बढ़ती महंगाई के इस दौर में किसी भी व्यक्ति पर लोन चुकाने का दबाव बढ़ सकता है। खास कर नौकरी में अनिश्चितता और मेडिकल इमरजेंसी जैसी परिस्थितियों में ये दबाव और अधिक बढ़ जाता है। ठीक इसी समय पर लोग लोन रिस्ट्रक्चरिंग (Loan Restructuring) के विकल्प को चुनते हैं। लेकिन इस विकल्प को चुनने से पहले यह समझना बेहद जरूरी है कि लोन रिस्ट्रक्चरिंग (Loan Restructuring) क्या होता है, यह कैसे काम करता है और यह फैसला किन परिस्थितियों में एक सही फैसला साबित होता है-
Loan Restructuring (Photo: iStock)
Loan Restructuring क्या है?
Loan Restructuring (Photo: iStock)
सबसे पहले तो यही समझें कि Loan Restructuring क्या है? असल में जब बैंक उधार लेने वाले व्यक्ति को EMI चुकाने में आसानी के लिए पुराने लोन की शर्तों में बदलाव करता है तो इसे लोन रिस्ट्रक्चर करना कहा जाता है। इसमें बैंक या वित्तीय संस्था की ओर से लोन की अवधि, EMI और ब्याज भुगतान के तरीके में बदलाव किया जा सकता है। इसके अलावा, बैंक की ओर से ग्राहक को मोरेटोरियम पीरियड (Moratorium Period) की सुविधा दी जा सकती है।
बैंक किन ग्राहकों की करता है मदद
मोरेटोरियम पीरियड (Moratorium Period) यानी वह पीरियड जब उधारकर्ता को अपने लोन की ईएमआई चुकाने से कुछ समय की राहत मिलती है। हालांकि सवाल ये भी कि बैंक उधारकर्ता को लोन रिस्ट्रक्चरिंग की सुविधा क्यों देगा? इसे ऐसे समझिये कि बैंक आर्थिक परेशानी से गुजर रहे ग्राहक की मदद करने के लिए इस तरह की सुविधा पेश करता है। उदाहरण के लिए लोन लेने वाले ग्राहक की सैलरी कम हो जाती है, नौकरी चली जाती है, अचानक कोई मेडिकल खर्च आ जाता है या बिजनेस में मंदी आती है तो बैंक से मदद ली जा सकती है। हालांकि, बैंक यह जरूर देखता है कि ग्राहक भविष्य में दोबारा नियमित भुगतान करने की स्थिति में आ सकता है या नहीं।
Loan Restructuring का फायदा
Loan Restructuring का सबसे बड़ा फायदा ईएमआई को लेकर देखा जाता है। उदाहरण के लिए मान लीजिए कोई व्यक्ति हर महीने अपने लोन के लिए 35000 रुपये की ईएमआई भरता है, ऐसे में उसकी अचानक आय कम हो जाती है तो वह अपनी ईएमआई को कम करवा सकता है। यानी व्यक्ति इस सुविधा के साथ अपनी ईएमआई को 25000 रुपये या इससे भी कम पर ला सकता है। इससे उधारकर्ता को तुरंत राहत मिलती है और डिफॉल्ट होने का खतरा कम हो सकता है। लेकिन ईएमआई कम होने का सीधा मतलब लोन की अवधि बढ़ जाना होता है। इससे कुल ब्याज भुगतान बढ़ सकता है। यानी यह कुछ समय की राहत तो मानी जा सकती है लेकिन लॉन्ग टर्म में उधारकर्ता को ज्यादा ही रकम चुकानी पड़ जाती है। इसलिए जानकार लोन रिस्ट्रक्चरिंग को एक शॉर्ट टर्म राहत मानते हैं। इस विकल्प को एक अस्थाी आर्थिक परेशानी में ही चुनना समझदारी माना जाता है।
