US Midterm Results : अमेरिका के मिडटर्म चुनाव में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी को बड़ा झटका लगा है। डेमोक्रेटिक पार्टी ने अमेरिकी संसद के दोनों सदनों- सीनेट और हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स में बहुमत हासिल कर लिया है। यानी ट्रंप के लिए अब अपने एजेंडे को आगे बढ़ाना आसान नहीं होगा।
इस राजनीतिक बदलाव का असर भारत पर भी पड़ सकता है। खासकर भारत-अमेरिका ट्रेड डील, टैरिफ, कच्चे तेल की कीमतों, रुपये और शेयर बाजार पर। कमजोर अमेरिकी डॉलर और बॉन्ड यील्ड में गिरावट से भारत को कुछ राहत के संकेत मिले हैं। लेकिन क्या इससे भारतीय सामान पर अमेरिकी टैरिफ घटेंगे? क्या अटकी ट्रेड डील आगे बढ़ेगी? आइए समझते हैं।
क्या भारत पर टैरिफ की तलवार हटेगी?
भारत के लिए सबसे बड़ा सवाल यही है। ट्रंप की टैरिफ नीति ने भारतीय निर्यातकों के लिए अमेरिकी बाजार में अनिश्चितता बढ़ाई है। फरवरी 2026 में भारत-अमेरिका के बीच हुए अंतरिम व्यापार समझौते के फ्रेमवर्क के तहत भारतीय सामान पर पहले लगाए गए 50% दंडात्मक टैरिफ को घटाकर 18% करने की बात तय हुई थी। इसके बाद अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने ट्रंप के व्यापक इमरजेंसी टैरिफ को अमान्य कर दिया, जिससे 10% बेसलाइन टैरिफ व्यवस्था लागू हुई।
हालांकि, दोनों देशों के बीच अंतिम ट्रेड डील अब भी अटकी हुई है। 6 अक्टूबर की Reuters रिपोर्ट के मुताबिक, बातचीत फिलहाल ठहराव पर पहुंच गई है। डेमोक्रेट्स की जीत से ट्रंप की टैरिफ नीति की संसदीय जांच बढ़ सकती है। लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति के पास व्यापार नीति से जुड़े कई कार्यकारी अधिकार अब भी हैं। यानी टैरिफ पर दबाव जरूर बढ़ेगा, लेकिन भारतीय निर्यातकों को तत्काल बड़ी राहत मिलने की गारंटी नहीं है।
भारत-अमेरिका ट्रेड डील का क्या होगा?
डेमोक्रेट्स के नियंत्रण वाली संसद में ट्रंप प्रशासन के व्यापारिक समझौतों की ज्यादा समीक्षा हो सकती है। भारत के साथ प्रस्तावित समझौते में ऊर्जा, मैन्युफैक्चरिंग, निवेश और बाजार तक पहुंच जैसे मुद्दे शामिल हैं। इसके बावजूद भारत-अमेरिका व्यापारिक रिश्तों में पूरी तरह रुकावट की आशंका नहीं है। दोनों प्रमुख अमेरिकी पार्टियों में भारत के साथ आर्थिक संबंध मजबूत करने को लेकर समर्थन रहा है। ब्रोकरेज फर्म Emkay Global का मानना है कि किसी विश्वसनीय ट्रेड डील की संभावना फिलहाल दूर है और मिडटर्म चुनाव के नतीजे इस स्थिति को तुरंत बदलते नहीं दिख रहे हैं।
सस्ता क्रूड देगा भारत को राहत?
भारत के लिए चुनाव का एक बड़ा असर कच्चे तेल पर पड़ सकता है। डेमोक्रेट्स की जीत के बाद ट्रंप पर ईरान के साथ जारी युद्ध को लेकर राजनीतिक दबाव बढ़ सकता है। सैन्य खर्च और युद्ध की रणनीति पर संसद में सवाल उठ सकते हैं। अगर अमेरिका-ईरान तनाव कम होता है तो कच्चे तेल की कीमतों को राहत मिल सकती है। इससे भारत का इंपोर्ट बिल, महंगाई और ऑयल मार्केटिंग कंपनियों (OMCs) पर दबाव घट सकता है। लेकिन फिलहाल बाजार में ऐसा होता नहीं दिख रहा। 4 नवंबर को ब्रेंट क्रूड 0.8% उछलकर 104.42 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया। ईरान के साथ समझौते को लेकर अनिश्चितता और होर्मुज जलडमरूमध्य में सप्लाई जोखिम इसकी वजह बने हुए हैं।
अमेरिकी मिडटर्म इलेक्शन का भारत पर असर
कमजोर डॉलर से रुपये और शेयर बाजार को फायदा?
अमेरिकी चुनाव नतीजों के बीच डॉलर और अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड यील्ड में नरमी आई है। इसके पीछे बाजार की यह धारणा है कि डेमोक्रेट्स के मजबूत होने से अमेरिकी सरकार की आगे की आर्थिक और वित्तीय नीतियों पर अंकुश बढ़ सकता है। भारत के लिए इसके तीन संभावित फायदे हैं।
रुपये को राहत: कमजोर डॉलर से रुपये पर दबाव कम हो सकता है और आयात की लागत को नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है।
FII की वापसी: अमेरिकी बॉन्ड यील्ड घटने से विदेशी निवेशकों के लिए भारतीय शेयर बाजार जैसे उभरते बाजारों का आकर्षण बढ़ सकता है।
कंपनियों को फायदा: वैश्विक बॉन्ड यील्ड में गिरावट से विदेशी बाजारों से कर्ज जुटाने वाली कंपनियों को राहत मिल सकती है।
AI और IT सेक्टर पर भी नजर
अमेरिका में डेमोक्रेट्स की जीत से बड़ी टेक कंपनियों, AI और डेटा सेंटर कारोबार पर नियामकीय निगरानी बढ़ सकती है। इससे अमेरिकी टेक कंपनियों के निवेश और डेटा सेंटर प्रोजेक्ट्स की रफ्तार प्रभावित होने की आशंका है। भारतीय IT कंपनियों के लिए यह महत्वपूर्ण है, क्योंकि अमेरिका उनका प्रमुख बाजार है। वहीं, H-1B वीजा और इमिग्रेशन नीतियों पर भी अमेरिकी संसद में ज्यादा चर्चा हो सकती है। हालांकि, किसी बड़े नीतिगत बदलाव की तत्काल उम्मीद नहीं है।
भारत के लिए कितना बड़ा है यह बदलाव?
डेमोक्रेट्स की जीत से ट्रंप की आर्थिक और विदेश नीति पर राजनीतिक निगरानी बढ़ेगी, लेकिन राष्ट्रपति के अधिकार खत्म नहीं होंगे। ट्रेड और टैरिफ, विदेश नीति और कार्यकारी फैसलों पर ट्रंप का प्रभाव बना रहेगा। भारत के लिए कमजोर डॉलर और संभावित सस्ता क्रूड राहत के रास्ते खोल सकते हैं। लेकिन ट्रेड डील, टैरिफ और भू-राजनीतिक तनाव अभी भी बड़े जोखिम हैं। निवेशकों और कारोबारियों के लिए फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है- क्या अमेरिका का बदला हुआ राजनीतिक समीकरण भारत के लिए कारोबार आसान करेगा, या टैरिफ की अनिश्चितता अभी और लंबी चलेगी?
