हरियाणा में सड़क हादसे में एक महिला की मौत पर मुआवजे को लेकर ऐतिहासिक फैसला देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि गृहणियां 'होममेकर' नहीं, नेशन बिल्डर हैं। कोर्ट ने समाज और व्यवस्था के चश्मे को साफ करते हुए कहा कि चौके-चूल्हे और घर को संभालने वाली ये महिलाएं सिर्फ देखभाल करने वाली मां, बहन या पत्नी नहीं हैं, बल्कि वे देश की मजबूत आधार हैं, जिनके श्रम का एक बड़ा आर्थिक मूल्य है। कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा, 'घर संभालने वाली महिलाएं' असल में 'राष्ट्र निर्माता' हैं और उन्हें इसी रूप में पहचाना जाना चाहिए।' सुप्रीम कोर्ट ने मुआवजे के लिए घरेलू देखभाल का नुकसान (loss of domestic care) नाम से एक नई कैटेगरी बनाई। जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की बेंच ने कहा कि घर संभालने वाली महिलाएं सिर्फ देखभाल करने वाली नहीं, बल्कि आर्थिक इकाई (economic entities) होती हैं।
सुप्रीम कोर्ट के इस एक क्रांतिकारी फैसले ने जहां महिलाओं के काम को कानूनी सम्मान दिया है, वहीं दूसरी ओर समाज और व्यवस्था के सामने कई गहरे और अनछुए सवालों को भी जन्म दे दिया है। आइए, आसान भाषा में समझते हैं कि सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के क्या हैं मायने, और कैसे देश की करोड़ों महिलाएं बिना किसी शोर-शराबे के देश की तरक्की में अपना योगदान दे रही हैं।
SC ने महिलाओं को लेकर क्या कहा है?
SC ने साफ कहा है कि घर संभालने वाली महिलाएं सिर्फ 'होममेकर' (हाउसवाइफ) नहीं हैं, बल्कि वे इस देश की असली 'नेशन बिल्डर' (राष्ट्र-निर्माता) हैं। उनके चौके-चूल्हे और परिवार की देखभाल करने वाले काम की एक बड़ी आर्थिक कीमत होती है, जिसे अब तक समाज 'फ्री' समझकर नजरअंदाज करता आया था। अदालत ने भरोसा जताया है कि देश के सभी हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस इस नए नियम पर कड़ी नजर रखेंगे, ताकि किसी हादसे का शिकार हुई महिला के परिवार को पूरा और सही मुआवजा मिल सके।
क्या है मुआवजे का नया नियम?
सुप्रीम कोर्ट ने सड़क हादसों में होने वाली मौतों के मुआवजे के लिए एक बिल्कुल नई कैटेगरी बनाई है, जिसे नाम दिया गया है— 'घरेलू देखभाल का नुकसान' (Loss of Domestic Care)।
अब अगर किसी सड़क हादसे में घर संभालने वाली महिला की मौत हो जाती है, तो अदालत उसके परिवार को मुआवजा देते समय महिला की शुरुआती काल्पनिक आय ₹30,000 महीना मानकर चलेगी। यह ₹30,000 का नियम तब लागू होगा।
कैसे तय होगा मुआवजे का पैसा?
₹30,000 बनेगा बेस (शुरुआती बिंदु): पहले अदालतों के पास हाउसवाइफ के काम की कीमत तय करने का कोई ठोस पैमाना नहीं था। अब कोर्ट ₹30,000 महीना को शुरुआती बेस मानेगा।
भविष्य की संभावनाएं और 'मल्टीप्लायर' (उम्र का गणित): इस ₹30,000 की रकम में महिला के भविष्य की संभावनाओं को जोड़ा जाएगा। इसके बाद अदालती नियमों के हिसाब से एक 'मल्टीप्लायर' (Multiplier) लगाया जाता है। यह मल्टीप्लायर महिला की उम्र पर आधारित एक आंकड़ा होता है, जिससे यह अनुमान लगाया जाता है कि अगर वह जीवित रहतीं, तो कितने सालों तक परिवार की सेवा और आर्थिक योगदान देती रहतीं।
वर्किंग वीमेन (नौकरीपेशा महिलाओं) के लिए डबल फायदा: अगर वह महिला घर संभालने के साथ-साथ कहीं नौकरी या बिजनेस भी करती थी, तो यह नियम उनके लिए और भी बड़ा संबल बनेगा। मुआवजे के कैलकुलेशन के वक्त महिला की जो भी असल सैलरी थी, उसमें यह ₹30,000 अलग से जोड़ दिए जाएंगे, क्योंकि वह नौकरी के साथ-साथ घर भी संभाल रही थी।
देश की तरक्की में महिलाओं का अहम योगदान
भारत में महिलाओं की कार्यबल में भागीदारी (LFPR) 2022 के 33.9% से बढ़कर 2025 में 40% हो गई है। सरकार ने विकसित भारत @2047' के सपने को सच करने के लिए देश में महिलाओं की कार्यबल भागीदारी (Workforce Participation) को 70 प्रतिशत तक ले जाने का लक्ष्य रखा गया है। विशेषज्ञों के अनुसार, महिलाओं की आर्थिक भागीदारी और आय बढ़ाने के लिए केवल सामाजिक सोच में बदलाव नहीं, बल्कि श्रम-प्रधान उद्योगों को बढ़ावा देकर बड़े पैमाने पर रोजगार के अवसर पैदा करना भी आवश्यक है। महिलाओं ने आर्थिक और सामाजिक स्थितियों को सुधारने में बहुत बड़ा योगदान दिया है, लेकिन सभी को एक समान मंच और अवसर प्रदान करने वाला माहौल सुनिश्चित करने के लिए अभी एक लंबा रास्ता तय करना बाकी है।
बड़ी संख्या में महिलाएं अनौपचारिक क्षेत्र जैसे मजदूरी, कपड़ा उद्योग और हस्तशिल्प में काम करती हैं, लेकिन उनके श्रम का बड़ा हिस्सा आधिकारिक आर्थिक आंकड़ों में दर्ज नहीं हो पाता। यही वजह है कि देश की जीडीपी में महिलाओं का योगदान केवल 17% आंका जाता है, जबकि बिना भुगतान वाले घरेलू कार्यों का लगभग 91% भार महिलाएं ही उठाती हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर महिलाओं को पुरुषों के बराबर औपचारिक अर्थव्यवस्था में अवसर मिलें, तो भारत की जीडीपी में 60% तक की बढ़ोतरी संभव है।
रसोई से राष्ट्र निर्माण तक
लेकिन अभी चुनौतियां भी कम नहीं
भारत में महिलाओं की आर्थिक प्रगति के रास्ते में चुनौतियां भी कम नहीं है। समाज की रूढ़िवादिता और व्यवसायिक अलगाव हैं, जो महिलाओं को आज भी उन सीमित उद्योगों और कम वेतन वाले कामों तक समेट देते हैं जहां विकास की रफ्तार सुस्त है। इसके अलावा, अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) के अनुसार बाजार की जटिलताएं और कड़े नियम इतने प्रभावी हैं कि अनौपचारिक क्षेत्र (Informal Sector) में संघर्ष कर रही महिलाओं के लिए किसी औपचारिक नौकरी या स्वतंत्र बिजनेस में कदम रखना मुश्किल हो जाता है। इस खाई को पाटने के लिए महिलाओं को उन उभरते हुए आधुनिक उद्योगों के अनुसार कौशल विकास देना होगा जिनमें विकास और बेहतर कमाई की संभावनाएं सबसे ज्यादा हैं।
