Tata Sons Power Struggle Explained : टाटा ग्रुप के 158 साल से भी अधिक लंबे इतिहास में एक बार फिर कॉर्पोरेट सत्ता की सबसे बड़ी जंग छिड़ गई है। साल 2016 में साइरस मिस्त्री को हटाए जाने के आठ साल बाद, टाटा संस का बोर्डरूम एक गंभीर और अभूतपूर्व कानूनी तथा प्रशासनिक संकट के मुहाने पर खड़ा है। इस पूरे विवाद के केंद्र में टाटा संस के कार्यकारी चेयरमैन एन चंद्रशेखरन की 5 साल के नए कार्यकाल के लिए हुई दोबारा नियुक्ति, बोर्ड की वोटिंग प्रक्रिया और आरबीआई के कड़े नियमों के तहत कंपनी की शेयर बाजार में संभावित लिस्टिंग का मुद्दा शामिल है। इस घटनाक्रम ने जहां एक तरफ टाटा संस के बोर्ड और ग्रुप पर मालिकाना हक रखने वाले टाटा ट्रस्ट्स के बीच गहरे मतभेदों को उजागर कर दिया है, वहीं दूसरी तरफ टाटा परिवार और पेशेवर प्रबंधन के बीच अधिकारों की जंग को भी सार्वजनिक कर दिया है।
वो तीन घंटे की बैठक, जिसमें 4-1 से पास हुआ प्रस्ताव
गुरुवार 17 सितंबर 2026 को हुई टाटा संस के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स की करीब 4 घंटे लंबी बैठक में माहौल बेहद तनावपूर्ण था। बैठक का मुख्य एजेंडा एन. चंद्रशेखरन के कार्यकाल के विस्तार का था। चंद्रशेखरन ने इसी साल की शुरुआत में बोर्ड से कहा था कि वे 20 फरवरी 2027 को अपना मौजूदा कार्यकाल पूरा होने के बाद पद छोड़ना चाहते हैं। हालांकि, हालिया परिस्थितियों को देखते हुए बोर्ड के कहने पर वे अपने फैसले पर पुनर्विचार करने के लिए तैयार हो गए। बैठक में वोटिंग के दौरान एक बड़ा गतिरोध उत्पन्न हुआ। टाटा संस के नियमों (Articles of Association - AoA) की धारा 121 के तहत चेयरमैन की नियुक्ति या पुनर्नियुक्ति के लिए टाटा ट्रस्ट्स द्वारा नामित डायरेक्टर्स के बहुमत का समर्थन अनिवार्य है। टाटा संस में 65.9% हिस्सेदारी रखने वाले टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल एन. टाटा ने चंद्रशेखरन के कार्यकाल विस्तार के खिलाफ वोट दिया। वहीं, ट्रस्ट के दूसरे नामित डायरेक्टर वेणु श्रीनिवासन ने प्रस्ताव के पक्ष में मतदान किया। दोनों नामांकित डायरेक्टर्स के अलग-अलग रुख के कारण वोट बराबरी पर आ छूटा। इसके बाद, बोर्ड में मौजूद अन्य सदस्यों का रुख निर्णायक साबित हुआ। टाटा संस के चीफ फाइनेंशियल ऑफिसर (CFO) सौरभ अग्रवाल और स्वतंत्र डायरेक्टर अनीता मारंगोली जॉर्ज ने चंद्रशेखरन के समर्थन में वोट दिया। अंततः टाटा संस की नामांकन और पारिश्रमिक समिति (NRC) के चेयरमैन तथा सबसे वरिष्ठ स्वतंत्र डायरेक्टर हरीश मनवानी ने अपना 'कास्टिंग वोट' (निर्णायक मत) डालकर गतिरोध को तोड़ा। इस तरह प्रस्ताव 4-1 के बहुमत से पास हो गया और चंद्रशेखरन को 5 साल का नया कार्यकाल मिल गया। चूंकि मामला चंद्रशेखरन से ही जुड़ा था, इसलिए उन्होंने इस मतदान प्रक्रिया से खुद को पूरी तरह अलग रखा।
नोएल टाटा का तीखा विरोध और पूर्व CJI की कानूनी राय
इस फैसले के तुरंत बाद टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल टाटा ने कड़ा रुख अपनाते हुए इस पूरी प्रक्रिया और दोबारा नियुक्ति को 'कानूनी रूप से अमान्य और आधारहीन' करार दे दिया। नोएल टाटा का तर्क है कि कंपनी के आर्टिकल्स ऑफ एसोसिएशन के तहत कोई भी पुनर्नियुक्ति तब तक वैध नहीं मानी जा सकती जब तक कि ट्रस्ट द्वारा नामित दोनों डायरेक्टर इसके पक्ष में वोट न दें। नोएल टाटा के अनुसार, केवल स्वतंत्र डायरेक्टर के वोट से नामांकित डायरेक्टर्स के बहुमत की जरुरत को खत्म नहीं किया जा सकता। अपनी स्थिति को कानूनी रूप से मजबूत करने के लिए, नोएल टाटा ने भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश (CJI) डी.वाई. चंद्रचूड़ की एक लिखित कानूनी राय भी बोर्ड के सामने पेश की। इस विधिक राय में स्पष्ट कहा गया था कि यद्यपि मनवानी का वोट टाई (बराबरी) तो तोड़ सकता है, लेकिन यह नामांकित डायरेक्टर्स के अनिवार्य बहुमत का विकल्प नहीं बन सकता। नोएल टाटा ने बोर्ड के सदस्यों से कहा कि चंद्रशेखरन के पद छोड़ने के पहले के फैसले, नए उत्तराधिकारी की खोज प्रक्रिया और ट्रस्ट की सहमति को इस तरह पलटना नियम विरुद्ध है। उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि आम बैठक में कोरम पूरा न होने के कारण वैधानिक स्थिति अनिश्चित है और इस माहौल में लिया गया कोई भी फैसला भविष्य में गंभीर कानूनी चुनौतियों से घिर सकता है।
टाटा संस में बड़ा घमासान: एन. चंद्रशेखरन की दोबारा नियुक्ति और नोएल टाटा के विरोध की पूरी कहानी (AI-generated newsroom-verified)
RBI का फैसला और लिस्टिंग का पेच
टाटा संस में अचानक पैदा हुए इस नेतृत्व संकट की असली वजह भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) का एक सख्त कदम है। साल 2022 में आरबीआई ने टाटा संस को 'अपर लेयर' गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनी (NBFC) के रूप में वर्गीकृत किया था। इस कैटेगरी की कंपनियों के लिए नियम है कि उन्हें तीन साल के भीतर यानी सितंबर 2025 तक शेयर बाजार में सूचीबद्ध होना अनिवार्य होता है। इस लिस्टिंग से बचने के लिए टाटा संस ने अपनी बैलेंस शीट को साफ किया और 21,000 करोड़ रुपये से अधिक का समूचा कर्ज चुका दिया। इसके बाद कंपनी ने एनबीएफसी के रूप में अपना पंजीकरण वापस लेने का आवेदन आरबीआई को दिया था। लेकिन सितंबर 2026 में रिजर्व बैंक ने टाटा संस के इस आवेदन को पूरी तरह खारिज कर दिया। आरबीआई के इस झटके से कंपनी पर सार्वजनिक लिस्टिंग का दबाव अचानक बहुत बढ़ गया। लिस्टिंग की इस चुनौती से निपटने के लिए बोर्ड को शीर्ष नेतृत्व में निरंतरता की सख्त जरूरत महसूस हुई, जिसके चलते चंद्रशेखरन को दोबारा जिम्मेदारी देने की पूरी कवायद शुरू की गई।
लिस्टिंग के मुद्दे पर क्यों आमने-सामने हैं बोर्ड और ट्रस्ट?
कंपनी को शेयर बाजार में लिस्ट कराने के मुद्दे पर टाटा संस का बोर्ड और टाटा ट्रस्ट्स दो अलग-अलग ध्रुवों पर खड़े दिख रहे हैं।
टाटा ट्रस्ट्स का रुख:- नोएल टाटा का मानना है कि टाटा संस की मौजूदा संरचना मुख्य रूप से परमार्थ कार्यों के लिए बनी है। टाटा संस से मिलने वाले लाभांश (Dividend) से ही देश के बड़े अस्पतालों, शोध संस्थानों और विश्वविद्यालयों का संचालन होता है। अगर कंपनी पब्लिक हो जाती है, तो उस पर त्रैमासिक वित्तीय नतीजों, बाजार के दबाव और शेयरधारकों की अपेक्षाओं का बोझ बढ़ जाएगा, जिससे इसका परमार्थ स्वरूप प्रभावित होगा। ट्रस्ट का कहना है कि सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट और सर रतन टाटा ट्रस्ट ने पहले ही लिस्टिंग के खिलाफ सर्वसम्मत प्रस्ताव पारित किए हैं। नोएल टाटा का सुझाव है कि कर्ज या पूंजी जुटाने के लिए समूह की अन्य चालू कंपनियों के शेयर बेचने या नए बिजनेस में निवेशकों को लाने जैसे विकल्पों पर विचार किया जाना चाहिए। शापूरजी पालोनजी (SP) समूह की भूमिका:- टाटा संस में 18.37% हिस्सेदारी रखने वाला शापूरजी पालोनजी समूह लंबे समय से कंपनी की लिस्टिंग का समर्थन करता रहा है, ताकि वह अपनी हिस्सेदारी का सही मूल्यांकन पा सके। एसपी समूह ने अपनी जरुरतों के लिए टाटा संस के समक्ष 25,000 करोड़ रुपये जुटाने हेतु शेयर पुनर्खरीद (Buyback) का प्रस्ताव भी रखा है।
टाटा ट्रस्ट्स के भीतर भी उपजी मतभेद की चिंगारी
इस पूरे घटनाक्रम ने न केवल बोर्ड और ट्रस्ट के बीच की दरार को सामने लाया है, बल्कि खुद टाटा ट्रस्ट्स के अंदरूनी मतभेदों को भी उजागर कर दिया है। सूत्रों के मुताबिक, सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट ने अपने नामित डायरेक्टर वेणु श्रीनिवासन को निर्देश दिया था कि वे चंद्रशेखरन के कार्यकाल विस्तार और लिस्टिंग के पक्ष में मतदान न करें। लेकिन वेणु श्रीनिवासन ने ट्रस्ट के निर्देश के बजाय एक स्वतंत्र डायरेक्टर के रूप में अपनी संवैधानिक और कॉर्पोरेट जिम्मेदारियों का हवाला दिया और चंद्रशेखरन के समर्थन में वोट डाला। वेणु श्रीनिवासन अगस्त 2016 से बोर्ड में हैं और सबसे वरिष्ठ सदस्यों में से एक हैं। उनके इस कदम से ट्रस्ट के भीतर की खींचतान साफ नजर आने लगी है।
2016 के साइरस मिस्त्री विवाद की कड़वी यादें
गुरुवार की बोर्ड बैठक के ड्रामे ने 2016 के उस बहुचर्चित विवाद की यादें ताजा कर दी हैं, जब तत्कालीन चेयरमैन साइरस मिस्त्री को अचानक पद से हटा दिया गया था। उस समय भी रतन टाटा और टाटा ट्रस्ट्स की बोर्ड के साथ सीधी टक्कर हुई थी। वह मामला कई सालों तक राष्ट्रीय कंपनी कानून न्यायाधिकरण (NCLT) से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक चला था। अंततः 2021 में सुप्रीम कोर्ट ने टाटा ट्रस्ट्स के विशेषाधिकारों और फैसलों को सही ठहराया था। मौजूदा विवाद में भी एक तरफ चंद्रशेखरन का प्रशासनिक अनुभव और बोर्ड के अधिकांश सदस्यों का समर्थन है, जिन्होंने 2017 से कंपनी को कई गुना आगे बढ़ाया है। वहीं दूसरी तरफ नोएल टाटा के नेतृत्व में टाटा ट्रस्ट्स का वह समूह है, जो कंपनी के मूल नियमों और अपने अधिकारों की रक्षा के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार दिख रहा है।
बैठक के बाद टाटा संस ने आधिकारिक बयान जारी कर कहा है कि वह रिजर्व बैंक के दिशानिर्देशों का पूरी तरह पालन करेगी और लिस्टिंग के विकल्पों पर नियामक व टाटा ट्रस्ट्स के साथ निरंतर विचार-विमर्श जारी रखेगी। वहीं दूसरी ओर, चंद्रशेखरन के नए कार्यकाल के खिलाफ नोएल टाटा का कड़ा रुख यह संकेत दे रहा है कि यह मामला अभी शांत नहीं होने वाला है। अगर दोनों पक्ष आपस में किसी सहमति पर नहीं पहुंचते हैं, तो यह कॉर्पोरेट विवाद एक बार फिर एजीएम से होता हुआ अदालत के दरवाजों तक पहुंच सकता है। आने वाले दिन न केवल एन. चंद्रशेखरन के भविष्य के लिए, बल्कि पूरे टाटा समूह की साख और उसकी प्रशासनिक दिशा के लिए बेहद निर्णायक साबित होने वाले हैं।
