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क्या होती है देश की गुल्लक और सोना खरीदने से कैसे होता है खाली? PM मोदी की अपील के पीछे की वजह समझें

पीएम मोदी ने देशवासियों से 1 साल से सोने नहीं खरीदने की सलाह दी है। आखिर, उन्होंने ऐसा क्यों कहा है? क्या है इसके पीछे की वजह? आइए समझते हैं।

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देश के लिए सोना खरीदना क्यों सही नहीं?
Authored by: Alok Kumar
Updated May 11, 2026, 10:17 IST
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ईरान संकट का हल नहीं निकल रहा है। इसके चलते कच्चे तेल की कीमत में आग लगी हुई है। इसका असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर हो रहा है। आयात बिल बढ़ने से चालू खाता घाटा (CAD) (Current Account Deficit) बढ़ रहा है। महंगा कच्चा तेल खरीदने से तेल कंपनियों को प्रति दिन 1700 करोड़ रुपये का नुकसान हो चुका है। इससे देश की जीडीपी रफ्तार में कमी आने की आशंका है। इस बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देशवासियों से पेट्रोल-डीजल की खपत कम करने, विदेश यात्रा से बचने और एक साल तक सोना नहीं खरीदने की सलाह दी है। आखिर, पीएम मोदी ने इस तरह की अपील क्यों की है? अगर आप भी इस सवाल का जवाब ढूंढ रहे हैं तो चलिए आपको विस्तार से बताते हैं।

परिवार की तरह देश के पास भी एक गुल्लक

किसी भी परिवार की तरह, एक देश के पास भी एक गुल्लक होती है। फर्क सिर्फ इतना है कि हमारे घर की गुल्लक में सिक्के और नोट होते हैं, लेकिन देश की इस गुल्लक में अमेरिकी डॉलर, यूरो, सोना और विदेशी प्रतिभूतियां रखी जाती हैं। देश की गुल्लक को तकनीकी भाषा में 'विदेशी मुद्रा भंडार' कहते हैं। यह गुल्लक हमारे लिए तब काम आती है जब हमें विदेशों से सामान खरीदना होता है। दुनिया के बाजार में हमारा रुपया हर जगह नहीं चलता। वहां 'डॉलर' की बादशाहत है। इसलिए, अगर हमें कच्चा तेल, मोबाइल फोन, दवाइयां या रक्षा उपकरण खरीदने हैं, तो हमें इसी गुल्लक से डॉलर निकालने पड़ते हैं।

सोना खरीदने से ऐसे खाली होता है देश की गुल्लक?

भारत में सोने को सिर्फ आभूषण नहीं, बल्कि सुरक्षा माना जाता है। लेकिन अर्थव्यवस्था के नजरिए से देखें तो सोना एक 'अनुत्पादक संपत्ति' (Non-productive Asset) है। जब आप अपनी स्थानीय दुकान से 50 ग्राम सोना खरीदते हैं, तो आप दुकानदार को रुपये देते हैं। लेकिन उस दुकानदार तक वह सोना पहुंचाने के लिए भारत सरकार को अंतरराष्ट्रीय बाजार से सोना आयात करना पड़ता है। सरकार को वह सोना खरीदने के लिए अपनी 'गुल्लक' से डॉलर खर्च करने पड़ते हैं। यानी जितना अधिक हम सोने का आयात करते हैं, उतना डॉलर खर्च होता है। इस तरह देश का खजाना या विदेशी मुद्रा भंडार कम होात है।

पीएम मोदी ने क्यों सोना नहीं खरीदने की अपील की?

अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच से पूरी दुनिया प्रभावित है। भारत भी इससे अछूता नहीं है। भारत अपनी जरूरत का करीब 85 फीसदी तेल आयात करता है। अभी भारत को दोगुने कीमत पर तेल आयात करना पड़ रहा है। इससे भारत का बजट बिगड़ रहा है। प्रधानमंत्री मोदी ने जिस खतरे की ओर इशारा किया, वह इसी वैश्विक अस्थिरता के कारण है। तेल 70 डॉलर प्रति बैरल से बढ़कर 100 डॉलर के करीब पहुंच गया है। इसके चलते हमें तेल खरीदने के लिए अपनी गुल्लक से डेढ़ गुना ज्यादा डॉलर खर्च करने पड़ रहे हैं।

ऐसे में अगर हमने पहले ही अपनी गुल्लक का बड़ा हिस्सा सोना खरीदने में खाली कर दिया है, तो हमारे पास तेल खरीदने के लिए डॉलर कम पड़ जाएंगे। जब डॉलर कम होंगे, तो रुपये की कीमत गिरेगी और देश में महंगाई बढ़ जाएगी। यानी पेट्रोल-डीजल के साथ-साथ दूध, सब्जी और बस का किराया भी महंगा हो जाएगा।

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एक साल तक सोना नहीं खरीदने से क्या होगा?

पीएम मोदी की एक साल तक सोना नहीं खरीदने की सलाह के पीछे एक दूरगामी सोच है। वह चाहते हैं कि भारतीय नागरिक कम से कम एक साल तक नया सोना खरीदने से बचें। इसके पीछे तीन मुख्य कारण हैं:

देश की गुल्लक की सुरक्षा: अगर हम सोना नहीं खरीदेंगे, तो अरबों डॉलर की बचत होगी। यह हमारे विदेशी मुद्रा भंडार को मजबूत करने का काम करेगा। यह डॉलर किसी भी आपातकालीन स्थिति (जैसे तेल संकट) में देश के काम आएंगे।

रुपये की मजबूती: जब हम विदेशी मुद्रा खर्च नहीं करते, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारतीय रुपये की साख बनी रहती है।

विकास में निवेश: सोने में फंसा हुआ पैसा अगर बैंक फिक्स्ड डिपॉजिट या अन्य योजनाओं में जाए, तो वह पैसा बैंकों के माध्यम से उद्योगों और इंफ्रास्ट्रक्चर (सड़क, पुल, स्कूल) बनाने में इस्तेमाल होता है।

भारत के गुल्लक में कितना पैसा?

भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) द्वारा शुक्रवार को जारी आंकड़ों के अनुसार, 1 मई को समाप्त सप्ताह के दौरान भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 7.794 अरब डॉलर घटकर 690.693 अरब डॉलर रह गया। ईरान संकट शुरू होने से पहले, 27 फरवरी को समाप्त सप्ताह के दौरान भारत का विदेशी मुद्रा भंडार अपने अब तक के उच्चतम स्तर $728.494 बिलियन पर पहुंच गया था। इस संघर्ष के कारण रुपये पर दबाव बढ़ा और RBI को डॉलर बेचकर विदेशी मुद्रा बाज़ार में हस्तक्षेप करना पड़ा।

किस देश का गुल्लक सबसे बड़ा?

दुनिया के अधिकांश देशों का भंडार अमेरिकी डॉलर में है, और वैश्विक स्तर पर चीन के पास सबसे बड़ा विदेशी मुद्रा भंडार (गुल्लक) है। यह भंडार राष्ट्रीय मुद्रा को स्थिर करने और आर्थिक अनिश्चितता के दौरान मौद्रिक नीति का समर्थन करने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होता है। केंद्रीय बैंक इनका उपयोग देनदारियों के समर्थन और मौद्रिक नीति को प्रभावित करने के लिए करते हैं। यह तब एक 'बैकअप फंड' के रूप में कार्य करता है जब देश की अपनी मुद्रा का मूल्य गिर जाता है। अधिकांश भंडार डॉलर, पाउंड, यूरो या येन में रखे जाते हैं ताकि बाजार के झटकों से बचा जा सके।

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