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Explained: इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी क्या है? पेटेंट से लेकर AI तक, भारत कैसे मजबूत कर रहा अपना बौद्धिक संपदा इकोसिस्टम

Intellectual Property Explained: बौद्धिक संपदा यानी इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी किसी व्यक्ति या कंपनी की नई सोच, तकनीक, डिजाइन, ब्रांड और रचनात्मक काम पर मिलने वाला कानूनी अधिकार है, जो उसकी पहचान सुरक्षित रखता है। आइए इसे विस्तार से समझते हैं।

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Authored by: रामानुज सिंह
Updated Oct 3, 2026, 11:46 IST
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Intellectual Property Explained: आज की दुनिया में किसी देश की ताकत केवल उसके प्राकृतिक संसाधनों या बड़ी अर्थव्यवस्था से तय नहीं होती। नई तकनीक, नए आइडिया और उनसे बनने वाले प्रोडक्ट्स भी किसी देश की आर्थिक ताकत का बड़ा हिस्सा हैं। ऐसे में इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी यानी बौद्धिक संपदा (IP) बहुत महत्वपूर्ण हो जाती है। आइए इसे समझते हैं जब आप अपने दिमाग, मेहनत और सोच से कोई नई चीज बनाते हैं, जैसे कोई नई कहानी लिखना, एक नया ऐप बनाना, नई दवा खोजना, नया लोगो या डिजाइन बनाना तो उसे आपकी 'इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी' यानी बौद्धिक संपदा कहा जाता है। जैसे आपकी साइकिल, कार या घर पर आपका हक होता है, वैसे ही आपकी अपनी बनाई अनोखी सोच पर भी सिर्फ आपका हक होना चाहिए। कोई आपकी इजाजत के बिना उसे चुरा या बेच न सके, इसके लिए कानून आपको जो कानूनी अधिकार देता है, उन्हें 'इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी राइट्स' (IPR) कहते हैं। पेटेंट, ट्रेडमार्क, कॉपीराइट और भौगोलिक संकेत यानी GI इसके प्रमुख उदाहरण हैं।

भारत में इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी अधिकारों की देखरेख कौन करता है?

भारत में इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी से जुड़े काम की सबसे बड़ी जिम्मेदारी वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय के तहत आने वाले उद्योग एवं आंतरिक व्यापार संवर्द्धन विभाग यानी DPIIT की है। DPIIT नीतियां बनाने, कानून में बदलाव करने और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के साथ तालमेल का काम करता है। इसके तहत पेटेंट, डिजाइन और ट्रेडमार्क महानियंत्रक यानी CGPDTM काम करता है। इसके प्रमुख कार्यालय कोलकाता, दिल्ली, मुंबई और चेन्नई में हैं। पेटेंट से जुड़े अधिकारों को पेटेंट अधिनियम, 1970 के तहत देखा जाता है। ट्रेडमार्क के लिए ट्रेडमार्क अधिनियम, 1999 है। डिजाइन के लिए डिजाइन अधिनियम, 2000 लागू है। वहीं किसी खास जगह से जुड़े उत्पादों की पहचान और सुरक्षा के लिए GI कानून मौजूद है। कॉपीराइट के लिए अलग कॉपीराइट कार्यालय है। पौधों की नई किस्मों और किसानों के अधिकारों की देखरेख के लिए PPV&FRA काम करता है। सेमीकंडक्टर चिप के डिजाइन के लिए भी अलग रजिस्ट्री है।

इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी विवादों के लिए विशेष व्यवस्था

इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी से जुड़े मामले काफी तकनीकी हो सकते हैं। इसलिए कुछ बड़े हाई कोर्ट में विशेष IP डिवीजन बनाए गए हैं। दिल्ली हाई कोर्ट और मद्रास हाई कोर्ट इसमें प्रमुख हैं। IP से जुड़े नागरिक मामलों को कॉमर्शियल विवाद के तौर पर देखा जाता है। इनके लिए केस मैनेजमेंट, सारांश निर्णय और समयसीमा जैसी व्यवस्थाएं बनाई गई हैं। इसका उद्देश्य मामलों को लंबे समय तक चलने से रोकना है। पेटेंट कानून में कुछ ऐसे प्रावधान भी हैं जो पेटेंट के गलत इस्तेमाल को रोकने में मदद करते हैं। उदाहरण के लिए, पेटेंट मिलने के तीन साल बाद कुछ परिस्थितियों में कोई दूसरी पार्टी अनिवार्य लाइसेंस के लिए आवेदन कर सकती है। ऐसा तब हो सकता है जब जनता की जरूरत पूरी नहीं हो रही हो, प्रोडक्ट लोगों के लिए उचित कीमत पर उपलब्ध न हो या पेटेंट का भारत में वास्तविक इस्तेमाल नहीं हो रहा हो।

भारत में पेटेंट और इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी आवेदन तेजी से बढ़े

पिछले कुछ वर्षों में भारत में बौद्धिक संपदा से जुड़े आवेदन तेजी से बढ़े हैं। DPIIT के अनुसार, पांच साल में कुल IP आवेदनों में 44 फीसदी की वृद्धि हुई। 2020-21 में करीब 4.77 लाख आवेदन थे। 2024-25 में इनकी संख्या बढ़कर लगभग 6.90 लाख हो गई। GI यानी भौगोलिक संकेत वाले आवेदनों में भी बड़ी वृद्धि हुई। पांच साल में इनमें 380 फीसदी की बढ़ोतरी बताई गई है। 2024-25 में GI के 275 आवेदन दर्ज किए गए। पेटेंट के क्षेत्र में भी घरेलू कंपनियों और संस्थानों की भागीदारी बढ़ी है। 2024-25 में घरेलू पेटेंट आवेदन 68,201 तक पहुंच गए। यह कुल आवेदनों का 61.79 फीसदी था। भारत से अंतरराष्ट्रीय पेटेंट आवेदन भी बढ़े हैं। PCT के तहत भारतीय संस्थाओं के आवेदन 2020-21 के 964 से बढ़कर 2024-25 में 2,600 हो गए। इसका मतलब है कि भारतीय आविष्कारक अब अंतरराष्ट्रीय बाजार को भी ध्यान में रख रहे हैं।

ट्रेडमार्क और GI को भी मिल रहा बढ़ावा

आज किसी कंपनी का नाम और उसका लोगो भी उसकी बड़ी संपत्ति हो सकता है। इसलिए ट्रेडमार्क की सुरक्षा जरूरी है। भारत में ट्रेडमार्क आवेदन की प्रक्रिया को आसान बनाने के लिए 74 अलग-अलग फॉर्म को घटाकर केवल 8 फॉर्म किया गया है। साउंड मार्क जैसे गैर-पारंपरिक ट्रेडमार्क के लिए भी स्पष्ट प्रावधान किए गए हैं। GI का इस्तेमाल स्थानीय प्रोडक्ट्स की पहचान बचाने के लिए किया जाता है। इससे किसी खास इलाके के पारंपरिक उत्पाद को अलग पहचान मिलती है। भारत में 800 से ज्यादा रजिस्टर्ड GI बताए गए हैं। असम के माजुली मास्क, काजी नेमु और बनारस जरदोजी जैसे उत्पाद भी इसमें शामिल हैं। भारत ने पारंपरिक ज्ञान की सुरक्षा के लिए Traditional Knowledge Digital Library यानी TKDL भी बनाई है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि सदियों पुराने भारतीय औषधीय ज्ञान पर कोई गलत तरीके से पेटेंट न ले सके। हल्दी और नीम से जुड़े पारंपरिक उपयोग इसके उदाहरण हैं।

इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी सिस्टम को डिजिटल बनाया जा रहा

सरकार ने IP से जुड़े काम को ज्यादा डिजिटल बनाने पर भी जोर दिया है। पेटेंट से जुड़े कुछ भुगतान इलेक्ट्रॉनिक तरीके से करने पर शुल्क में 10 फीसदी की कमी की गई है। IPAS जैसी प्रणालियों का इस्तेमाल किया जा रहा है। पूर्व कला यानी पहले से मौजूद तकनीक की खोज और ट्रेडमार्क की जांच में AI का भी इस्तेमाल हो रहा है। इसका मकसद लंबित मामलों को तेजी से निपटाना है।

स्टार्टअप और छोटे कारोबार भी आगे आए

पहले पेटेंट और दूसरी इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी सुरक्षा की प्रक्रिया छोटे कारोबार और स्टार्टअप के लिए महंगी और कठिन मानी जाती थी। अब उन्हें सहायता देने के लिए कई योजनाएं हैं। SIPP योजना के तहत स्टार्टअप को IP आवेदन में पेशेवर मदद की फीस की प्रतिपूर्ति की जाती है। इससे छोटे इनोवेशन करने वालों के लिए पेटेंट प्रक्रिया आसान हुई है। 2025-26 में भारतीय स्टार्टअप्स ने 4,480 से ज्यादा पेटेंट आवेदन दाखिल किए। योजना के विस्तार के बाद स्टार्टअप पेटेंट आवेदनों की कुल संख्या 19,400 से ज्यादा हो गई है।

विश्वविद्यालयों की भूमिका भी बढ़ी

भारत के विश्वविद्यालय और शोध संस्थान भी अब पेटेंट पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं। 2024-25 में शैक्षणिक संस्थानों ने कुल पेटेंट आवेदनों में 38 फीसदी योगदान दिया। इन संस्थानों ने 45,776 आवेदन दाखिल किए। अब केवल रिसर्च पेपर प्रकाशित करने पर जोर नहीं है। नई सोच यह है कि शोध को पेटेंट में बदला जाए और फिर उसे बाजार तक पहुंचाया जाए। NIRF और KAPILA जैसी पहलों ने भी संस्थानों में IP से जुड़े काम को बढ़ावा दिया है।

AI और नई तकनीक के साथ नई चुनौतियां

भारत में कंप्यूटर साइंस, इलेक्ट्रॉनिक्स और मैकेनिकल इंजीनियरिंग जैसे क्षेत्रों में बड़ी संख्या में पेटेंट आवेदन आते हैं। इसके अलावा EV, बैटरी, IoT, सेमीकंडक्टर और AI जैसे क्षेत्रों में भी गतिविधियां बढ़ रही हैं। लेकिन नई तकनीक के साथ नए कानूनी सवाल भी पैदा हो रहे हैं। पेटेंट कानून की धारा 3(k) के तहत कंप्यूटर प्रोग्राम और एल्गोरिदम को सामान्य तौर पर आविष्कार नहीं माना जाता। इससे AI, DeepTech और SaaS कंपनियों के लिए यह समझना कठिन हो सकता है कि किस तरह की तकनीक पेटेंट योग्य है। AI से बनाए गए कंटेंट के मालिकाना हक को लेकर भी सवाल हैं। RAGHAV AI पेंट से जुड़ा कॉपीराइट मामला इस तरह की कानूनी उलझन को दिखाता है।

सबसे बड़ी समस्या पेटेंट का व्यावसायीकरण

भारत में पेटेंट आवेदन बढ़ रहे हैं, लेकिन हर पेटेंट बाजार तक नहीं पहुंचता। उपलब्ध सामग्री के अनुसार, भारत में करीब 2,30,480 पेटेंट में से केवल 1.59 फीसदी का वास्तविक व्यावसायीकरण हुआ है। उपयोग संबंधी जानकारी को जोड़ने पर भी यह दर 6.39 फीसदी तक ही पहुंचती है। इसका मतलब है कि बड़ी संख्या में शोध और आविष्कार कागज पर रह जाते हैं। वे उत्पाद या सेवा में नहीं बदल पाते। यही भारत के IP सिस्टम की बड़ी चुनौतियों में से एक है।

दिमाग की खोज से करोड़ों की कमाई तक, जानिए क्या है बौद्धिक संपदा (तस्वीर-AI)

दिमाग की खोज से करोड़ों की कमाई तक, जानिए क्या है बौद्धिक संपदा (तस्वीर-AI)

नकली सामान और पायरेसी भी बड़ी चुनौती

नकली उत्पाद, अवैध कारोबार और ट्रेडमार्क की नकल से कंपनियों को नुकसान होता है। FICCI CASCADE के बाजार अध्ययनों के अनुसार, अवैध कारोबार से वैध उद्योग को हर साल 1.05 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा की बिक्री का नुकसान होता है। सरकार को 39,000 करोड़ रुपये से ज्यादा के टैक्स राजस्व का नुकसान बताया गया है। डिजिटल दुनिया में पायरेसी भी बड़ी समस्या है। अवैध वेबसाइट और बदलते URL के कारण कॉपीराइट मालिकों के लिए अपने कंटेंट की सुरक्षा करना मुश्किल हो जाता है।

SEP और FRAND विवाद क्या हैं?

आज मोबाइल फोन, स्मार्ट मीटर, कार और दूसरी स्मार्ट तकनीकों में कई ऐसे पेटेंट इस्तेमाल होते हैं जो किसी तकनीकी मानक का जरूरी हिस्सा होते हैं। इन्हें Standard Essential Patent यानी SEP कहा जाता है। इन पेटेंट के इस्तेमाल के लिए लाइसेंस की जरूरत पड़ती है। यहां FRAND यानी निष्पक्ष, उचित और गैर-भेदभावपूर्ण शर्तों का मुद्दा आता है। भारत में घरेलू कंपनियों और विदेशी पेटेंट मालिकों के बीच ऐसे मामलों को लेकर लंबे कानूनी विवाद हुए हैं। कई मामलों में दूसरे देशों की अदालतों में भी मुकदमे और अलग-अलग तरह की निषेधाज्ञाओं का मुद्दा सामने आता है।

आगे क्या करने की जरुरत है?

भारत के IP सिस्टम को मजबूत करने के लिए कई सुझाव दिए गए हैं। सबसे पहले रिसर्च को बाजार तक पहुंचाने की व्यवस्था मजबूत करने की जरूरत बताई गई है। विश्वविद्यालयों में ऐसे Technology Transfer Offices यानी TTO बनाए जा सकते हैं, जो शोधकर्ताओं को पेटेंट, लाइसेंस और तकनीक को बाजार तक पहुंचाने में मदद करें। AI और DeepTech के लिए पेटेंट कानून में तकनीकी योगदान और तकनीकी प्रभाव को लेकर स्पष्ट नियम बनाए जाने का सुझाव है। SEP और FRAND के लिए भी स्पष्ट राष्ट्रीय नीति की जरूरत बताई गई है। इससे पेटेंट मालिकों और घरेलू कंपनियों के बीच लाइसेंसिंग विवादों को कम करने में मदद मिल सकती है। नकली सामान और डिजिटल पायरेसी रोकने के लिए सीमा शुल्क, पुलिस और उद्योग के बीच बेहतर तालमेल की जरुरत है। AI और डिजिटल फोरेंसिक जैसी तकनीक का इस्तेमाल भी बढ़ाया जा सकता है। TKDL को केवल पारंपरिक ज्ञान की रक्षा करने वाली व्यवस्था के रूप में नहीं, बल्कि भारतीय पारंपरिक ज्ञान के व्यावसायिक इस्तेमाल के लिए भी उपयोग करने का सुझाव दिया गया है। इससे स्थानीय समुदायों और पारंपरिक ज्ञान से जुड़े लोगों को आर्थिक लाभ मिल सकता है।

आइडिया से बाजार तक का सफर जरूरी

भारत में IP का पूरा सिस्टम तेजी से बदल रहा है। पेटेंट, ट्रेडमार्क और GI के आवेदन बढ़ रहे हैं। स्टार्टअप और विश्वविद्यालय भी इसमें बड़ी भूमिका निभा रहे हैं। लेकिन केवल पेटेंट की संख्या बढ़ना पर्याप्त नहीं है। किसी नए आइडिया का असली फायदा तब है, जब वह पेटेंट से निकलकर उत्पाद, सेवा या कारोबार में बदले। इसलिए भारत के सामने अगली बड़ी चुनौती “पेटेंट दाखिल करने से लेकर उसे बाजार तक पहुंचाने” की है। साथ ही AI, DeepTech, डिजिटल कॉपीराइट, SEP और नकली सामान जैसी नई चुनौतियों के लिए स्पष्ट कानून और तेज न्यायिक व्यवस्था जरूरी है। अगर शोध, पेटेंट, उद्योग और बाजार के बीच बेहतर तालमेल बनाया जाता है, तो भारत अपनी बढ़ती डिजिटल अर्थव्यवस्था को मजबूत घरेलू तकनीकी नवाचार में बदल सकता है।

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