RBI Magicsstroke on Rupee : रुपये पर दबाव कम करने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने अब ऐसा कदम उठाया है, जिसकी रणनीति चीन भी इस्तेमाल कर चुका है। डॉलर के मुकाबले रुपये को संभालने के लिए RBI ने विदेशी मुद्रा डेरिवेटिव्स पर नया नियम लागू किया है। इसके साथ ही तेल कंपनियों की डॉलर खरीद, करेंसी हेजिंग और सट्टेबाजी पर लगाम लगाने के लिए भी कई उपाय किए गए हैं।
खास बात यह है कि 7 अक्टूबर को रेपो रेट में 25 बेसिस पॉइंट की बढ़ोतरी के बावजूद रुपये को मजबूती नहीं मिली थी। ऐसे में RBI के नए कदमों का मकसद सिर्फ बाजार में डॉलर की उपलब्धता बढ़ाना नहीं, बल्कि डॉलर की मांग को नियंत्रित करना भी है। हालांकि, रुपये की आगे की चाल काफी हद तक कच्चे तेल की कीमतों और विदेशी निवेशकों के रुख पर निर्भर करेगी।
क्या है RBI की चीन वाली चाल?
RBI ने फॉरेन एक्सचेंज रिस्क रिजर्व (FERR) के तहत रुपये से जुड़े कुछ बड़े फॉरेक्स डेरिवेटिव कॉन्ट्रैक्ट्स पर नए प्रावधान लागू किए हैं। इसके मुताबिक, 20 लाख डॉलर से ज्यादा के डेरिवेटिव्ज कॉन्ट्रैक्ट्स पर बैंकों को 20% रकम रिजर्व के रूप में रखनी होगी। यह रकम नकद में RBI के पास जमा होगी। केंद्रीय बैंक जरूरत के अनुसार इस अनुपात में बदलाव कर सकता है। इसका सीधा असर यह होगा कि रुपये में संभावित गिरावट से बचाव के लिए कुछ बड़े करेंसी डेरिवेटिव सौदे करना महंगा हो जाएगा। इससे डॉलर पर सट्टेबाजी और रुपये के खिलाफ पोजिशन बनाने की लागत बढ़ सकती है।
यही वह रणनीति है, जिसकी तुलना चीन से की जा रही है। हालांकि, दोनों देशों की परिस्थितियां अलग हैं। चीन ने मार्च में अपने FERR को 20% से घटाकर शून्य कर दिया था, क्योंकि उस समय युआन पर डॉलर के मुकाबले मजबूती का दबाव था। भारत में इसके उलट रुपये पर कमजोरी का दबाव है, इसलिए RBI ने रिजर्व की व्यवस्था का इस्तेमाल किया है।
रुपये की गिरावट रोकने के लिए हेजिंग महंगी क्यों?
आमतौर पर आयात करने वाली कंपनियां भविष्य में डॉलर महंगा होने के जोखिम से बचने के लिए हेजिंग करती हैं। मसलन, किसी भारतीय कंपनी को अगले महीने 10 लाख डॉलर का भुगतान करना है और इस दौरान रुपया कमजोर हो जाता है, तो उसे उतने ही डॉलर खरीदने के लिए ज्यादा रुपये खर्च करने पड़ेंगे।
हेजिंग से कंपनी इस जोखिम को कम कर सकती है। लेकिन, जब बाजार में रुपये की कमजोरी को लेकर चिंता बढ़ जाती है, तो डॉलर की मांग बढ़ाने वाली कुछ पोजिशन भी रुपये पर अतिरिक्त दबाव डाल सकती हैं। RBI का नया कदम ऐसे चुनिंदा बड़े सौदों की लागत बढ़ाता है। इसका मकसद वास्तविक कारोबारी जरूरतों को पूरी तरह रोकना नहीं, बल्कि रुपये के खिलाफ सट्टेबाजी और डॉलर की अतिरिक्त मांग को नियंत्रित करना है।
तेल कंपनियों की डॉलर खरीद पर RBI की नजर
भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा कच्चे तेल के आयात से पूरा करता है। तेल कंपनियों को अंतरराष्ट्रीय बाजार में भुगतान के लिए डॉलर खरीदने पड़ते हैं। जब कई बड़ी कंपनियां एक साथ डॉलर खरीदती हैं, तो डॉलर की मांग बढ़ सकती है और रुपये पर दबाव पड़ सकता है। RBI ने Indian Oil, Hindustan Petroleum और Bharat Petroleum जैसी सरकारी तेल विपणन कंपनियों की डॉलर खरीद में खुद मध्यस्थता करने का रास्ता अपनाया है।
इस व्यवस्था के तहत केंद्रीय बैंक इन कंपनियों की डॉलर जरूरत को सीधे संभाल सकता है। जरूरत पड़ने पर वह अपने विदेशी मुद्रा भंडार से भी डॉलर उपलब्ध करा सकता है। इससे बाजार में एक साथ आने वाली बड़ी डॉलर मांग का दबाव कम करने में मदद मिल सकती है।
RBI ने फॉरेक्स ट्रेडिंग पर और कौन से प्रतिबंध लगाए?
रुपये को स्थिर रखने के लिए RBI ने कुछ अन्य नियम भी सख्त किए हैं। सबसे पहला यह कि अब कैंसिल किए गए कॉन्ट्रैक्ट दोबारा बुक नहीं होंगे। इसके अलावा डबल हेजिंग पर रोक लगाई गई है। यानी जोखिम से बचाव के लिए एक ही एसेट की दो बार हेजिंग नहीं की जा सकेगी। अंडरलाइंग एसेट का प्रमाण देना होगा। यानी डेरिवेटिव्स के जरिए हेजिंग के लिए 50 लाख डॉलर से ज्यादा के एसेट का अस्तित्व साबित करना होगा। पहले बताई गई सीमा 100 मिलियन डॉलर थी। इन कदमों का मकसद ऐसे सौदों पर लगाम लगाना है, जिनसे वास्तविक कारोबारी जोखिम की तुलना में डॉलर की मांग या सट्टेबाजी बढ़ सकती है।
रेपो बढ़ने के बाद भी रुपये में नहीं आई मजबूती
रेपो बढ़ने पर रुपया क्यों नहीं सुधरा
7 अक्टूबर को RBI ने रेपो रेट 25 बेसिस पॉइंट बढ़ाकर 5.50% कर दिया था। सामान्य परिस्थितियों में ऊंची ब्याज दरें किसी मुद्रा को सहारा दे सकती हैं, लेकिन इसका असर दूसरे आर्थिक और वैश्विक कारकों पर भी निर्भर करता है। भारत के मामले में कच्चे तेल की कीमतें, व्यापार घाटा, विदेशी निवेशकों की बिकवाली और डॉलर की मांग रुपये पर दबाव डाल सकते हैं। भारत तेल का बड़ा आयातक है, इसलिए क्रूड महंगा होने पर देश की डॉलर जरूरत बढ़ सकती है।
इसके अलावा, RBI की ओर से विदेशी मुद्रा जमा आकर्षित करने के लिए खोली गई विशेष स्वैप व्यवस्था से बैंकिंग सिस्टम में रुपये की अतिरिक्त नकदी आई थी। केंद्रीय बैंक इस अतिरिक्त नकदी को नियंत्रित करने के लिए भी कदम उठा रहा है। यानी केवल ब्याज दर बढ़ाना रुपये को संभालने के लिए पर्याप्त नहीं है। डॉलर की मांग, बाजार में नकदी और विदेशी पूंजी का प्रवाह भी अहम भूमिका निभाते हैं।
क्या रुपये की गिरावट अब थम जाएगी?
RBI के कदम रुपये को कुछ राहत दे सकते हैं, लेकिन इन्हें स्थायी समाधान मानना जल्दबाजी होगी। बाजार विशेषज्ञों के मुताबिक, इन उपायों से रुपये को संभलने के लिए कुछ समय मिल सकता है। आगे की दिशा कई अहम कारकों पर निर्भर करेगी। सबसे बड़ा सवाल कच्चे तेल की कीमतों का है। यदि क्रूड महंगा बना रहता है, तो भारत के आयात बिल और डॉलर की जरूरत पर दबाव जारी रह सकता है। इसी तरह विदेशी निवेशकों की लगातार बिकवाली रुपये के लिए चुनौती बनी रह सकती है।
