क्या आपका ग्रॉसरी बिल बढ़ने लगा है? क्योंकि अगर आपको लग रहा है कि पिछले कुछ दिनों से साबुन, शैंपू, टूथपेस्ट, डिटर्जेंट, बिस्कुट या पैकेज्ड फूड पर आपका खर्च धीरे-धीरे बढ़ गया है, तो यह सिर्फ एहसास नहीं है। बल्कि, देश की बड़ी FMCG कंपनियों घटते मार्जिन्स का नतीजा है। देश की सबसे बड़ी FMCG कंपनी हिंदुस्तान यूनिलीवर (HUL), ITC और डाबर जैसी कंपनियों के नतीजे बता रहे हैं कि कच्चे माल की बढ़ती कीमतों ने कंपनियों की लागत बढ़ा दी है। ऐसे में कंपनियां या तो प्रोडक्ट महंगे कर रही हैं, या मुनाफा कम स्वीकार कर रही हैं, या फिर पैकेजिंग में बदलाव जैसे विकल्प अपना रही हैं। इसका सीधा असर आखिरकार ग्राहकों की जेब पर पड़ रहा है।
घटते मार्जिन से प्रॉफिट पर दबाव
नतीजों में महंगाई की कहानी
FMCG यानी Fast Moving Consumer Goods वे उत्पाद हैं, जिन्हें लोग रोज खरीदते हैं। इनमें साबुन, शैंपू, टूथपेस्ट, डिटर्जेंट, चाय, बिस्कुट, मसाले, पैकेज्ड फूड और स्किन केयर जैसे उत्पाद शामिल हैं। इन कंपनियों के नतीजों को अर्थव्यवस्था का 'हेल्थ चेक' माना जाता है। वजह साफ है, जब लोग खर्च कम करने लगते हैं या कंपनियों की लागत बढ़ने लगती है, तो उसका असर सबसे पहले इन्हीं कंपनियों की बिक्री और मुनाफे में दिखाई देता है।
HUL ने क्या संकेत दिए?
देश की सबसे बड़ी FMCG कंपनी हिंदुस्तान यूनिलीवर ने साफ कहा है कि पाम ऑयल समेत कई कच्चे माल की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं। इसके कारण कंपनी पर लागत का दबाव बढ़ा है और आने वाले महीनों में कुछ उत्पादों की कीमतें और बढ़ाई जा सकती हैं। कंपनी ने यह भी बताया कि प्रीमियम ब्रांड्स की मांग मजबूत बनी हुई है, लेकिन आम उपभोक्ताओं के लिए बने मास-मार्केट प्रोडक्ट्स पर दबाव दिखाई दे रहा है। यानी महंगाई का असर सबसे ज्यादा मध्यम और निम्न आय वर्ग पर पड़ रहा है।
क्यों बढ़ रही है कंपनियों की लागत?
महंगाई का असर केवल एक वजह से नहीं है। कई लागतें एक साथ बढ़ी हैं। पाम ऑयल और खाद्य तेल महंगे हुए हैं। कच्चे तेल की ऊंची कीमतों से पैकेजिंग सामग्री महंगी हुई है। इसके अलावा समुद्री मालभाड़ा (Freight) बढ़ा है। पश्चिम एशिया में जारी तनाव से सप्लाई चेन प्रभावित हुई है। ऊर्जा और परिवहन लागत भी बढ़ी है।
इन सभी कारणों से कंपनियों के लिए हर साबुन, शैंपू या बिस्कुट बनाना पहले की तुलना में महंगा पड़ रहा है।
कंपनियां क्या कर रही हैं?
जब लागत बढ़ती है, तो कंपनियों के पास आमतौर पर चार विकल्प होते हैं। पहला, उत्पाद की कीमत बढ़ा दी जाए। दूसरा, पैकेट का आकार छोटा कर दिया जाए, जिसे Shrinkflation कहा जाता है। तीसरा, कुछ समय के लिए कम मुनाफा स्वीकार किया जाए। चौथा, दूसरे खर्चों में कटौती की जाए। इस समय FMCG कंपनियां इन सभी रणनीतियों का अलग-अलग स्तर पर इस्तेमाल कर रही हैं। यही वजह है कि कई कंपनियों के मुनाफे पर दबाव दिखाई दे रहा है।
आपकी जेब पर इसका क्या असर होगा?
अगर किसी साबुन को बनाने की लागत 20 रुपये से बढ़कर 23 रुपये हो जाए, तो कंपनी हमेशा यह अतिरिक्त खर्च खुद नहीं उठा सकती। ऐसे में वह धीरे-धीरे कीमत बढ़ाती है। इसका मतलब है कि आने वाले महीनों में रोजमर्रा की जरूरत की कई वस्तुएं महंगी हो सकती हैं। कुछ मामलों में कीमत वही रहेगी, लेकिन पैकेट में मिलने वाली मात्रा कम हो सकती है। यानी महंगाई का असर केवल थोक बाजार तक सीमित नहीं है, बल्कि अब वह सीधे आपके घरेलू बजट में दिखाई देने लगा है।
