भारतीय इनिशियल पब्लिक ऑफरिंग (IPO) बाजार में एक बार फिर जबरदस्त रौनक लौट आई है। साल के पहले छह महीने तक सुस्त नजर आया IPO बाजार अब दूसरे हाफ में तेजी से रफ्तार पकड़ रहा है। इसका अंदाजा जुलाई और अगस्त में कंपनियों की ओर से IPO के जरिए जुटाई गई रकम से लगाया जा सकता है। सिर्फ दो महीनों में कंपनियों ने IPO के जरिए करीब ₹55,000 करोड़ जुटाए हैं।
आने वाले महीनों में IPO बाजार की यह हलचल और बढ़ सकती है। इस साल दो बड़े IPO बाजार में दस्तक देने की तैयारी में हैं। मुकेश अंबानी की रिलायंस इंडस्ट्रीज की डिजिटल कंपनी Jio Platforms का IPO अक्टूबर के आखिर या नवंबर की शुरुआत में आ सकता है। माना जा रहा है कि कंपनी नवरात्रि के दौरान IPO लॉन्च करने को प्राथमिकता दे सकती है। अगर ऐसा नहीं हुआ तो दिवाली के आसपास शेयर बिक्री शुरू होने की संभावना है।
Jio Platforms का IPO देश का अब तक का सबसे बड़ा IPO हो सकता है। जियो के आईपीओ का साइज 37,800 करोड़ रुपये हो सकता है। इसके बाद नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) का बहुप्रतीक्षित IPO भी बाजार में आ सकता है। NSE के IPO का आकार करीब ₹30,000 करोड़ रहने की उम्मीद है।
ऐसे में बड़ा सवाल है कि साल की पहली छमाही में सुस्त पड़े IPO बाजार में अचानक इतनी तेजी क्यों लौट आई? कंपनियां क्यों तेजी से IPO की तैयारी कर रही हैं और निवेशकों की दिलचस्पी भी क्यों बढ़ रही है? आखिर IPO बाजार के इस बदलाव के पीछे कौन-कौन से कारण हैं? अगर आप भी इन सवालों का जवाब जानना चाहते हैं, तो आइए समझते हैं कि IPO बाजार में अचानक आई इस तेजी के पीछे की पूरी कहानी क्या है।
इसलिए आईपीओ मार्केट में लौटी तेजी
मार्केट एक्सपर्ट्स का कहना है कि भारतीय शेयर बाजार में सबकुछ ठीक हो गया है, ऐसा मानना जल्दबाजी होगी। बाजार अभी भी एक सीमित दायरे में कारोबार कर रहा है और सेंटीमेंट पूरी तरह मजबूत नहीं हुए हैं। इसके बावजूद आईपीओ मार्केट में जबरदस्त तेजी देखने को मिल रही है। इस तेजी की सबसे बड़ी वजह कंपनियों की टाइमलाइन की मजबूरी है। जिन कंपनियों ने आईपीओ लाने के लिए सेबी से मंजूरी हासिल कर रखी है, उनकी फंड जुटाने की अनुमति की समय-सीमा अब खत्म होने के करीब है। खराब बाजार सेंटीमेंट के चलते इन कंपनियों ने पहले अपने आईपीओ टाल दिए थे, लेकिन अब मंजूरी की वैधता समाप्त होने से पहले पब्लिक इश्यू लाना उनके लिए जरूरी हो गया है।
यही वजह है कि एक के बाद एक कंपनियां बाजार में आईपीओ लेकर आ रही हैं। गौरतलब है कि सेबी से आईपीओ के जरिए फंड जुटाने की मंजूरी आमतौर पर 12 महीने तक वैध रहती है। ऐसे में जिन कंपनियों की मंजूरी की अवधि पूरी होने वाली है, वे मौजूदा बाजार परिस्थितियों के बावजूद अपने इश्यू लॉन्च कर रही हैं।
SME सेगमेंट अभी भी सुस्त
हालांकि, मेनबोर्ड IPO ने रफ्तार पकड़ी है, लेकिन छोटे और मध्यम उद्यम (SME) सेगमेंट में IPO सुस्त बने हुए हैं क्योंकि SEBI ने निवेशकों की सुरक्षा बढ़ाने के लिए छोटी कंपनियों के लिए फंड जुटाने की प्रक्रिया को लगातार कड़ा किया है। NSE SME फ्रेमवर्क, जिसे NSE Emerge के नाम से जाना जाता है, एक अलग प्लेटफॉर्म है। इसका मकसद उन छोटी कंपनियों के लिए मुश्किलों और रेगुलेटरी नियमों के पालन को कम करना है जो फंड जुटाना चाहती हैं, जबकि मेनबोर्ड मैकेनिज्म के जरिए लिस्टिंग के लिए बहुत ज्यादा रेगुलेटरी खुलासे करने पड़ते हैं।
मेनबोर्ड IPO से जुटाई गई रकम
| महीना | 2026 में IPO से जुटाई रकम (₹ करोड़) |
|---|---|
| जनवरी | ₹4,051 करोड़ |
| फरवरी | ₹12,625 करोड़ |
| मार्च | ₹9,055 करोड़ |
| अप्रैल | ₹1,830 करोड़ |
| मई | ₹450 करोड़ |
| जून | ₹2,320 करोड़ |
| जुलाई | ₹26,504 करोड़ |
| अगस्त | ₹28,976 करोड़ |
ईरान युद्ध के चलते कई कंपनियों ने टाला था IPO
ईरान-अमेरिका युद्ध के चलते भारतीय बाजार में बड़ी गिरावट आई थी। इसके चलते कई कंपनियों ने अपने IPO प्लान टाल दिए थे। जेप्टो (Zepto) और फोनपे (PhonePe) जैसी बड़ी कंपनियों ने भी अपने फंड जुटाने के प्लान को अनिश्चित काल के लिए रोक दिया था। कंपनियाँ आम तौर पर फंड जुटाते समय बाज़ार के अच्छे हालात का इंतजार करती हैं क्योंकि इससे वैल्यूएशन ज्यादा मिलती है, और ऐसे माहौल में निवेशकों को लिस्टिंग वाले दिन अच्छा फ़ायदा मिलने की भी संभावना होती है। मार्केट रेगुलेटर SEBI ने वेस्ट एशिया संकट को देखते हुए अप्रैल और सितंबर के बीच खत्म होने वाले IPO और राइट्स इश्यू की मंजूरी की समय-सीमा को 30 सितंबर तक बढ़ा दिया था।
शेयर मार्केट के हालात भी बेहतर हुए
इस साल बेंचमार्क निफ्टी 50 और सेंसेक्स इंडेक्स अपने सबसे निचले स्तर पर लगभग 14% तक गिर गए थे, क्योंकि कच्चे तेल की ऊंची कीमतें, विदेशी निवेश की निकासी और रुपये की कमजोरी ने भारतीय बाज़ार को बुरी तरह प्रभावित किया था। हालांकि, अब हालात कुछ बेहतर हुए हैं, क्योंकि पश्चिम एशिया से नकारात्मक खबरें अब कम आ रही हैं। बाजार में शामिल लोग अब ईरान और अमेरिका के बीच लंबे समय तक चलने वाले समझौते के बजाय कमाई में बढ़ोतरी, महंगाई और मैक्रो-इकोनॉमिक पैमानों जैसे कारकों पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं। इसके चलते भारतीय शेयर बाजार अपने निचले स्तर से सुधरा है।
आईपीओ में निवेश
क्या IPO की यह तेजी शेयर बाजार की तेजी का संकेत?
नहीं। IPO मार्केट में तेजी को सीधे तौर पर शेयर बाजार में पूरी तरह तेजी लौटने का संकेत नहीं माना जा सकता। मौजूदा तेजी में एक बड़ा हिस्सा उन कंपनियों का है, जिनके पास पहले से IPO की मंजूरी मौजूद है और अब उसकी वैधता खत्म होने वाली है। इसलिए IPO की बढ़ती संख्या को समझने के लिए कंपनियों की टाइमलाइन और फंड जुटाने की जरूरत को ध्यान में रखना जरूरी है। IPO की बढ़ती संख्या निवेशकों को कमाई के नए मौके देती है, लेकिन हर IPO को सिर्फ बाजार की तेजी देखकर सब्सक्राइब करना सही रणनीति नहीं है। निवेशकों को कंपनी का बिजनेस मॉडल, वैल्यूएशन, मुनाफा, कर्ज, ग्रोथ की संभावनाएं और IPO से जुटाई जा रही रकम के इस्तेमाल को देखना चाहिए।
