कच्चे तेल का बाजार का सबसे संवेदनशील बाजार माना जाता है। एक खबर के साथ तेल की कीमत में उछाल आ जाता है। हालांकि, इस बार स्थिति बिल्कुल अलग दिखाई दे रही है। यूक्रेन ने रूसी तेल ठिकानों और रिफाइनरियों पर भयंकर ड्रोन हमले कर भारी नुकसान पहुंचाया है। वहीं, दूसरी तरफ हूती विद्रोहियों ने लाल सागर में तेल टैंकरों और सऊदी अरब के ऊर्जा ढांचे को निशाना बनाया है। सऊदी अरब के तेल पाइप लाइन और एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर को भारी नुकसान पहुंचा है। हालांकि, इतने बड़े भू-राजनीतिक संकट के बावजूद कच्चे तेल की कीमतें भड़कने के बजाय सुस्त रहीं हैं। यह भारत जैसे बड़े तेल आयातक देशों के लिए बड़ी राहत है। आखिर तेल बाजार पर इन हमलों का असर क्यों नहीं हुआ? आइए समझते हैं इस सुस्ती के पीछे का पूरा अर्थशास्त्र और वैश्विक समीकरण।
ईरान-अमेरिका में शांति से बाजार को उम्मीद
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने संकेत दिया है कि वह ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन के साथ बैठक के लिए तैयार हो सकते हैं। पेजेशकियन इस हफ्ते के अंत में संयुक्त राष्ट्र महासभा के शिखर सम्मेलन के लिए अमेरिका पहुंच सकते हैं। ट्रंप इस गुरुवार को चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मेजबानी भी करने वाले हैं और खाड़ी देशों के नेताओं से मुलाकात की संभावना भी जताई जा रही है।
इस बीच, कतर के प्रधानमंत्री शेख मोहम्मद बिन अब्दुल रहमान अल-थानी ने कहा है कि अमेरिका और ईरान के बीच संदेशों का आदान-प्रदान जारी है। ईरान ने भी इसकी पुष्टि करते हुए जून के समझौता ज्ञापन (MoU) पर लौटने से जुड़ी अपनी शर्तें दोहराई हैं। इनमें सभी मोर्चों पर युद्ध समाप्त करना, ईरान की फ्रीज की गई संपत्तियों को बहाल करना और ईरानी बंदरगाहों के आसपास नौसैनिक नाकेबंदी हटाना शामिल है।
होर्मुज से बढ़ी तेल-LNG की आवाजाही
तेल बाजार के लिए दूसरा बड़ा संकेत होर्मुज जलडमरूमध्य से बढ़ती आवाजाही है। अमेरिकी सेंट्रल कमांड के प्रमुख एडमिरल ब्रैड कूपर के मुताबिक, पिछले दो हफ्तों में होर्मुज से तेल और LNG की शिपमेंट छह महीने के उच्चतम स्तर पर पहुंच गई है। इससे संकेत मिल रहा है कि क्षेत्र में तनाव के बावजूद ऊर्जा की आवाजाही पूरी तरह ठप नहीं हुई है। इसके अलावा, सैटेलाइट तस्वीरों के अनुसार, सऊदी अरामको के रास तनूरा और जुआइमाह टर्मिनलों पर कम से कम सात ऑयल सुपरटैंकरों की एक साथ लोडिंग हो रही है। इन टैंकरों में करीब 1.4 करोड़ बैरल कच्चा तेल लादा जा सकता है।
सऊदी अरब की सप्लाई में रिकवरी
कच्चे तेल की कीमतों में आई इस नरमी का मुख्य कारण सऊदी अरब से तेल निर्यात में तेजी से हुआ सुधार है। बता दें कि हूती विद्रोहियों द्वारा सऊदी अरब की ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन और यानबू एक्सपोर्ट हब पर हमलों के बाद, सऊदी अरामको ने रेड सी (लाल सागर) के बजाए होर्मुज जलडमरूमध्य के रास्ते सप्लाई बढ़ा दी है। अगस्त में सऊदी अरब का निर्यात गिरकर 2.4 मिलियन बैरल/दिन (bpd) रह गया था, जो सितंबर में बढ़कर 4 मिलियन बैरल/दिन से अधिक हो गया है।
दुनिया में तेल की मांग भी कमजोर पड़ रही
क्रूड की कीमतों में सुस्ती की सबसे बड़ी वजह मांग में बड़ी गिरावट है। IEA ने सितंबर की रिपोर्ट में 2026 की वैश्विक तेल मांग में 2.5 मिलियन बैरल प्रतिदिन की गिरावट का अनुमान लगाया है। रिपोर्ट के मुताबिक, ऊंची ईंधन कीमतें और आर्थिक गतिविधियों पर दबाव खपत को प्रभावित कर रहे हैं। दुनिया का सबसे बड़ा तेल आयातक देश चीन इस समय अपनी आर्थिक सुस्ती से जूझ रहा है। वहां रियल एस्टेट संकट और औद्योगिक गतिविधियों की धीमी रफ्तार के कारण कच्चे तेल की मांग उम्मीद से बहुत कम रही है। अमेरिका और यूरोप में भी सख्त मौद्रिक नीतियों (ऊंची ब्याज दरों) के कारण मंदी का डर बना हुआ है, जिससे ग्लोबल ऑयल डिमांड में नरमी देखी गई। यानी एक तरफ सप्लाई पर खतरा है, लेकिन दूसरी तरफ महंगे तेल और कमजोर आर्थिक गतिविधि मांग को कम कर रही है। इससे कीमतों पर एक तरह का संतुलन बन रहा है।
कच्चा तेल
असली संकट कच्चे तेल से ज्यादा डीजल में?
IEA के मुताबिक, अगस्त में वैश्विक तेल भंडार में 95 मिलियन बैरल की गिरावट आई और फरवरी से अब तक कुल कमी करीब 507 मिलियन बैरल हो चुकी है। वहीं रिफाइनिंग सिस्टम पर भी दबाव बढ़ा हुआ है। रूस की रिफाइनरियों पर यूक्रेन के हमले और मिडिल ईस्ट में सप्लाई व्यवधान के कारण डीजल/गैसऑयल मार्केट ज्यादा असर हुआ है। IEA के अनुसार, अगस्त में Gulf देशों और रूस से डीजल/गैसऑयल का संयुक्त नेट एक्सपोर्ट फरवरी के मुकाबले करीब 1.6 मिलियन बैरल प्रतिदिन कम था।
भारत के लिए इसका क्या मतलब?
भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा कच्चे तेल के आयात से पूरा करता है। इसलिए क्रूड में किसी भी लंबे समय की तेजी से पेट्रोल-डीजल, एविएशन फ्यूल, ट्रांसपोर्ट और अंततः महंगाई पर असर पड़ सकता है। फिलहाल सऊदी सप्लाई के कुछ हिस्से प्रभावित होने के बावजूद वैकल्पिक सप्लाई उपलब्ध होने से तत्काल स्थिति पूरी तरह सप्लाई संकट जैसी नहीं दिख रही। भारत के लिए सबसे बड़ा जोखिम तब बढ़ेगा जब सऊदी तेल उत्पादन/निर्यात में लंबा व्यवधान, होर्मुज में गंभीर रुकावट और रूस की सप्लाई में अतिरिक्त कमी-तीनों एक साथ बने रहें।
