मिडिल ईस्ट में जारी तनाव के बीच भले ही दुनिया ने राहत की सांस ली हो कि ईरान और अमेरिका सीजफायर (Iran US Ceasefire) यानी युद्धविराम के लिए राजी हो गए हैं, लेकिन हकीकत यह है कि असली खतरा अभी टला नहीं है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा दिए गए अल्टीमेटम और कूटनीतिक दबाव के बाद ईरान ने होर्मुज स्ट्रेट (Hormuz) को फिर से खोलने और सीजफायर के प्रस्ताव को स्वीकार तो कर लिया है, लेकिन यह शांति बहुत नाजुक है। ईरान के लिए होर्मुज केवल एक समुद्री रास्ता नहीं, बल्कि उसकी सबसे बड़ी ताकत और 'ब्रह्मास्त्र' है। ईरान ने साफ कर दिया है कि वह अपनी शर्तों पर ही पीछे हटा है और अगर अमेरिका ने कोई भी चालाकी की, तो उसकी खुशियों को गम में बदलने में ईरान को ज्यादा समय नहीं लगेगा।
ईरान का 'टोल' मास्टरस्ट्रोक और नई रणनीति
ईरान ने होर्मुज को खोलने की सहमति भले ही दे दी हो, लेकिन अब उसने इसे अपनी कमाई का जरिया बनाने का नया 'न्यू गल्फ ऑर्डर' प्लान तैयार किया है। ईरान की संसद ने होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले हर जहाज पर भारी-भरकम टोल टैक्स लगाने की नीति को मंजूरी दे दी है। ईरान का मानना है कि इस जलमार्ग की सुरक्षा की जिम्मेदारी उसकी है, इसलिए यहां से गुजरने वाले हर जहाज को $20 लाख का भुगतान करना चाहिए। ईरान के इस दांव ने अमेरिका और इजरायल को सकते में डाल दिया है। ईरान का सीधा संदेश है कि अगर उसे युद्ध से आर्थिक नुकसान हुआ है, तो वह इसकी भरपाई दुनिया के सबसे व्यस्त तेल मार्ग से करेगा। उसकी नजर इस टोल के जरिए अपनी जीडीपी को 20 प्रतिशत तक बढ़ाने पर है।
ताकता रह जाएगा वॉशिंगटन
डोनाल्ड ट्रंप ने भले ही सीजफायर को अपनी जीत बताया हो, लेकिन ईरान ने तंज कसते हुए कहा है कि "होर्मुज की चाबियां अब भी हमारे पास हैं।" ईरान का रुख स्पष्ट है अगर अमेरिका ने सीजफायर की शर्तों का उल्लंघन किया या ईरान पर आर्थिक प्रतिबंधों को कम नहीं किया, तो वह एक बार फिर 'चोक पॉइंट' यानी होर्मुज को बंद कर देगा। होर्मुज एक ऐसा संकरा रास्ता है जहां से दुनिया का 20 प्रतिशत कच्चा तेल और भारी मात्रा में एलपीजी (LPG) गुजरती है। अगर ईरान ने फिर से इस रास्ते की घेराबंदी की, तो अमेरिका केवल देखता रह जाएगा और वैश्विक बाजार में तेल की कीमतें आसमान छूने लगेंगी। भारत जैसे देशों के लिए यह राहत की बात जरूर है कि एलपीजी के टैंकर अब भारत पहुंच सकेंगे, लेकिन यह सप्लाई पूरी तरह सुरक्षित तभी होगी जब ईरान और अमेरिका के बीच का यह गतिरोध स्थायी रूप से खत्म हो।
अमेरिकी सेना की मौजूदगी
ईरान ने बार-बार यह दोहराया है कि होर्मुज और फारस की खाड़ी में तब तक पूरी तरह से शांति नहीं आ सकती, जब तक वहां से अमेरिकी सेना (US Navy) पूरी तरह हट नहीं जाती। ईरान का मानना है कि इस क्षेत्र में विदेशी सेनाओं की मौजूदगी ही अस्थिरता का मुख्य कारण है। ईरान इस पूरे इलाके में अपनी संप्रभुता चाहता है और वह अमेरिका के दबदबे को खत्म करने के लिए होर्मुज को एक हथियार की तरह इस्तेमाल कर रहा है। जब तक अमेरिकी युद्धपोत इस इलाके में गश्त करते रहेंगे, ईरान अपने 'टोल टैक्स' और 'रास्ता बंद' करने की धमकियों से पीछे नहीं हटेगा। यह केवल एक व्यापारिक विवाद नहीं, बल्कि वर्चस्व की लड़ाई है।
तूफान से पहले की शांति?
फिलहाल के लिए होर्मुज खुलना अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए एक बड़ी ऑक्सीजन की तरह है, लेकिन इसे 'स्थायी शांति' समझना भूल होगी। ईरान ने अपनी ताकत का प्रदर्शन कर यह दिखा दिया है कि वह जब चाहे दुनिया की सप्लाई चेन को ठप कर सकता है। अगर अमेरिका ने अपनी सैन्य मौजूदगी या प्रतिबंधों के जरिए ईरान को और दबाने की कोशिश की, तो सीजफायर का यह समझौता कागज के टुकड़े से ज्यादा कुछ नहीं रह जाएगा। दुनिया को आने वाले दिनों में और भी बड़े झटकों के लिए तैयार रहना चाहिए, क्योंकि होर्मुज का संकट अभी पूरी तरह टला नहीं है, यह तो बस शतरंज की एक चाल भर है।
