Share Market Investment Strategy: शेयर बाजार में निवेशकों के सामने सबसे बड़ी चुनौती रिटर्न कमाना नहीं, बल्कि बाजार के उतार-चढ़ाव के बीच टिके रहना है। अक्सर जब बाजार बुल रन में होता है और चौतरफा तेजी दिखती है, तो हर निवेशक का जोखिम लेने का मन करता है। वहीं, जब बेयर्स हावी होते हैं और चौतरफा बिकवाली हावी होती है, तो गिरावट के दौरा में ज्यादातर निवेशक घबरा जाते हैं। ऐसे माहौल में 70-20-10 इन्वेस्टिंग स्ट्रैटेजी एक ऐसा फ्रेमवर्क देती है, जिसे इस्तेमाल करना काफी आसान है। असल में यह कोई जटिल काम नहीं, बल्कि बल्कि एसेट एलोकेशन में संतुलन बनाने का तरीका है। इससे पोर्टफोलियो को स्थिरता, ग्रोथ और रिवार्ड तीनों एक साथ मिल सकते हैं।
निवेश किस्मत नहीं अनुशासन का खेल
अक्सर किस्मत को एक सफल निवेशक बनने का सबसे बड़ा फैक्टर मान लिया जाता है। कौन सा शेयर किस्मत पलट दे, इस उम्मीद में निवेशक अपने पोर्टफोलियो में दर्जनों शेयर भर लेते हैं। लेकिन ऐतिहासिक डेटा बताता है कि किस्मत नहीं, लंबी अवधि में डाइवर्सिफाइड और अनुशासित निवेश ही बेहतर नतीजे देता है। JM Financials की एक रिपोर्ट के मुताबिक हिस्टोरिक डेडा के आधार पर इंडेक्स फंड निवेश भी यही साबित किया है कि बाजार में लगातार बने रहना बार-बार खरीद-फरोख्त से ज्यादा कारगर हो सकता है। 70-20-10 मॉडल इसी सोच पर आधारित है, जिसमें निवेश को तीन स्तरों पर बांटा जाता है।
70 प्रतिशत हिस्सा स्थिरता के लिए
शेयर बजार में इस रणनीति में कुल निवेश का 70 फीसदी हिस्सा लार्जकैप इंडेक्स फंड या मजबूत और स्थापित कंपनियों में लगाया जाता है। असल में ये ऐसी कंपनियां होती हैं, जिनका कारोबार डायवर्सिफाइड होता है। इसके अलावा बैलेंस शीट मजबूत और बाजार मौजूदगी का लंबा ट्रैक रिकॉर्ड होता है। इस कैटेगरी में सेंसेक्स और निफ्टी की शीर्ष कंपनियों को शामिल किया जा सकता है। अपने पोर्टफोलियो का 70 फीसदी पैसा लार्जकैप में डालने का फायदा यह होता है कि बाजार गिरने पर भी आपके पोर्टफोलियो में अपेक्षाकृत कम गिरावट देखने को मिलती है। इसके अलावा जब रिकवरी होती है, जब भी ये स्टॉक्स फ्रंट सीट पर रहते हैं। लॉन्ग टर्म में यह हिस्सा पोर्टफोलियो को स्थिर रिटर्न और मजबूत आधार देता है।
20 प्रतिशत हिस्से से ग्रोथ पर दांव
इस रणनीति के तहत अपने कुल निवेश का दूसरा बड़ा हिस्सा 20 फीसदी मिडकैप कंपनियों में लगाया जाए। यह एक्टिवली मैनेज्ड मिडकैप फंड में या टॉप मिडकैप कंपनियों में सीधे लगाया जा सकता है। मिडकैप कंपनियां आमतौर पर तीव्र विकास के चरण में होती हैं। इनके पास विस्तार की संभावना अधिक होती है, लेकिन उतार-चढ़ाव भी लार्जकैप की तुलना में ज्यादा रहता है।
ऐसे में यहां एक्टिव फंड मैनेजमेंट की भूमिका अहम हो जाती है। मिडकैप सेगमेंट में सूचना की असमानता और मूल्यांकन में अंतर ज्यादा होता है, जिससे कुशल फंड मैनेजर बेहतर अवसर चुन सकते हैं। यह हिस्सा पोर्टफोलियो को एक्स्ट्रा ग्रोथ देता है, जबकि कुल जोखिम फिर भी काबू मे रहता है।
10 फीसदी हिस्सा बड़े जोखिम और बड़े रिटर्न के लिए
इस फॉर्मूला में तीसरा और सबसे छोटा हिस्सा यानी करीब 10 फीसदी पैसा हाई रिस्क-हाई रिवार्ड वाले स्मॉलकैप या सेक्टोरल फंड में लगाया जाता है। स्मॉलकैप कंपनियां शुरुआती या तेज विस्तार के दौर में होती हैं। वहीं, सेक्टोरल फंड किसी खास थीम जैसे टेक्नोलॉजी, फार्मा या एनर्जी पर केंद्रित होते हैं। यह हिस्सा सबसे ज्यादा वोलैटाइल होता है, लेकिन बुल मार्केट में यही पोर्टफोलियो को तेज रफ्तार देता है। चूंकि इसका अलोकेशन सीमित रहता है, ऐसे में जब इस हिस्से में गिरावट आती है, तो भी पूरा पोर्टफोलियो उतना ज्यादा प्रभावित नहीं होता है।
ऐसे समझें पूरा गणित
मान लीजिए कोई निवेशक हर महीने शेयर बाजार में 10,000 रुपये का करता है। 70-20-10 के मुताबिक 7,000 रुपये लार्जकैप में, 2,000 रुपये मिडकैप में और 1,000 रुपये स्मॉलकैप या सेक्टोरल स्टॉक्स या इंडेक्स फंड में जाएंगे। अगर यह निवेश 10 साल तक लगातार जारी रहे और औसत वार्षिक रिटर्न लगभग 14 से 15 प्रतिशत के बीच रहे, तो कुल 12 लाख रुपये का निवेश करीब 26 लाख रुपये से ज्यादा में बदल सकता है। इसमें लार्जकैप हिस्सा स्थिर आधार तैयार देता रहेग। मिडकैप ग्रोथ देगा और और स्मॉलकैप हाई रिस्क-रिवार्ड को कवर करेगा। इसके साथ ही कंपाउंडिंग का प्रभाव भी काम करेगा।
Share Market Formula Info graph
कैसे काम करता है मॉडल?
जब बाजार में तेज गिरावट आती है, तब लार्जकैप का 70 फीसदी हिस्सा बड़ी गिरावट से बचाता है। तेजी के दौर में मिडकैप ग्रोथ देता है। इसके अलावा स्मॉलकैप एक्सेप्शनल गेन देता है। इस तरह यह मॉडल न तो पूरी तरह डिफेंसिव है है और न ही पूरी तरह एग्रेसिव। यह संतुलन निवेशक को भावनात्मक निर्णयों से दूर रखने में मदद करता है। अक्सर निवेशक बाजार को टाइमिंग के हिसाब से कैश करने की कोशिश करते हैं। लेकिन, 70-20-10 के फॉर्मूला में फोकस टाइमिंग पर नहीं, बल्कि नियमित निवेश और एसेट एलोकेशन पर होता है। इससे ने तो फोमो रहता है और न बजार की वोलैटिलिटी से घबराहट होती है।
डिस्क्लेमर: TIMES NOW नवभारत किसी स्टॉक, म्यूचुअल फंड, आईपीओ या कमोडिटी में निवेश की सलाह नहीं देता है। यहां पर केवल जानकारी दी गई है। निवेश से पहले अपने वित्तीय सलाहकार की राय जरूर लें।
