चाहिए कि उस 10 किलो गेहूं के लिए किसान को कितने रुपये का भुगतान किया गया। इसी तरह दलिया, चावल और दूसरे कृषि उत्पादों की पैकेजिंग पर भी किसान को मिली कीमत का ब्योरा दिया जा सकता है। इससे उपभोक्ता को पता चलेगा कि वह जो कीमत चुका रहा है, उसमें किसान के हिस्से में कितना पैसा जा रहा है।
इस कदम से क्या बदलाव आएगा?
उपभोक्ता में जागरूकता: ग्राहक को पता चलेगा कि उसकी जेब से निकली रकम में किसान का हिस्सा कितना है और सप्लाई चेन में कितना पैसा जा रहा है।
कॉर्पोरेट और बिचौलियों पर दबाव: किसान से खरीद मूल्य और अंतिम बिक्री मूल्य के बीच का अंतर सामने आने से कंपनियों और बिचौलियों की कीमत तय करने की प्रक्रिया पर निगरानी बढ़ सकती है।
महंगाई पर लगाम: सप्लाई चेन में कीमत और मार्जिन की ज्यादा पारदर्शिता से कीमतों में अनावश्यक बढ़ोतरी को नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है।
