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$200 क्रूड की तैयारी कर रहा अमेरिका, कैसे दुनिया पर एक साथ होगा मंदी और महंगाई का डबल अटैक?

अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप एक तरफ जहां ईरान युद्ध को खत्म बता रहे हैं। वहीं, उनका प्रशासन क्रूड के 200 डॉलर पहुंचने की स्थिति से निपटने की तैयारी में जुटा है। अगर क्रूड इस स्तर पर पहुंचता है, तो भारत सहित पूरी दुनिया पर एक साथ मंदी और महंगाई का डबल अटैक हो सकता है, जिसे अर्थशास्त्र की भाषा में 'स्टैगफ्लेशन' कहा जाता है।

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पूरी दुनिया में बढ़ेगी महंगाई
Authored by: Yateendra Lawaniya
Updated Mar 26, 2026, 13:51 IST
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Crude Oil 200 Dollar Energy Crisis 2026: अमेरिका-इजरायल ने ईरान के खिलाफ जो युद्ध छेड़ा है, उसकी सजा पूरी दुनिया को क्रूड के बढ़ते दाम के तौर पर चुकानी पड़ रही है। फिलहाल, राहत की बात यह है कि अमेरकी राष्ट्रपति ट्रंप दावा कर रहे हैं कि दोनों देशों के बीच समझौते पर बात हो रही है। हालांकि, दूसरी तरफ ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट बताती है कि ट्रंप प्रशासन के शीर्ष अधिकारी क्रूड ऑयल की कीमत 200 डॉलर प्रति बैरल पहुंचने की स्थिति से निपटने की तैयारी कर रहे हैं।

क्यों समीकरणों से बाहर नहीं 200 डॉलर?

फिलहाल, अमेरिका ने ईरान के ऊर्जा ठिकानों पर हमले रोके हैं। न युद्ध रुका है, न समझौता हुआ है। बिजनेस इनसाइडर की एक रिपोर्ट कहती है कि अब भी क्रूड के 200 डॉलर प्रति बैरल पहुंचने की आंशका समीकरणों से बाहर नहीं है। इसे लेकर IMF के पूर्व अर्थशास्त्री ऑलिवर ब्लैंचर्ड का कहना है कि अब एक ऐसे सिनेरियो का होना मुश्किल नहीं, जहां ऑयल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची बन सकती हैं।

वहीं, JPMorgan के पूर्व क्वांट चीफ मार्को कोलैनोविक का मानना है कि मौजूदा सप्लाई डायनेमिक्स के हिसाब से क्रूड की कीमत लंबे समय तक 150 से 200 डॉलर प्रति बैरल के बीच टिक जाएं, ऐसी स्थितियों से इन्कार नहीं किया जा सकता है। वहीं, अमेरिका के ऊर्जा मंत्री क्रिस राइट भी दबे स्वर में यह बात मान चुके हैं कि क्रूड के 200 डॉलर तक पहुंचने की आशंका को पूरी तरह समीकरणों से बाहर नहीं माना जा सकता है।

क्या बताता है ऑयल संकट का इतिहास ?

तेल की कीमतों में उछाल का इतिहास बेहद अहम संकेत देता है। 1973 का ऑयल एम्बार्गो, 1979 की ईरान क्रांति, 1990 का गल्फ वॉर और 2008 का कमोडिटी बूम, हर घटना ने वैश्विक अर्थव्यवस्था को गहरे संकट में डाला। 2008 में तेल 147 डॉलर तक पहुंचा था, जो आज के मूल्य के हिसाब से करीब 200 डॉलर के बराबर बैठता है। उसी समय दुनिया ग्लोबल फाइनेंशियल क्राइसिस में फंस गई थी। इससे स्पष्ट है कि जब भी तेल की कीमतें चरम पर पहुंचती हैं, तो उसका असर केवल ऊर्जा क्षेत्र तक सीमित नहीं रहता बल्कि पूरी आर्थिक संरचना प्रभावित होती है।

पहले होगा महंगाई का विस्फोट

नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री जोसेफ स्टिग्लिट्ज के मुताबिक अमेरिका ने ईरान के साथ युद्ध छेड़कर अमेरिका सहित पूरी दुनिया को स्टैगफ्लेशन में जाने के बड़े खतरे में डाल दिया है। वहीं, ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि अगर कच्चा तेल 200 डॉलर तक पहुंचता है, तो पेट्रोल, डीजल, गैस और बिजली की लागत बढ़ने से ट्रांसपोर्ट और उत्पादन लागत बढ़ेगी, जिससे पूरी दुनिया में महंगाई बढ़ेगी। महंगाई का असर हर वस्तु और सेवा पर पड़ेगा, जिससे आम उपभोक्ता की क्रय शक्ति घटेगी। ऐसी स्थिति में सेंट्रल बैंक के सामने दुविधा खड़ी होगी। एक तरफ महंगाई को काबू करना होगा और दूसरी तरफ आर्थिक विकास को बचाना होगा। यही स्थिति स्टैगफ्लेशन कहलाती है, जो नीति निर्माताओं के लिए सबसे कठिन चुनौती मानी जाती है।

क्रूड के दाम बढ़ने का गहरा होगा असर

क्रूड के दाम बढ़ने का गहरा होगा असर

फिर ग्लोबल ग्रोथ पर लगेगा ब्रेक

ऊर्जा की कीमतों में उछाल का सीधा असर कंपनियों की लागत पर पड़ता है। एविएशन, मैन्युफैक्चरिंग, लॉजिस्टिक्स और एग्रीकल्चर जैसे सेक्टर सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं। कई कंपनियां लागत का बोझ ग्राहकों पर डालती हैं, जिससे महंगाई और बढ़ती है, जबकि कुछ कंपनियां लागत कम करने के लिए कर्मचारियों की संख्या घटाती हैं। विश्लेषण बताते हैं कि अगर तेल 170 डॉलर से ऊपर लंबे समय तक बना रहता है तो, न केवल अमेरिका और यूरोप की ग्रोथ पर असर पड़ेगा। बल्कि, भारत और चीन सहित दुनिया के कई बड़े इकोनॉमिक पावरहाउस भी स्लो पड़ जाएंगे, जिससे वैश्विक अर्थव्यवस्था मंदी की ओर बढ़ सकती है।

किसे फायदा, किसे नुकसान

तेल की कीमतों में तेजी का असर वैश्विक राजनीति पर भी गहराई से पड़ता है। Vladimir Putin के नेतृत्व वाला रूस ऐसे समय में सबसे ज्यादा लाभ में रह सकता है क्योंकि ऊंची कीमतें उसकी आय बढ़ाती हैं। वहीं, भारत जैसे बड़े ऊर्जा आयातक देशों पर दबाव बढ़ता है।

भारत पर डबल असर

भारत जैसे आयात-निर्भर देश के लिए 200 डॉलर का तेल गंभीर चुनौती बन सकता है। तेल महंगा होने से चालू खाता घाटा बढ़ेगा, रुपये पर दबाव आएगा और महंगाई तेज हो सकती है। इसके चलते ब्याज दरें लंबे समय तक ऊंची रह सकती हैं, जिससे लोन महंगे होंगे और खपत पर असर पड़ेगा। यह स्थिति भारत की आर्थिक रिकवरी को धीमा कर सकती है और बाजारों में अस्थिरता बढ़ा सकती है।

शेयर बाजार और निवेश

ऊंची तेल कीमतों का असर शेयर बाजार पर भी साफ दिखता है। कंपनियों की कमाई पर दबाव बढ़ने से बाजार में गिरावट आ सकती है। ऐसी स्थिति में वैश्विक इक्विटी बाजारों में 30 से 40 प्रतिशत तक गिरावट संभव है। हालांकि, इतिहास बताता है कि हर बड़े संकट के बाद बाजारों में रिकवरी भी होती है। ऐसे समय में अनुशासित निवेशकों को लंबी अवधि में फायदा मिलता है।

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