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अमेरिका का ‘स्पेस वेपन्स’ क्या है? क्यों डरी दुनिया? जानें कितनी ताकत और कितना खर्च

अमेरिका के सेक्रेटरी ऑफ द एयर फोर्स ट्रॉय मींक ने यह स्वीकार करके दुनिया में खलबली मचा दी है कि वाशिंगटन ने अंतरिक्ष में अपने ‘ऑन-ऑर्बिट स्पेस कंट्रोल वेपन्स’ को तैनात कर दिए हैं।

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स्पेस वेपन्स
Authored by: आलोक कुमार
Updated Sep 16, 2026, 12:08 IST
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अमेरिका ने पहली बार खुले तौर पर माना है कि उसने पृथ्वी की कक्षा यानी ऑर्बिट में अंतरिक्ष हथियार तैनात किए हैं। अमेरिकी वायु सेना के सेक्रेटरी ट्रॉय मेइंक ने बताया कि इन ‘स्पेस कंट्रोल वेपन्स’ का इस्तेमाल अमेरिकी सेना को दुश्मन के हमलों से बचाने के लिए किया जाएगा। हालांकि, अमेरिका ने यह नहीं बताया है कि ये हथियार किस तरह के हैं, इन्हें कब अंतरिक्ष में भेजा गया और इनकी संख्या कितनी है। यही वजह है कि इस घोषणा के बाद अंतरिक्ष में बढ़ती हथियारों की होड़ को लेकर चर्चा तेज हो गई है।

क्या होते हैं Space Weapons?

आसान भाषा में समझें तो स्पेस वेपन्स ऐसे हथियार या सिस्टम हैं, जिनका इस्तेमाल अंतरिक्ष में मौजूद सैटेलाइट और दूसरे सिस्टम को प्रभावित करने, जाम करने, निष्क्रिय करने या जरूरत पड़ने पर नष्ट करने के लिए किया जा सकता है। आज दुनिया की सेनाएं सैटेलाइट पर काफी निर्भर हैं। GPS, सैन्य संचार, खुफिया जानकारी, मिसाइलों की निगरानी और कई दूसरी सेवाएं सैटेलाइट के जरिए चलती हैं। ऐसे में किसी देश के सैटेलाइट को नुकसान पहुंचने पर सिर्फ अंतरिक्ष में ही असर नहीं होगा, बल्कि जमीन पर मौजूद सैन्य और नागरिक सेवाएं भी प्रभावित हो सकती हैं।

अमेरिका के हथियार कितने ताकतवर हैं?

अमेरिका ने अभी तक यह साफ नहीं किया है कि ऑर्बिट में तैनात हथियारों की तकनीक क्या है। हालांकि, अमेरिकी बयान में ‘काइनेटिक’ और ‘नॉन-काइनेटिक’ दोनों तरह की क्षमताओं का जिक्र किया गया है। नॉन-काइनेटिक हथियारों में जैमिंग, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर और साइबर जैसे तरीके शामिल हो सकते हैं। इनका मकसद सैटेलाइट को सीधे नष्ट करने के बजाय उसके सिग्नल या काम करने की क्षमता को प्रभावित करना हो सकता है।

दूसरी तरफ काइनेटिक हथियार किसी सैटेलाइट को सीधे टक्कर मारकर नष्ट कर सकते हैं। ऐसी कार्रवाई से अंतरिक्ष में बड़ी मात्रा में मलबा पैदा हो सकता है, जो दूसरे सैटेलाइट के लिए भी खतरा बन सकता है। अमेरिका ने अभी यह स्पष्ट नहीं किया है कि उसके ऑर्बिट में मौजूद हथियार इनमें से किस तकनीक पर आधारित हैं।

Space Weapons पर कितना खर्च करता है अमेरिका?

अमेरिका अंतरिक्ष सुरक्षा और सैन्य सैटेलाइट पर हर साल अरबों डॉलर खर्च करता है। हालांकि, ऑर्बिट में हाल ही में बताए गए इन खास ‘स्पेस कंट्रोल वेपन्स’ पर कितना खर्च हुआ है, इसकी जानकारी सार्वजनिक नहीं की गई है। इसलिए अभी यह कहना मुश्किल है कि इन हथियारों को बनाने और तैनात करने में कुल कितना पैसा खर्च हुआ है।

स्पेस वेपन्स पर अनुमानित लागत

हथियार/सिस्टम का प्रकारभारतीय रुपये में खर्च (लगभग)
एक सिंगल स्पेस-कंट्रोल/जैमर सैटेलाइट₹830 करोड़ से ₹4,150 करोड़+ प्रति यूनिट
मल्टी-सैटेलाइट डिफेंस नेटवर्क (Constellation)₹12,500 करोड़ से ₹41,500 करोड़+
X-37B जैसा गुप्त स्पेसप्लेन प्रोजेक्ट₹8,300 करोड़ से ₹25,000 करोड़+ (डेवलपमेंट व लॉन्च)
यूएस स्पेस फोर्स का वार्षिक बजट (USSF Budget)₹2,50,000 करोड़ से अधिक प्रति वर्ष

दुनिया क्यों डरी हुई है?

अमेरिकी घोषणा के तुरंत बाद रूस और चीन ने इस पर कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि अमेरिका 'अंतरिक्ष को युद्ध के मैदान में बदल रहा है'। रक्षा विशेषज्ञों और वैज्ञानिकों के मन में इस तैनाती को लेकर भारी डर है, जिसके मुख्य कारण निम्नलिखित हैं:

1. न्यूक्लियर से भी खतरनाक ‘कैसलर सिंड्रोम’: अगर अंतरिक्ष में दो सैटेलाइट्स आपस में टकराते हैं या मिसाइल से उड़ाए जाते हैं, तो उनके धातु के लाखों छोटे-छोटे टुकड़े 28,000 किमी/घंटे की गति से कक्षा में घूमने लगेंगे।एक छोटा सा 1 सेंटीमीटर का टुकड़ा भी किसी दूसरे सैटेलाइट से टकराकर उसे नष्ट कर सकता है।इससे एक चेन रिएक्शन शुरू होगा, जिसे 'कैसलर सिंड्रोम' कहते हैं।यदि ऐसा हुआ, तो पूरी लो-अर्थ ऑर्बिट (LEO) मलबे से भर जाएगी और इंसान का अंतरिक्ष में जाना और सैटेलाइट्स का काम करना सदियों के लिए बंद हो जाएगा।

2. इंटरनेट, GPS और बैंकिग व्यवस्था का पूरी तरह ठप होना: आज की आधुनिक दुनिया पूरी तरह से अंतरिक्ष पर निर्भर है। अगर स्पेस वेपन्स का इस्तेमाल होता है, तो: दुनिया भर के GPS और नेविगेशन सिस्टम बंद हो जाएंगे।एयरलाइन रूट, शिपिंग और मिलिट्री ड्रोन काम करना बंद कर देंगे।इंटरनेशनल बैंकिंग, ATM ट्रांजैक्शन और शेयर बाजार पूरी तरह क्रैश हो जाएंगे क्योंकि वे सैटेलाइट टाइमिंग सिग्नल पर निर्भर हैं।

चीन-रूस की क्या तैयारी?

चीन और रूस पहले से ही काउंटर-स्पेस तकनीकों पर काम कर रहे हैं। रूस के पास 'कॉस्मॉस' सीरीज के इंस्पेक्टर सैटेलाइट्स हैं, वहीं चीन ने रोबोटिक आर्म वाले सैटेलाइट्स बनाए हैं जो दूसरे उपग्रहों को खींच सकते हैं। अमेरिका के इस आधिकारिक कबूलनामे के बाद अब चीन और रूस भी खुले तौर पर अपने स्पेस वेपन्स कक्षा में उतारेंगे, जिससे अंतरिक्ष में हथियारों की एक नई रेस शुरू हो जाएगी।

चीन-रूस ने क्या प्रतिक्रिया दी?

अमेरिका की घोषणा के बाद चीन ने अंतरिक्ष में हथियारों की होड़ बढ़ने पर चिंता जताई है। चीन ने अमेरिका से अंतरिक्ष में अपनी सैन्य क्षमताओं का विस्तार रोकने और अंतरिक्ष को युद्ध का मैदान नहीं बनाने की अपील की है।रूस ने भी कहा है कि अंतरिक्ष को हथियारों से मुक्त रखने की दिशा में अंतरराष्ट्रीय सहयोग जारी रहना चाहिए।

वहीं अमेरिका का कहना है कि चीन और रूस पहले से ही ऐसी क्षमताएं विकसित कर रहे हैं, जिनका इस्तेमाल अमेरिकी सैटेलाइट और अंतरिक्ष आधारित सेवाओं को प्रभावित करने के लिए किया जा सकता है।

क्या भारत के पास भी ऐसी क्षमता है?

भारत भी अंतरिक्ष सुरक्षा के क्षेत्र में अपनी क्षमताएं विकसित कर रहा है। भारत ने 2019 में एंटी-सैटेलाइट यानी ASAT क्षमता का सफल परीक्षण किया था। इसके अलावा भारत ऐसी तकनीकों पर भी काम कर रहा है, जिनकी मदद से एक अंतरिक्ष यान दूसरे सैटेलाइट के करीब जाकर उसके साथ ऑपरेशन कर सकता है। अंतरिक्ष में सैन्य क्षमताएं विकसित करने की दौड़ अब सिर्फ अमेरिका, रूस और चीन तक सीमित नहीं है। फ्रांस, ब्रिटेन, इजरायल, ईरान, दक्षिण कोरिया और उत्तर कोरिया भी अलग-अलग तरह की अंतरिक्ष और काउंटर-स्पेस क्षमताओं पर काम कर रहे हैं।

क्या अंतरिक्ष में हथियार रखना गैरकानूनी है?

अंतरिक्ष में हथियारों को लेकर 1967 की ‘आउटर स्पेस ट्रीटी’ सबसे अहम अंतरराष्ट्रीय समझौता है। यह संधि देशों को पृथ्वी की कक्षा या अंतरिक्ष में परमाणु हथियार और बड़े पैमाने पर तबाही मचाने वाले हथियार रखने से रोकती है। चंद्रमा और दूसरे खगोलीय पिंडों पर सैन्य ठिकाने बनाने और हथियारों का परीक्षण करने पर भी रोक है। लेकिन यह संधि पृथ्वी की कक्षा में हर तरह के पारंपरिक हथियारों पर पूरी तरह रोक नहीं लगाती। यही वजह है कि एंटी-सैटेलाइट हथियार, जैमिंग सिस्टम और दूसरी काउंटर-स्पेस तकनीकों को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लगातार बहस होती रही है।

अंतरिक्ष में हथियारों की तैनाती

अंतरिक्ष में हथियारों की तैनाती

क्या अंतरिक्ष बनेगा जंग का मैदान?

अंतरिक्ष पहले से ही आधुनिक युद्ध का अहम हिस्सा बन चुका है। सेनाएं GPS, कम्युनिकेशन, निगरानी और खुफिया जानकारी के लिए सैटेलाइट पर निर्भर हैं। अगर युद्ध की स्थिति में किसी देश के सैटेलाइट को निशाना बनाया जाता है, तो इसका असर सिर्फ सेना तक सीमित नहीं रहेगा। इंटरनेट, नेविगेशन, संचार और दूसरी जरूरी सेवाएं भी प्रभावित हो सकती हैं।

सबसे बड़ी चिंता अंतरिक्ष में पैदा होने वाले मलबे को लेकर है। अगर कोई बड़ा सैटेलाइट नष्ट होता है तो उसके हजारों टुकड़े ऑर्बिट में फैल सकते हैं। ये मलबा दूसरे सैटेलाइट से टकराकर और नुकसान पैदा कर सकता है। अमेरिका का कहना है कि उसकी अंतरिक्ष क्षमताओं का इस्तेमाल हमले और बचाव दोनों के लिए किया जा सकता है और इनका मकसद अमेरिकी सेना को सुरक्षित रखना है। दूसरी तरफ जानकारों का मानना है कि अंतरिक्ष में हथियारों की खुली तैनाती से दूसरे देश भी अपनी क्षमताएं बढ़ाने के लिए प्रेरित हो सकते हैं। इससे अंतरिक्ष में हथियारों की होड़ बढ़ने का खतरा है।

यानी आने वाले समय में अंतरिक्ष सिर्फ सैटेलाइट और वैज्ञानिक खोज का क्षेत्र नहीं रहेगा, बल्कि दुनिया की सैन्य ताकत और सुरक्षा रणनीति का भी अहम मोर्चा बन सकता है।

हमारे ऊपर क्या असर होगा?

अंतरिक्ष की सैन्य होड़ सुनने में बहुत दूर की चीज लग सकती है, लेकिन इसका असर जमीन पर भी पड़ सकता है। आज बैंकिंग, विमानन, मोबाइल कम्युनिकेशन, मौसम की निगरानी, नेविगेशन, समुद्री परिवहन और सैन्य प्रणालियां अलग-अलग तरह से सैटेलाइट सेवाओं पर निर्भर हैं। अगर किसी बड़े संघर्ष में सैटेलाइट सेवाएं लंबे समय तक बाधित होती हैं, तो इसका असर सिर्फ सेना पर नहीं बल्कि कम्युनिकेशन, नेविगेशन और कई जरूरी आर्थिक गतिविधियों पर भी पड़ सकता है।

यही वजह है कि अमेरिका का ‘स्पेस वेपन्स’ वाला ऐलान सिर्फ एक नए हथियार की खबर नहीं है। यह इस बात का संकेत है कि अंतरिक्ष अब वैश्विक सुरक्षा और सैन्य रणनीति का और भी महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है।

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