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क्यों सीजफायर के बाद भी $100 के आसपास Crude oil, खाली जहाज और बंद कुओं में छिपा जवाब

अमेरिका और ईरान के बीच सीजफायर हो चुका है। समझौते के लिए बातचीत जारी है। लेकिन, Crude Oil Price अब भी $100 प्रति बैरल के आसपास हैं। आखिर क्यों अब भी क्रूड के दाम अपेक्षा के मुताबिक नहीं घटे हैं।

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युद्ध खत्म होने के बाद भी खत्म नहीं हो रहा क्रूड का संकट
Authored by: Yateendra Lawaniya
Updated Apr 10, 2026, 15:15 IST

Iran US War फिलहाल रुक चुका है। सीजफायर के बाद दोनों देश समझौते के लिए बात कर रहे हैं। लेकिन Crude Oil Crisis अब भी बरकरार है। इसका जवाब खाली खड़े तेल के टैंकर जहाजों और बंद पड़े क्रूड ऑयल के कुओं में छिपा है। ये दोनों बता रहे हैं कि ईरान-यूएस युद्ध के बाद भले ही खत्म हो जाए, लेकिन Global Oil Crisis जल्द खत्म होने वाला नहीं है। क्योंकि, इस युद्ध की वजह से सप्लाई चेन बूरी तरह टूट चुकी है, जिसे पहले जैसे हालात तक लाने में लंबा समय लग सकता है। ईरान युद्ध के बाद बना ऑयल क्राइसिस केवल एक अस्थायी झटका नहीं है। खाली जहाज और बंद कुएं यह साफ संकेत दे रहे हैं कि सप्लाई चेन की टूटन गहरी है। जब तक उत्पादन, शिपिंग और भू-राजनीतिक स्थिरता एक साथ बहाल नहीं होती, तब तक यह संकट दुनिया की अर्थव्यवस्था पर दबाव बनाए रखेगा।

सीजफायर के बावजूद संकट क्यों

करीब 40 दिन तक चले संघर्ष के बाद अमेरिका और ईरान के बीच दो हफ्ते का सीजफायर हुआ, जिससे उम्मीद जगी कि तेल बाजार स्थिर होगा। लेकिन यह राहत सतही साबित हो रही है। युद्ध के दौरान स्ट्रेट ऑफ होर्मुज लगभग बंद हो गया था, जहां से सामान्य समय में दुनिया की करीब 20% तेल और गैस सप्लाई गुजरती है।सीजफायर के बाद रास्ता खुला जरूर है, लेकिन सप्लाई तुरंत सामान्य नहीं हो सकती। यह संकट अब केवल युद्ध का नहीं, बल्कि लॉजिस्टिक और प्रोडक्शन सिस्टम के ठप होने का है।

सप्लाई चेन की सबसे कमजोरी कड़ी

तेल बाजार की सबसे बड़ी समस्या फिलहाल शिपिंग नेटवर्क का बिखरना है। युद्ध के दौरान टैंकर दुनिया भर में अलग-अलग जगहों पर फंस गए या डायवर्ट कर दिए गए। अब जब रास्ता खुला है, तब भी इन जहाजों को वापस खाड़ी क्षेत्र में लौटने में हफ्तों लगेंगे। जब तक ये जहाज नहीं पहुंचते, तब तक लाखों बैरल तेल स्टोरेज में ही फंसा रहेगा। यही कारण है कि सप्लाई बढ़ने के बजाय अटकी हुई है, जिससे कीमतों पर दबाव बना हुआ है।

प्रोडक्शन रीस्टार्ट करना आसान नहीं

तेल संकट का दूसरा बड़ा कारण है प्रोडक्शन का गिरना। जब टैंकर नहीं मिले और स्टोरेज भर गया, तो कंपनियों को मजबूर होकर तेल कुएं बंद करने पड़े। लेकिन तेल उत्पादन को दोबारा शुरू करना स्विच ऑन करने जितना आसान नहीं होता। इसमें भारी लागत, तकनीकी तैयारी और समय लगता है। यही वजह है कि भले ही मांग बनी हुई है, सप्लाई तुरंत बढ़ नहीं पा रही। यही वजह है कि रूस को इसका फायदा हो रहा है।

200 मिलियन बैरल का झटका

युद्ध का असर आंकड़ों में और साफ दिखता है। फरवरी से मार्च के बीच खाड़ी देशों का संयुक्त तेल निर्यात 469 मिलियन बैरल से घटकर 263 मिलियन बैरल रह गया। यानी करीब 206 मिलियन बैरल की गिरावट, जो लगभग 44% है। यह नुकसान इतना बड़ा है कि इसे भरने में महीनों लग सकते हैं।

कौन से देश सबसे ज्यादा प्रभावित

तेल निर्यात में गिरावट सभी देशों में समान नहीं रही। इराक का निर्यात सबसे ज्यादा प्रभावित हुआ, जिसमें करीब 82% की गिरावट आई। कुवैत और कतर में भी 70-75% तक गिरावट दर्ज हुई। सऊदी अरब और यूएई कुछ हद तक पाइपलाइन और वैकल्पिक मार्गों की वजह से नुकसान कम कर पाए, जबकि ओमान एकमात्र देश रहा जहां निर्यात बढ़ा। यह असंतुलन दिखाता है कि वैश्विक सप्लाई कितनी अस्थिर हो चुकी है।

Crude Oil

Crude Oil

100 जहाजों जितना तेल गायब

206 मिलियन बैरल तेल की कमी को समझने के लिए एक दिलचस्प तुलना सामने आती है। यह मात्रा करीब 103 बड़े क्रूड टैंकर (VLCC) के बराबर है, जिनमें हर एक लगभग 20 लाख बैरल तेल ले जाता है। यानी बाजार से अचानक सैकड़ों जहाजों के बराबर सप्लाई गायब हो गई है।

कीमतों में उछाल और महंगाई का खतरा

युद्ध के दौरान कच्चे तेल की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बनी रही और एक समय 128 डॉलर तक पहुंच गई। जबकि युद्ध से पहले औसत कीमत करीब 65 डॉलर थी। यह उछाल केवल पेट्रोल-डीजल तक सीमित नहीं है। खाद्य कीमतों से लेकर परिवहन लागत तक हर क्षेत्र पर इसका असर पड़ रहा है। विशेषज्ञ मानते हैं कि इसका असर 2026 ही नहीं, बल्कि 2027 तक भी बना रह सकता है।

क्यों लंबा चल सकता है संकट?

तेल संकट का असली खतरा यह है कि यह केवल सप्लाई का नहीं, बल्कि सिस्टम फेलियर का संकट बन चुका है। जहाजों की कमी, बंद पड़े कुएं, क्षतिग्रस्त इंफ्रास्ट्रक्चर और अनिश्चित जियोपॉलिटिक्स मिलकर एक ऐसा चक्र बना रहे हैं, जिससे निकलना आसान नहीं होगा। यही वजह है कि सीजफायर के बावजूद बाजार में स्थिरता नहीं आ रही और ऊर्जा सुरक्षा को लेकर वैश्विक चिंता बनी हुई है।

आज कितना है क्रूड का भाव?

फिलहाल क्रूड ऑयल की कीमतों 90 से 100 के बीच में बनी हुई हैं। शुक्रवार दोपहर को ब्रेंट क्रूड 97 डॉलर प्रति बैरल पर ट्रेड कर रहा है। जबकि, WTI क्रूड करीब 100 डॉलर प्रति बैरल पर हैं।

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